सुप्रीम कोर्ट ने पूछा क्या शिवसेना का मतलब पूरी पार्टी है, कार्यसमिति या विधायी दल?
कपिल सिब्बल ने कहा कि शिवसेना का मतलब पूरी राजनीतिक पार्टी से है, पार्टी के नियमों के मुताबिक अलग-अलग इकाइयां बनाई जाती हैं जैसे विधानमंडल पक्ष, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और प्रतिनिधि सभा।

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शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रही कानूनी लड़ाई में बुधवार को सुप्रीम न्यायालय में अहम सुनवाई हुई. कोर्ट ने पूछा कि आखिर शिवसेना से मतलब क्या है, पूरी राजनीतिक पार्टी, कार्यसमिति या विधायी दल?
उद्धव ठाकरे गुट का पक्ष रख रहे वकील कपिल सिब्बल ने इसका जवाब देते हुए कहा कि शिवसेना का सीधा अर्थ राजनीतिक पार्टी से है. पार्टी का कामकाज चलाने के लिए अलग-अलग इकाइयां बनाई जाती हैं, जैसे विधानमंडल पक्ष, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और प्रतिनिधि सभा.
कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने पार्टी के नियम और लोकतांत्रिक व्यवस्था का पूरा लेखा-जोखा रखा. उनका कहना था कि शिवसेना एक नियम से चलने वाली संस्था है, जहां जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 29ए. के तहत हर छोटे-बड़े बदलाव की जानकारी चुनाव आयोग को दी जाती है.
पार्टी के नियमों के मुताबिक 'पक्ष प्रमुख' को चुनने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पास है. इसी बात को आधार बनाते हुए सिब्बल ने दलील दी कि बागी गुट ने बिना कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाए ही पार्टी प्रमुख को हटा दिया और खुद कुर्सी पर बैठ गए, जो कि शिवसेना के संविधान का सीधा उल्लंघन था.
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चुनाव आयोग के फैसले पर उठाए सवाल
दलीलों के दौरान चुनाव आयोग की कार्यशैली की कड़ी आलोचना की गई. सिब्बल ने बताया कि 2018 में पार्टी की आम सभा ने 12 उप-नेता मनोनीत किए थे, जबकि 21 को चुनाव के जरिए चुना गया था. इन सभी दस्तावेजों पर चुनाव आयोग की बाकायदा मुहर लगी हुई है.
इसके बावजूद आयोग का यह कहना कि उनके पास नया रिकॉर्ड नहीं था, पूरी तरह गलत है. सिब्बल ने आरोप लगाया कि आयोग ने 2018 के इन आधिकारिक कागजों को नजरअंदाज करके पहले से तय सोच के हिसाब से फैसला सुनाया.
जब कोर्ट में हुई अखिलेश बनाम मुलायम विवाद की चर्चा
बहस के बीच जब चुनाव आयोग के पुराने फैसलों की मिसाल दी जाने लगी, तो समाजवादी पार्टी के पारिवारिक विवाद की बात भी सामने आई. सिब्बल ने मुस्कुराते हुए याद दिलाया कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के बीच जब पार्टी को लेकर जंग छिड़ी थी, तब उन्होंने बेटे की तरफ से पैरवी करके केस जीता था. इस बात पर अदालत में माहौल थोड़ा हल्का हुआ और इस पर चर्चा हुई कि कैसे राजनीतिक परिवारों के बिखराव के बाद पार्टियां दो हिस्सों में बंट जाती हैं.
19 जुलाई की स्थिति पर कोर्ट में सवाल-जवाब
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जस्टिस बागची ने सवाल किया कि जब पार्टी में टूट होती है, तब क्या चुनाव आयोग बाद के घटनाक्रमों और नए दस्तावेजों को आधार बना सकता है? सिब्बल ने माना कि अगर पार्टी में विभाजन का शुरुआती मामला बनता है, तो बाद की घटनाओं पर विचार हो सकता है.
हालांकि उन्होंने 19 जुलाई की तारीख का जिक्र करते हुए पूछा कि चुनाव चिन्ह आदेश (प्रतीकों का क्रम) के पैराग्राफ 15 के तहत कार्रवाई करते समय आयोग के पास ऐसा क्या सबूत था, जिसके आधार पर पार्टी के ढांचे को तानाशाही करार दे दिया गया? फिलहाल, सिब्बल गुरुवार को चुनाव निशान से जुड़े मुद्दों पर अपनी दलीलें पेश करेंगे, जिसके बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू होगी.
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