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सरगुजा कलेक्टर ने जमानत आदेश में त्रुटियों की ओर इशारा करते हुए कार्रवाई का अनुरोध किया

कलेक्टर अजीत वसंत ने अंबिकापुर के न्यायाधीश को पत्र लिखकर बताया कि आदिवासी जमीन के अवैध हस्तांतरण के मामले में आरोपी को बिना अभियोजन पक्ष की सुनवाई के जमानत दे दी गई, जबकि अदालत में सहायक ज़िला अभियोजन अधिकारी उपस्थित नहीं था। उन्होंने जाली दस्तावेज़ों के इस्तेमाल और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत विशेष अदालत को मामले की सही सुनवाई की मांग की।

30 सितंबर 2026 को 06:05 pm बजे
सरगुजा कलेक्टर ने जमानत आदेश में त्रुटियों की ओर इशारा करते हुए कार्रवाई का अनुरोध किया

सौजन्य से:- ETV Bharat

आदिवासी जमीन केस में जमानत का मामला, सरगुजा कलेक्टर ने अदालत के आदेश में गलतियों का आरोप लगाया, जज को लिखा पत्र

सरगुजा कलेक्टर ने आदिवासी जमीन केस में अदालत के आदेश पर गलतियों का जिक्र किया है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : September 30, 2026 at 10:39 PM IST

अंबिकापुर: सरगुजा ज़िला प्रशासन ने अंबिकापुर की एक निचली अदालत के उस आदेश में "गलतियों" का आरोप लगाया है, जिसमें आदिवासी ज़मीन के कथित अवैध मालिकाना हक के हस्तांतरण से जुड़े मामले में एक आरोपी को ज़मानत दी गई थी.सरगुजा कलेक्टर अजीत वसंत ने बुधवार को अंबिकापुर के प्रधान ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश को पत्र लिखकर नियमों के अनुसार कार्रवाई करने का अनुरोध किया.

कलेक्टर ने अभियोजन पक्ष की रिपोर्ट का किया जिक्र

कलेक्टर ने अभियोजन के उप निदेशक, अंबिकापुर द्वारा सौंपी गई एक रिपोर्ट का ज़िक्र किया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अभियोजन पक्ष की बात सुने बिना ही आरोपी को ज़मानत दे दी गई. अधिकारियों ने बताया कि यह मामला 24 सितंबर को ज़िले के मणिपुर पुलिस स्टेशन में सूरजपुर ज़िले के जयनगर निवासी आज़ाद इराकी के ख़िलाफ़ दर्ज अपराध से संबंधित है. अंबिकापुर में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अरिंदम नेरल की अदालत ने 25 सितंबर को आरोपी को ज़मानत दे दी.

कलेक्टर के पत्र में कहा गया है कि ज़मानत याचिका को उस रिकॉर्ड के आधार पर स्वीकार किया गया जिसमें राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले ADPO (सहायक ज़िला अभियोजन अधिकारी) की उपस्थिति दिखाई गई थी, जबकि कार्यवाही के दौरान अदालत में वास्तव में कोई ADPO मौजूद नहीं था.

जाली दस्तावेजों की साजिश का आरोप

इसके अलावा, इस मामले में गोंड जाति के व्यक्ति की ज़मीन शामिल है, जो अनुसूचित जनजाति श्रेणी में आती है. सामान्य श्रेणी के आरोपियों पर आरोप है कि उन्होंने जाली दस्तावेज़ों का इस्तेमाल करके और मूल मालिक की जाति की स्थिति को छिपाकर ज़मीन को अपने नाम पर दर्ज कराने की आपराधिक साज़िश रची.

