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पूर्व लोकसभा महासचिव ने चुनाव आयोग को दिया कड़ा सवाल: क्या निर्णय एकतरफ़ा था?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर आयोग के भीतर मतभेद की खबरों के बाद चुनाव आयोग ने बताया कि सभी कार्य संविधान धारा 324 और अधिनियम 2023 के तहत, बहु‑सदस्यीय निकाय की सर्वसम्मति से किए गए हैं। इसके जवाब में पूर्व महासचिव एवं संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने कहा कि जब आम सहमति न हो तो निर्णय बहुमत के आधार पर होना चाहिए, और उन्होंने आयोग के कुछ फैसलों को एकतरफा बताकर आलोचना की।

26 सितंबर 2026 को 02:04 pm बजे
पूर्व लोकसभा महासचिव ने चुनाव आयोग को दिया कड़ा सवाल: क्या निर्णय एकतरफ़ा था?

सौजन्य से:- ETV Bharat

'कानून मत सिखाइए, यह बताइए फैसले एकतरफा लिए थे या नहीं': चुनाव आयोग से पूर्व लोकसभा महासचिव के तीखे सवाल

निर्वाचन आयोग में मतभेद की खबर के बाद चुनाव आयोग ने स्पष्टीकरण दिया. जिस पर संविधान विशेषज्ञ ने कई सवाल उठाये. संतू दास की रिपोर्ट.

Published : September 26, 2026 at 6:44 PM IST

नई दिल्लीः मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर भारत निर्वाचन आयोग के शीर्ष स्तर पर मतभेदों की खबरें सामने आई हैं. इस पर चुनाव आयोग की ओर से स्पष्टीकरण भी आया. इन खबरों के बीच, लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि किसी विषय पर आम सहमति संभव न हो, तो निर्णय बहुमत के आधार पर ही लिया जाना चाहिए.

हाल ही में एक अंग्रेजी दैनिक द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया था कि 10 महीनों के भीतर कम से कम 14 बार, दो चुनाव आयुक्तों (ECs) विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव आयोग द्वारा चरणबद्ध तरीके से चलाए जा रहे 'विशेष गहन पुनरीक्षण' से जुड़े मामलों पर आपत्ति जताई थी.

जब यह रिपोर्ट सामने आई तो विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर अपने हमले तेज कर दिए हैं. विपक्ष ने उनके काम करने के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए हैं और उन पर सत्तारूढ़ भाजपा के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया है. उन्होंने स्पष्ट रूप से उनके इस्तीफे की मांग की है और उन्हें तुरंत गिरफ्तार करने का आह्वान किया है.

चुनाव आयोग ने अपनी हालिया विज्ञप्ति में कहा है कि एक संवैधानिक संस्था होने के नाते, वह संविधान के अनुच्छेद 324, वैधानिक नियमों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के सख्त दिशानिर्देशों के तहत काम करता है. यह उल्लेख करते हुए कि वह एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के रूप में काम करता है, चुनाव आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक संतुलन उसकी मानक और निरंतर चलने वाली प्रक्रियाएं हैं.

इन्हें पूरी पारदर्शिता, कानूनी अनुपालन और परिचालन की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए तैयार किया गया है. आयोग ने कहा कि उसके सभी कार्य कानूनों और आयोग के निर्देशों के अनुसार ही हुए हैं.

चुनाव आयोग ने कहा कि आयोग द्वारा जारी किए गए सभी आधिकारिक आदेश, निर्णय और प्रशासनिक निर्देश पूरी तरह से कानूनी रूप से मान्य हैं. ये सभी मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हैं. आयोग ने आगे कहा कि ड्राफ्ट तैयार होने के दौरान इसके सदस्यों द्वारा उठाए गए कार्य संबंधी कोई भी सवाल या सुझाव एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करना है.

चुनाव पैनल ने अपने बयान में कहा, "आयुक्तों द्वारा दिए गए सुझाव चुनावी प्रक्रियाओं में और सुधार करने के लिए थे. किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग विचार और टिप्पणियां आना एक सामान्य बात है. अंतिम निर्णय लेने से पहले ये सभी निर्णय लेने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा होते हैं. केवल तीनों आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का हर अधिकारी चुनावी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए आयोग को अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह अधिकृत है."

आयोग ने कहा कि पिछले 10 महीनों के भीतर लिखे गए कुछ विशिष्ट आंतरिक नोट या टिप्पणियों को उजागर करना और इसके मुकाबले मंजूरियों, फैसलों, निर्देशों और पहलों के एक बहुत बड़े हिस्से को नजरअंदाज करना, तस्वीर का केवल एक ही पहलू दिखाता है. चुनाव पैनल ने स्पष्ट किया कि 'विशेष गहन पुनरीक्षण' सहित उसके सभी निर्णय सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी के साथ लिए गए हैं.

क्या कहते हैं संविधान विशेषज्ञ

'ईटीवी भारत' से विशेष बातचीत में, चुनाव आयोग के बयान का जिक्र करते हुए आचार्य ने कहा, "चुनाव आयोग कानून के आधार पर एक स्पष्टीकरण जारी कर रहा है. लेकिन असल में तथ्य क्या हैं, वे यह नहीं बता रहे हैं. हर कोई जानता है कि चुनाव आयोग की स्थापना अनुच्छेद 324 के तहत की गई थी. लेकिन यहां सवाल अलग है. सवाल यह है कि क्या आप सर्वसम्मति से निर्णय ले रहे हैं? या फिर एकतरफा फैसला ले रहे हैं."

अखबार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि समाचार पत्र में जो आरोप आया है वह यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त इन सभी फैसलों को एकतरफा ले रहे हैं, और बाकी के दो चुनाव आयुक्तों को यह पता भी नहीं था कि कोई फैसला लिया जा चुका है.

आचार्य ने कहा, "अखबार में ऐसे कई उदाहरणों का हवाला दिया गया है. कोई भी समाचार पत्र बिना पुष्टि किए ऐसी बातें नहीं लिखता. वे अपनी कल्पना से कुछ नहीं कह रहे हैं. उन्होंने इसकी पुष्टि जरूर की होगी. अगर इसमें कोई सच्चाई नहीं होती, तो कोई भी अखबार इसे प्रकाशित नहीं करता."

चुनाव आयोग (पैनल) के बयान का जिक्र करते हुए निष्कर्ष के तौर पर उन्होंने कहा, "चुनाव आयोग को और अधिक स्पष्टता देनी चाहिए थी, लेकिन वह कुछ भी साफ नहीं कर रहा है. उन्होंने जनता के मन में उठ रहे संदेहों और आशंकाओं को दूर नहीं किया है. उन्होंने केवल कानून और संविधान के संबंध में सामान्य स्थिति की बात कह दी है. इसलिए, चुनाव आयोग की तरफ से एक वास्तविक स्पष्टीकरण आना अभी बाकी है."

लोकसभा के पूर्व महासचिव ने कहा, "फैसले बहुमत से लिए जाने चाहिए. अगर आम सहमति बनना संभव न हो, तो निर्णय बहुमत के आधार पर ही लिया जाना चाहिए."

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