सुप्रीम कोर्ट ने टोटलाइज़र प्रणाली पर केंद्र को जवाब‑देने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम में वोटों की गिनती के लिये टोटलाइज़र लागू करने में कानूनी या व्यावहारिक बाधा है या नहीं, इस पर केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण माँगा और चुनाव आयोग को अपना प्रस्ताव पेश करने को कहा। टोटलाइज़र कई ईवीएम के वोटों को एक साथ जोड़ता है जिससे बूथ‑वार परिणाम नहीं दिखते और मतदाता की सुरक्षा का दावा किया जाता है, पर चुनाव आयोग इसे मौजूदा कानून में निहित न होने और पारदर्शिता के जोखिम के कारण अस्वीकार करता है। विधि आयोग ने पहले संवेदनशील क्षेत्रों में इस प्रणाली की सिफारिश की थी।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम में दर्ज वोटों की गिनती के लिए ‘टोटलाइजर’ प्रणाली लागू करने को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
राजेश चौधरी, नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से पूछा कि ईवीएम में दर्ज वोटों की गिनती के लिए ‘टोटलाइजर’ प्रणाली लागू करने में क्या कोई कानूनी या व्यावहारिक बाधा है और इसके लागू होने से कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है या नहीं। अदालत ने चुनाव आयोग को भी इस संबंध में अपना प्रस्ताव केंद्र सरकार के समक्ष रखने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ तीन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इनमें मांग की गई है कि किसी लोकसभा क्षेत्र के नतीजे घोषित करते समय प्रत्येक बूथ पर मिले वोटों का अलग-अलग आंकड़ा सार्वजनिक करने के बजाय पूरे निर्वाचन क्षेत्र का संयुक्त परिणाम घोषित किया जाए।
क्या है टोटलाइजर?
टोटलाइजर ऐसी व्यवस्था है जिसमें कई ईवीएम के वोटों को एक साथ जोड़कर गिना जाता है। इससे किसी उम्मीदवार या राजनीतिक दल को यह पता नहीं चल सकेगा कि किसी खास मतदान केंद्र पर उसे कितने वोट मिले। इसका उद्देश्य मतदाताओं की निजता और चुनाव बाद संभावित प्रताड़ना या हिंसा से सुरक्षा बताया गया है। याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दलील दी कि यदि उदाहरण के लिए 14 ईवीएम के वोट एक साथ गिने जाएं तो किसी उम्मीदवार को किसी खास बूथ के मतदान पैटर्न की जानकारी नहीं मिलेगी। इससे उन इलाकों के मतदाताओं को राजनीतिक बदले की कार्रवाई से बचाया जा सकता है।
सीजेआई ने पूछा- लोकतंत्र को क्या फायदा होगा?
सीजेआई ने मौजूदा बूथवार गिनती व्यवस्था की पारदर्शिता का हवाला देते हुए सवाल किया कि टोटलाइजर से लोकतंत्र को आखिर क्या फायदा होगा। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में वोटों की गिनती खुली प्रक्रिया के तहत होती है और किसी गड़बड़ी या छेड़छाड़ की स्थिति में उसका पता लगाया जा सकता है। जस्टिस बागची ने हालांकि कहा कि सैद्धांतिक रूप से टोटलाइजर मतदाता की पसंद को गुमनाम रखने का अच्छा तरीका है। लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि जब इसके लिए मौजूदा कानून में स्पष्ट प्रावधान नहीं है तो अदालत इसके इस्तेमाल का निर्देश कैसे दे सकती है।
ईसीआई ने गिनाई आपत्तियां
चुनाव आयोग ने अपने जवाब में फिलहाल टोटलाइजर लागू करने का विरोध किया है। आयोग के मुताबिक संविधान, जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 और 1951 तथा चुनाव संचालन नियम, 1961 में इसके इस्तेमाल का कोई प्रावधान नहीं है। आयोग ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में फॉर्म 17सी के जरिए मतदान केंद्र पर डाले गए वोटों और ईवीएम में दर्ज वोटों का बूथवार मिलान होता है। यह व्यवस्था चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और खुद सत्यापन करने की क्षमता की “रीढ़” है। टोटलाइजर लागू होने पर कई ईवीएम के वोट एक साथ जुड़ जाएंगे और किसी एक ईवीएम में गड़बड़ी होने पर वह संयुक्त आंकड़े में छिप सकती है। आयोग ने यह भी कहा कि कई राजनीतिक दल इस प्रस्ताव का विरोध कर चुके हैं। 2016 में मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों से राय लेने पर 18 राज्य स्तरीय दलों ने इसका विरोध किया था।
विधि आयोग ने की थी सिफारिश
टोटलाइजर का प्रस्ताव नया नहीं है। चुनाव आयोग ने 2008 में कानून मंत्रालय से चुनाव संचालन नियमों में संशोधन की मांग की थी। बाद में विधि आयोग ने अपनी 255वीं रिपोर्ट में ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में टोटलाइजर के इस्तेमाल की सिफारिश की थी, जहां मतदाताओं को डराने या चुनाव बाद प्रताड़ित किए जाने की आशंका हो। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से इस पूरे मुद्दे पर अपना रुख बताने को कहा है।
लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें
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