बोफोर्स मामले का अंत: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले की अपील खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स मामले की सुनवाई बंद करदी और वकील अजय अग्रवाल की अपील खारिज कर दी. इसके साथ ही, लगभग 40 साल पुरानी कानूनी कार्यवाही का अंत हो गया है. यह अपील दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले को चुनौती देने वाली एकमात्र अपील थी, जिसमें न्यायमूर्ति आर.एस. सोढ़ी ने हिंदुजा बंधुओं और एबी बोफोर्स के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी थी.

सौजन्य से:- ETV Bharat
सुप्रीम कोर्ट ने बंद की बोफोर्स केस की सुनवाई, याचिका खारिज
दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं को बरी किया था. इसके खिलाफ की गई थी अपील.
Published : August 7, 2026 at 8:28 PM IST
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स मामले का पटाक्षेप कर दिया. इसके खिलाफ अपील को खारिज कर दिया गया. इस मामले के खारिज होने के साथ ही, लगभग 40 साल पुरानी कानूनी कार्यवाही का अंत हो गया है.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के 2005 के फैसले के खिलाफ वकील और बीजेपी नेता अजय के अग्रवाल की अपील पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया.
उस फैसले में तीन हिंदुजा भाइयों — श्रीचंद पी हिंदुजा, गोपीचंद पी हिंदुजा और प्रकाश पी हिंदुजा — और स्वीडिश हथियार बनाने वाली कंपनी एबी बोफोर्स को बरी कर दिया गया था.गुरुवार की सुनवाई में, वर्चुअल तरीके से पेश हुए अग्रवाल ने केस के रिकॉर्ड से दिवंगत प्रतिवादियों, श्रीचंद और गोपीचंद हिंदुजा के नाम हटाने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा. भाइयों में से प्रकाश हिंदुजा, जो यूरोप में हिंदुजा ग्रुप के चेयरमैन हैं, अब अकेले जीवित प्रतिवादी बचे हैं.हालांकि, बेंच ने कार्यवाही जारी रखने के आधार पर ही सवाल उठाए.
कोर्ट ने पूछा कि हिंदुजा बंधुओं और सीबीआई का मामला क्या है. पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, “सभी कार्यवाही रद्द कर दी गई थी. यह क्या है? कितने साल बीत गए?” हालांकि, अग्रवाल ने तर्क दिया कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अपनी अपील पहले ही खारिज कर दी गई थी क्योंकि एजेंसी को पहले ही उनकी याचिका में प्रतिवादी बनाया गया था और उसे उनके मामले में अपने तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई थी.
कोर्ट अपीलकर्ता की तर्कों से सहमत नहीं हुई. जब अग्रवाल ने स्थगन का अनुरोध किया, तो अदालत ने यह कहते हुए इनकार कर दिया, "स्थगन का कोई सवाल ही नहीं उठता. यह 2018 का मामला है. अपील खारिज की जाती है."
यह अपील दिल्ली हाईकोर्ट के 31 मई, 2005 के फैसले को चुनौती देने वाली एकमात्र अपील थी, जिसमें न्यायमूर्ति आर.एस. सोढ़ी ने हिंदुजा बंधुओं और एबी बोफोर्स के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी थी.
हाई कोर्ट ने सीबीआई द्वारा जांच के संचालन की आलोचना करते हुए कहा था कि अभियोजन पर लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि अंततः आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला साबित नहीं हो सका.
नवंबर 2018 में, सर्वोच्च न्यायालय ने 2005 के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपनी अपील को 4,522 दिनों की देरी को माफ करने से इनकार करते हुए खारिज कर दिया था. न्यायालय ने कहा कि जांच एजेंसी "असाधारण" देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रही, हालांकि उसने अग्रवाल की लंबित अपील में सीबीआई को अपनी दलीलें पेश करने की अनुमति दी थी.सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में अग्रवाल के अपील दायर करने के अधिकार पर भी सवाल उठाया था और पूछा था कि जांच एजेंसी की अपनी चुनौती विफल होने के बाद एक निजी व्यक्ति आपराधिक अभियोजन में अपील कैसे दायर कर सकता है.
बोफोर्स घोटाला 24 मार्च, 1986 को हस्ताक्षरित ₹1,437 करोड़ के रक्षा अनुबंध से निकला. इसके तहत भारत ने स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स से 400 155 मिमी हॉवित्जर तोपें खरीदने पर सहमति जताई थी. विवाद अप्रैल 1987 में तब शुरू हुआ जब स्वीडिश रेडियो ने आरोप लगाया कि भारत की नीति के विपरीत, इस अनुबंध को हासिल करने के लिए प्रभावशाली भारतीय राजनेताओं, रक्षा अधिकारियों और बिचौलियों को अवैध कमीशन का भुगतान किया गया था. इन आरोपों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की छवि को गंभीर रूप से धूमिल किया और 1989 के लोकसभा चुनाव में एक निर्णायक मुद्दा बन गया.
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