सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, बिना अनुमति सोशल मीडिया पर नहीं चलेंगे अदालती कार्यवाही के वीडियो क्लिप्स
सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग के वीडियो सोशल मीडिया पर बिना अनुमति पोस्ट या रीपोस्ट करने पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालती कार्यवाही के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पोस्ट, रीपोस्ट या अपलोड करने पर अब सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी-जनरल या संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार-जनरल से पहले इजाजत लेनी होगी।

सौजन्य से:- ETV Bharat
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: बिना अनुमति सोशल मीडिया पर नहीं चलेंगे अदालती कार्यवाही के वीडियो क्लिप्स
सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट रूम की लाइव स्ट्रीमिंग के वीडियो सोशल मीडिया पर बिना अनुमति पोस्ट या रीपोस्ट करने पर अंतरिम रोक लगा दी है.
By Sumit Saxena
Published : July 24, 2026 at 4:43 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कोर्ट की कार्यवाही के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पोस्ट, रीपोस्ट या अपलोड करने पर रोक लगा दी है. इसके लिए अब सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी-जनरल (महासचिव) या संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार-जनरल से पहले इजाजत लेनी होगी.
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की. याचिकाकर्ता हर्षिता ग्रोवर की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह अदालत में पेश हुए.
पीठ ने कहा, "अंतरिम कदम के रूप में यह निर्देश दिया जाता है कि इस अदालत के सेक्रेटरी-जनरल या संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार-जनरल की पूर्व अनुमति के बिना, सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर न्यायिक कार्यवाही के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को निकालने, उसमें बदलाव करने, उसका प्रसार करने, पोस्ट, रीपोस्ट और अपलोड करने पर पूरी तरह रोक रहेगी."
पीठ ने सोशल मीडिया पर कोर्ट की कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग के दुरुपयोग और वीडियो शेयर किए जाने को लेकर दायर याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों से जवाब भी मांगा है.
सुनवाई के दौरान, वकील ने सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अदालती कार्यवाही के वीडियो के गलत इस्तेमाल का मुद्दा उठाया. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी सिंह की बात से सहमति जताई और कहा कि इसके लिए कोई नियम या रेगुलेशन होना बेहद जरूरी है. पीठ के सामने यह दलील दी गई कि वीडियो के छोटे-छोटे क्लिप्स कोर्ट में असल में क्या हुआ, उस बात को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं. इससे न्यायिक संस्थाओं की छवि खराब होती है और जजों को भी गलत तरीके से दिखाया जाता है.
पीठ ने केंद्र सरकार से उन सोशल मीडिया कंपनियों की सूची मांगी है, ताकि उन्हें भी इस मामले में पक्षकार बनाया जा सके. पीठ ने कहा कि जल्द ही इन कंपनियों को नोटिस जारी किए जाएंगे. इसके साथ ही, कोर्ट ने सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा कोर्ट के वीडियो क्लिप वायरल करके पैसे कमाने और अदालती कार्यवाही का व्यावसायिक इस्तेमाल करने पर भी पूरी तरह रोक लगा दी है. पीठ ने यह साफ किया कि इस अंतरिम आदेश का अदालती कार्यवाही की समाचार रिपोर्टिंग पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
पीठ ने उस याचिका पर केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया, जिसमें संबंधित अदालत की आधिकारिक वेबसाइट या चैनल के अलावा, सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अदालती कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनधिकृत रूप से निकालने, बदलने, प्रसारित करने या उससे पैसे कमाने पर तुरंत रोक लगाने की मांग की गई थी.
अधिवक्ता अनिल कुमार के माध्यम से दायर इस याचिका में कहा गया- "हालांकि अदालती कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग और वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग की शुरुआत खुली न्याय प्रणाली, पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया तक आम जनता की पहुंच को बढ़ावा देने के लिए की गई थी, लेकिन ऐसी सामग्रियों को दोबारा प्रकाशित करने और उससे पैसे कमाने को नियंत्रित करने के लिए किसी नियम या ढांचे (रेगुलेटरी फ्रेमवर्क) के न होने के कारण इसका व्यापक दुरुपयोग हुआ है."
पीठ ने कहा कि अक्सर लंबी सुनवाइयों में से कोर्ट रूम की बहस के छोटे-छोटे हिस्सों, जजों की मौखिक टिप्पणियों और शुरुआती बयानों को काट लिया जाता है. फिर इन्हें उस वास्तविक कानूनी या तथ्यात्मक संदर्भ के बिना ही सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया जाता है, जिसमें वे बातें कही गई थीं.
पीठ ने आगे कहा, "ऐसी वीडियो क्लिपों के साथ अक्सर भ्रामक कैप्शन, सनसनीखेज कमेंट्री और क्लिकबैट सुर्खियां जोड़ी जाती हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों का ध्यान खींचा जा सके और व्यावसायिक मुनाफा कमाया जा सके." पीठ ने कहा कि ऐसी सामग्री के बेधड़क और अनियंत्रित प्रसार के कारण जजों, वकीलों और मुकदमों से जुड़े पक्षों को बेवजह की आलोचना, ट्रोलिंग, बदनामी और मानहानि का सामना करना पड़ रहा है.
याचिका में कहा गया, "मौजूदा याचिका खुली न्याय प्रणाली के सिद्धांत या अदालती कार्यवाही की निष्पक्ष रिपोर्टिंग को कम करने या रोकने की मांग नहीं करती है. यह केवल अदालती रिकॉर्डिंग को बिना अनुमति के काटने, एडिट करने, प्रसारित करने और उसके व्यावसायिक इस्तेमाल के खिलाफ कुछ उचित सुरक्षा उपायों की मांग करती है. ताकि न्यायपालिका के कामकाज में पारदर्शिता भी बनी रहे और सनसनी फैलाने, गलत जानकारी देने या निजी मुनाफे के लिए कोर्ट की कार्यवाही को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की इजाजत भी न मिले."
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