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चुनाव में फ्रीबीज पर सुप्रीम कोर्ट का फैसले से बदलेगी हिंदुस्तान की राजनीति।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी फ्रीबीज पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने मुफ्त योजनाओं को अनुचित ढंग से प्रभावित करने का माध्यम बताया है। चुनावों से पहले सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक रुख का असर भविष्य की चुनावी राजनीति और लोकतांत्रित विमर्श पर पड़ेगा।

22 जुलाई 2026 को 05:15 am बजे
चुनाव में फ्रीबीज पर सुप्रीम कोर्ट का फैसले से बदलेगी हिंदुस्तान की राजनीति।

सौजन्य से:- Navbharat Times

सुप्रीम कोर्ट में चुनावी फ्रीबीज पर दायर याचिका चार साल से लंबित है। याचिकाकर्ता ने मुफ्त योजनाओं को मतदाताओं को प्रभावित करने वाला बताया है। अदालत ने तत्काल सुनवाई से इनकार किया, लेकिन मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई है।

राजेश चौधरी: लोकतांत्रिक राजनीति में घोषणापत्र के जरिए चुनावी वादे नई बात नहीं। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में सरकारी खजाने से मुफ्त सुविधाएं, नकद सहायता और अन्य 'फ्रीबीज' की घोषणाओं का चलन नया है। इन पर रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई थी। वहीं, जब भी चुनावी मौसम आता है, इस मुद्दे पर चर्चा फिर से गर्म हो जाती है।

सुनवाई में देरी क्यों हुई

फ्रीबीज के खिलाफ दायर जनहित याचिका पिछले चार वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। हाल ही में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष शीघ्र सुनवाई का आग्रह किया गया। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने अदालत को बताया कि 2022 में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस गया, पर नियमित सुनवाई शुरू नहीं हुई। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने लंबित मामलों के भारी बोझ का हवाला दिया और तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। हालांकि उन्होंने संकेत दिया कि उचित समय पर सुनवाई होगी।

याचिका में कहा गया है कि चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से मुफ्त योजनाओं का वादा और मुफ्त उपहार देना (फ्रीबीज) मतदाताओं को अनुचित ढंग से प्रभावित करने का माध्यम बनता है। सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि फ्रीबीज देने वाले राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न जब्त किए जाएं या उनका पंजीकरण रद्द किया जाए। वैकल्पिक रूप से केंद्र सरकार को कानून बनाने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है। याचिका के मुताबिक, सरकारी खजाने से मुफ्त वस्तुएं या सेवाएं देने के चुनावी वादे चुनावी रिश्वत (इलेक्टोरल ब्राइबरी) जैसे हैं।

विकास बनाम मुफ्त उपहार

सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर फ्रीबीज को लेकर गंभीर चिंता जताता रहा है। इसी साल 19 फरवरी को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि यदि कोई राज्य रेवेन्यू सरप्लस में है, तो उसकी प्राथमिकता सड़क, अस्पताल और स्कूल जैसे बुनियादी ढांचे का विकास क्यों नहीं है? अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि चुनाव आते ही नई योजनाओं की घोषणाएं क्यों शुरू हो जाती हैं और राजनीतिक दलों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए।

इससे पहले 3 अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर विशेषज्ञ समिति गठित करने के संकेत दिए थे और कहा था कि लगभग सभी राजनीतिक दल मुफ्त योजनाओं का वादा करते हैं, इसलिए इस विषय पर खुली चर्चा से बचते हैं। 11 अगस्त 2022 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि करदाताओं को यह सवाल उठाने और जानने का अधिकार है कि उनके कर का पैसा बुनियादी ढांचे के विकास पर खर्च हो या मुफ्त योजनाओं पर। वहीं, 12 फरवरी 2025 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने चुनावी मुफ्त योजनाओं की आलोचना करते हुए कहा था कि लोगों को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, न कि परजीवी वर्ग में तब्दील किया जाए। उन्होंने कहा कि मुफ्त राशन, नकद सहायता लोगों में काम करने की इच्छा पर असर डालते हैं।

गहरा होगा असर

याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से 2013 के सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु राज्य फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। उसमें चुनावी घोषणापत्रों में किए गए वादों को न तो भ्रष्ट आचरण माना गया था और न ही जनप्रतिनिधित्व अधिनियम धारा 123 के तहत चुनावी भ्रष्टाचार। मौजूदा याचिका में बदले राजनीतिक-आर्थिक हालात में इस पर नए सिरे से विचार पर जोर दिया गया है। अगले वर्ष पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव हैं। सुप्रीम कोर्ट चुनावों से पहले इस पर संवैधानिक रुख स्पष्ट करता है, तो उसका असर सिर्फ इन चुनावों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य की चुनावी राजनीति और लोकतांत्रिक विमर्श पर भी पड़ेगा।

लेखक के बारे मेंअभिषेक पाण्डेयअभिषेक पाण्डेय नवभारत टाइम्स में डिजिटल में पत्रकार हैं। वे जुलाई- 2025 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के नवभारत टाइम्स, डिजिटल विंग से जुड़े। वह वर्तमान में नेशनल और दिल्ली डेस्क से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं। पत्रकारिता में बतौर रिपोर्टर और डेस्क पर काम करने का 4 वर्षों का अनुभव है। नवभारत टाइम्स में जुड़ने से पहले वह दैनिक जागरण में सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे। अभिषेक ने 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव 2024, महाकुंभ 2025 को काफी करीब से कवर किया है। अभी वह राष्ट्रीय स्तर पर हो रही सियासी उथल-पुथल, सामाजिक परिवर्तन और क्राइम से जुड़ी खबरों पर बारीकी से नजर रखते हैं।

विशेषज्ञता

उत्तर भारत के राज्यों की सियासी व आपराधिक घटनाक्रम पर अच्छी पकड़, किताबों के जरिए इतिहास को वर्तमान के पन्नों में खंगालने की कोशिश।

पत्रकारिता अनुभव

रामा यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद अभिषेक पाण्डेय ने दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में पत्रकारिता का शुरुआती ज्ञान लिया। इसके बाद उन्होंने कई संस्थानों के लिए फ्रीलांसिग की। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के लिए जारी होने वाली धनराशि में घोटाले का खुलासा, सरकारी राशन वितरकों द्वारा 'राशन चोरी' का भंड़ाफोड़ किया, साथ ही किसान आंदोलन की ग्राउंड रिपोर्टिंग की। इसके बाद साल 2022 में दैनिक जागरण के डिजिटल विंग में बतौर सब एडिटर के पद पर अपने करियर की औपचारिक शुरुआत की। यहां उन्होंने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की डेस्क पर अपनी पकड़ मजबूत की। बेहतरीन लेखनी और कार्य के प्रति समर्पण को ध्यान में रखते हुए संस्थान ने उन्हें 2024 में वरिष्ठ उप संपादक के पद पर प्रमोट किया। दैनिक जागरण में रहते हुए उन्होंने, खबरों का संपादन, एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया। इसके बाद अभिषेक पाण्डेय ने जुलाई 2025 में नवभारत टाइम्स के साथ अपनी पारी की शुरुआत की।

शिक्षा/पुरस्कार

मूल रूप से कानपुर से जुड़े अभिषेक पाण्डेय ने रामा यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन किया है। दैनिक जागरण में उन्हें तीन बार बेस्ट परफॉर्मर ऑफ द मंथ से सम्मानित किया गया था।... और पढ़ें

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