हिंसा से ग्रस्त पारिवारिक विवादों में मध्यस्थता खतरनाक, जस्टिस नागरत्ना ने चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि जब पारिवारिक झगड़ों में हिंसा या शक्ति का गंभीर असंतुलन हो, तो मध्यस्थता न केवल उपयुक्त नहीं बल्कि खतरनाक भी हो सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में अदालत का न्याय प्राथमिक होना चाहिए और बच्चों की कस्टडी के लिये पेरेंटिंग प्लान और पेशेवर सलाह पर ध्यान देना चाहिए।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा है कि जिन पारिवारिक विवाद में हिंसा शामिल है, वहां अदालती न्याय की जगह मध्यस्थता का सहारा लेना खतरनाक भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शनिवार को पारिवारिक झगड़ों में मध्यस्थता के प्रति सावधान किया है। उनका कहना है कि जो महिलाएं हिंसा की शिकार हैं, जिन्हें कठोर नियंत्रण में रखा जाता है और जिन परिवारों में शक्ति का घोर असंतुलन है, वहां मध्यस्थता से और भी ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गुवाहाटी में सुप्रीम कोर्ट की फैमिली कोर्ट से जुड़ी समिति के रीजनल कॉन्फ्रेंस में कहा कि मध्यस्थता अदालती फैसले का स्थान नहीं ले सकती। उनका यह भी कहना है कि महिलाओं की मोल-भाव करने की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना कि उसका कानूनी हक।
पारिवारिक विवादों में मध्यस्थता पर जस्टिस नागरत्ना
जस्टिस नागरत्ना ने पारिवारिक विवाद को लेकर महिलाओं के नजरिए से कहा कि मध्यस्थता में तेजी से सुनवाई होती है, प्राइवेसी रहती है और गोपनीयता होती है।
इससे महिलाओं को स्त्रीधन की वापसी, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और किश्तों की जगह एकमुश्त रकम पर फैसला लेने में आसानी होती है।
लेकिन, उन्होंने साफ कहा कि जहां महिलाएं हिंसा से पीड़ित हैं और उन्हें दबाकर रखा गया है, वहां इसमें दिक्कत आती है। उन्होंने कहा, 'मैं यह जोर देकर कहना चाहती हूं कि जहां हिंसा होती है, जबरदस्ती नियंत्रण या शक्ति का गंभीर असंतुलन है, वहां इनमें से कुछ भी लागू नहीं होता।'
वहां मध्यस्थता न सिर्फ अनुचित है, बल्कि नुकसानदेह और खतरनाक भी साबित हो सकता है और इससे ज्यादा मानसिक प्रताड़ना मिल सकती है।
उन्होंने मध्यस्थता की मौजूदा प्रक्रिया में खामियों को भी उजागर किया है।
उनका सुझाव है कि बच्चों की कस्टडी और मुलाकात के अधिकारों को लेकर पेरेंटिंग प्लान पर गौर करना चाहिए, न कि कस्टडी पाने के आदेश पर।
उन्होंने इस प्रक्रिया में एक योग चाइल्ड साकोलॉजिस्ट की सलाह लेने की भी राय दी है।
फैमिली कोर्ट बन चुके हैं सिविल कोर्ट
उन्होंने साफ किया कि जब फैमिली कोर्ट बनाए गए तो यह कतई मकसद नहीं था कि यहां कानूनी लड़ाई को बढ़ावा मिले।
लेकिन हकीकत ये है कि अब ये अलग नाम से सिविल कोर्ट की तरह काम करते हैं, क्योंकि यहां लंबित मामलों का अंबार लग चुका है। जबकि, लोग विवादों का जल्द समाधान चाहते हैं। (पीटीआई इनपुट के साथ)
लेखक के बारे मेंअंजन कुमारअंजन कुमार, नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में असिस्टेंट एडिटर हैं और पिछले 24 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता कर रहे हैं। अंजन अप्रैल 2025 में नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से जुड़े और बीते 10 वर्षों से डिजिटल मीडिया में राजनीति,चुनाव, जुडिशरी, डिफेंस, विदेश,करेंट अफेयर्स और बिजनेस जैसे विषयों पर लिख रहे हैं। डिजिटल मीडिया से जुड़ने के शुरुआती वर्षों में ये देश की एक टॉप लीडरशिप के आधिकारिक और राजनीतिक भाषणों और उनके पुस्तकों के संपादन कार्यों में भी योगदान दे चुके हैं। इन्होंने करियर का आरंभ टेलीविजन पत्रकारिता से किया और 14 वर्षों तक विभिन्न टीवी न्यूज चैनलों में सेवाएं दीं। इस कार्यकाल में इन्होंने सहारा समय नेशनल न्यूज चैनल पर 2006 में कन्या भ्रूण हत्या पर किए गए एक ऐतिहासिक स्टिंग ऑपरेशन पर बने'कोख में कत्ल' प्रोग्राम सीरीज को प्रोड्यूस किया, जो उन दिनों भारतीय संसद में भी छाया रहा। यहीं पर इन्होंने अगले ही साल पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम आंदोलन से जुड़े कार्यक्रमों पर न्यूज सीरीज बनाए, जिसकी देश की मीडिया में काफी चर्चा हुई। आगे के वर्षों में इसी चैनल पर 'मुर्दा, मवेशी, माफिया' प्रोग्राम सीरिज को भी पेश किया, जो दिल्ली-एनसीआर में मरे हुए मवेशियों का मांस बेचने वाली माफिया के खतरनाक स्टिंग ऑपरेशन पर आधारित था। ये 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव और 2004 के आम चुनावों से लेकर 2024 के आम चुनावों और 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव तक को टीवी और डिजिटल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म के लिए कवर कर चुके हैं।... और पढ़ें
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