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वार्निंग लेबल लागू करने में देरी को लेकर अदालत ने एफएसएसएआई को फटकारा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वार्निंग लेबल लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए जरूरी हैं, खासकर उन बच्चों के बीच जो बढ़ती उम्र में जंक फूड के आदी हो रहे हैं. अदालत ने एफएसएसएआई से पूछा है कि वह अपने लोगों को स्वस्थ नहीं रखना चाहती?

14 अगस्त 2026 को 01:57 pm बजे
वार्निंग लेबल लागू करने में देरी को लेकर अदालत ने एफएसएसएआई को फटकारा

सौजन्य से:- The Wire - Hindi

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (13 अगस्त) को पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर वार्निंग लेबल लागू करने में हो रही देरी पर गंभीर नाराज़गी जताते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को फटकार लगाई और ऐसे लेबल के महत्व को रेखांकित किया. पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या वह ‘अपने लोगों को स्वस्थ नहीं रखना चाहती.’

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, ‘हम यह जनहित में कर रहे हैं. इसे ध्यान में रखिए. हम यह अपने लिए नहीं कर रहे हैं. आप हमारे आदेश का पालन क्यों नहीं कर रहे हैं? हम जानते हैं कि आप पर दबाव है. क्या आप इसे अपने स्तर पर करेंगे या हमें आदेश पारित करना होगा?’

अदालत ने ये टिप्पणियां सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट थ्री-एस एंड आवर हेल्थ सोसाइटी की जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई के दौरान कीं. याचिका में केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर अनिवार्य फ्रंट-ऑफ-पैकेज वार्निंग लेबल (एफओपीएल) लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफओपीएल लेबल लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए जरूरी हैं, खासकर उन बच्चों के बीच जो बढ़ती उम्र में जंक फूड के आदी हो रहे हैं.

सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर से सवाल किया, ‘क्या आप अदालत को मज़ाक समझ रहे हैं?’

जनहित याचिका में भारत में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के बढ़ते मामलों का हवाला देते हुए कहा गया कि एफओपीएल लेबल खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक और संतृप्त वसा की अधिक मात्रा को स्पष्ट रूप से सामने लाएंगे. ये तत्व मधुमेह, मोटापा, हृदय संबंधी बीमारियों और कुछ प्रकार के कैंसर जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के प्रमुख कारण हैं.

याचिका में कहा गया है कि देश में हर साल होने वाली 60 लाख से अधिक मौतों के पीछे गैर-संचारी रोग जिम्मेदार हैं. याचिका के अनुसार, मधुमेह एक ऐसी ‘मूक महामारी’ के रूप में उभर रहा है, जिससे भारत में करीब हर चार में से एक व्यक्ति प्रभावित है.

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