कलेक्टर ने पत्र में कई बातों का किया जिक्र

सरगुजा कलेक्टर ने पत्र में लिखा कि इन परिस्थितियों को देखते हुए, इस मामले पर प्रथम दृष्टया अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(f) लागू होती है. इस मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र विशेष रूप से अंबिकापुर में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत गठित विशेष अदालत के पास है-

कलेक्टर ने कहा कि चूंकि अभियोजन पक्ष को अदालत के सामने अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया, इसलिए यह महत्वपूर्ण तथ्य रिकॉर्ड पर नहीं लाया जा सका. "इसके बावजूद, आरोपी द्वारा दायर ज़मानत याचिका स्वीकार कर ली गई." इसलिए, नियमों के अनुसार इस मामले में आगे की कार्रवाई के लिए एक रिपोर्ट सौंपी जा रही है,"

अभियोजन पक्ष के उप-निदेशक ने कलेक्टर को सौंपी अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि जांच अभी शुरुआती चरण में ही थी कि अदालत ने अभियोजन पक्ष की बात सुने बिना ही ज़मानत दे दी. रिपोर्ट में कहा गया है कि अदालत के आदेश में दर्ज था कि राज्य की ओर से एक ADPO मौजूद था और अभियोजन पक्ष को ज़मानत अर्ज़ी की एक कॉपी दी गई थी. हालांकि, अभियोजन कार्यालय का कहना था कि सुनवाई के लिए अदालत में उनका कोई अधिकारी मौजूद नहीं था और उन्हें ज़मानत अर्ज़ी की कोई कॉपी नहीं मिली थी.

अभियोजन पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि ज़मानत का आदेश आरोपी के वकील द्वारा पेश किए गए तर्कों और दस्तावेज़ों पर विचार करने के बाद दिया गया, जबकि मामले की गंभीरता और प्रकृति तथा FIR में बताए गए तथ्यों की जांच नहीं की गई.

जमीन पर कब्जे की कथित शिकायत से शुरू हुआ केस

बुधवार को एक बयान में कलेक्टर ने कहा कि मालिकाना हक के कथित अवैध हस्तांतरण से जुड़ा यह मामला ज़मीन पर कथित कब्ज़े की शिकायत से शुरू हुआ था; यह ज़मीन एक तालाब के रूप में मौजूद है. अजीत वसंत ने बताया कि अप्रैल 2026 में अंबिकापुर (सरगुजा मुख्यालय) के प्रतीक्षा बस स्टैंड इलाके में 'रिंग बांध' तालाब की ज़मीन को कथित तौर पर अवैध रूप से भरे जाने की शिकायत मिली थी.

शिकायत के बाद, राजस्व विभाग और नगर निगम के अधिकारियों को अवैध रूप से भरे गए तालाब को खाली करने का आदेश दिया गया. उन्होंने बताया कि जब नगर निगम के कर्मचारी तालाब से मिट्टी हटा रहे थे, तो आरोपी आज़ाद इराकी ने कथित तौर पर सरकारी काम में बाधा डाली और अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया.

इस घटना के बाद, मणिपुर पुलिस स्टेशन में इराकी के खिलाफ BNS की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया और अंबिकापुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने उसकी अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी. कलेक्टर ने बताया कि इसके बाद इराकी ने बिलासपुर में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसने 13 मई को उसे अग्रिम ज़मानत दे दी.

जांच में उस ज़मीन के म्यूटेशन (नाम-परिवर्तन) में अनियमितताएं पाई गईं. नतीजतन, अंबिकापुर के उप-विभागीय अधिकारी (राजस्व) ने म्यूटेशन की वैधता की जांच के लिए कार्यवाही शुरू की. इस बीच, एक और शिकायत मिली जिसमें कहा गया कि ज़मीन (खसरा नंबर 3714) एक आदिवासी समुदाय के व्यक्ति के नाम पर रजिस्टर की गई थी.

कलेक्टर ने बताया कि जांच में यह पुष्टि हुई कि इराकी ने कथित तौर पर दस्तावेज़ों में हेरफेर करके, आदिवासी न होने के बावजूद, एक आदिवासी की ज़मीन अपने नाम पर खरीदी थी. इस जांच रिपोर्ट के आधार पर, 24 सितंबर को मणिपुर पुलिस स्टेशन में BNS की विभिन्न धाराओं के तहत इराकी के खिलाफ़ एक और मामला दर्ज किया गया. 25 सितंबर को JMFC कोर्ट ने आरोपी को ज़मानत दे दी. कलेक्टर को सौंपी गई एक रिपोर्ट में, डिप्टी डायरेक्टर ऑफ़ प्रॉसिक्यूशन ने ज़मानत से जुड़ी कई कथित गलतियों की ओर इशारा किया.

सोर्स: पीटीआई

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