सुप्रीम कोर्ट की जांच एजेंसियों को सलाह: सजा दिलाने पर ध्यान दें
सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों को जमानत के मामलों पर समय बर्बाद करने के बजाय सजा दिलाने पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी। अदालत ने जमानत के मामलों में बढ़ोतरी और सजा दिलाने की दर में कमी पर चिंता जताई।

सौजन्य से:- Hindustan
सजा दिलाने पर ध्यान केंद्रित करे जांच एजेंसियां : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों को जमानत के विरोध में समय बर्बाद करने के बजाय अभियोजन पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी। अदालत ने जमानत के मामलों में हो रही बढ़ोतरी को लेकर चिंता व्यक्त की और सजा दिलाने की दर में कमी की बात की। उन्होंने जमानत आदेशों के लंबाई पर भी आपत्ति जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अभियोजन/जांच एजेंसियों को जमानत का विरोध करने के बजाए, आरोपियों को सजा दिला के पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते जमानत के मामलों पर चिंता जताते हुए यह टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने कहा कि जमानत के मामले आमतौर पर हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में ही होने चाहिए। पीठ ने छत्तीसगढ़ शराब घोटाले में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की जमानत रद्द करने से इनकार करते हुए यह फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से मिली चैतन्य बघेल की जमानत रद्द करने की मांग को लेकर प्रवर्तन निदेशालय और राज्य की आर्थिक अपराध शाखा की अपीलें खारिज कर दी। हालांकि पीठ ने हाईकोर्ट द्वारा जांच एजेंसियों के खिलाफ गई कुछ प्रतिकूल टिप्पणियों को हटा दिया और कहा कि वे पूरी तरह से अनावश्यक थीं。
सजा दिलाने की दर 40-50 प्रतिशत रह गई
मामले की सुनवाई के दौरान, जस्टिस बागची ने कहा कि यदि कोई सरकारी वकील और जांच अधिकारी जमानत जैसे मामलों पर इतना अधिक समय और ऊर्जा लगाते हैं, तो दोषी ठहराने की उनकी मुख्य जिम्मेदारी कम हो जाती है। उन्होंने बताया कि सजा दिलाने की दर घटकर लगभग 40 से 50 प्रतिशत रह गई है, जबकि सुप्रीम कोर्ट पर जमानत के आदेशों को चुनौती देने वाले मामलों का बोझ बना हुआ है।
जमानत रद्द करने की मांग संबंधी याचिकाएं बहुत बढ़ गई है
पीठ ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में जमानत रद्द करने की मांग वाली विशेष अनुमति याचिका की संख्या बहुत बढ़ गई है। यह हमारे लिए चिंता का विषय है। सीजेआई ने कहा कि आज-कल हर पीठ के समक्ष अंतरिम जमानत से जुड़े मामलों में कम से कम 10 विशेष अनुमति याचिका सूचीबद्ध होती हैं。
जज का समय सही तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के लंबे-चौड़े आदेश देने पर भी चिंता जताई, खासकर धन शोधन निवारण अधिनियम और गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम मामलों में। जस्टिस बागची ने कहा कि ‘हमने देखा है... धन शोधन के मामलों में 40 पन्नों का जमानत का आदेश, जबकि आतंकवाद निरोधक कानून यूएपीए के मामलों में 50 पेज के जमानत आदेश... ऐसा क्यों? उन्होंने कहा कि जजों का समय सही तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए।’
सुप्रीम कोर्ट भी कुछ हद तक जिम्मेदार
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने माना कि इस चलन के लिए सुप्रीम कोर्ट खुद भी कुछ हद तक जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि क्योंकि जब भी कोई छोटा आदेश पास किया जाता है, तो हम दखल देते हैं। उन्होंने आगे कहा कि जमानत के लंबे आदेशों के कारण अक्सर जज मामले की मेरिट पर विस्तार से टिप्पणी करते हैं।’ भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल ने सहमति जताई कि जमानत के आदेश भले ही दर्जनों पेज के न हों, लेकिन उनमें पर्याप्त कारण जरूर होने चाहिए।
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