हाईकोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण मामले को स्वयंसंयोजन करके शुरू की जांच, 7 साल की छात्रा की मौत के बाद
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बलरामपुर के एक स्कूल में 7 वर्षीय छात्रा की मृत्यु के बाद ध्वनि प्रदूषण संबंधी जनहित याचिका को स्वयंसंयोजन कर कार्यवाही शुरू की। न्यायालय ने कई सरकारी अधिकारियों को पक्षकार बनाते हुए नियमों के कार्यान्वयन और निगरानी की जांच का आदेश दिया, जबकि मौत और तेज़ आवाज़ के बीच कोई संबंध स्थापित नहीं किया गया। अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित है।

सौजन्य से:- thewirehindi.com
नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ध्वनि प्रदूषण के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की है. यह कदम बलरामपुर के एक स्कूल में दूसरी कक्षा की 7 वर्षीय छात्रा की मौत की खबरों के बाद उठाया गया है. बताया गया था कि घटना के समय पास से लाउडस्पीकर और म्यूजिक सिस्टम (डीजे) से लैस एक जुलूस गुजर रहा था.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना 22 सितंबर को बलरामपुर के भगौतीगंज स्थित डिवाइन पब्लिक स्कूल में हुई. मृत छात्रा की पहचान वैष्णवी तिवारी के रूप में हुई है. ख़बरों के मुताबिक, यह जुलूस गणपति उत्सव का हिस्सा था.
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजिव शुक्ला की खंडपीठ ने बुधवार (28 सितंबर) को मामले में स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका (पीआईएल) दर्ज करने का आदेश दिया. उस समय अदालत में ध्वनि प्रदूषण से संबंधित एक अन्य मामले की सुनवाई चल रही थी.
अदालत ने कहा कि यह घटना ध्वनि प्रदूषण की अनियंत्रित समस्या को लेकर बड़े सवाल खड़े करती है.
खंडपीठ ने कहा कि इस जनहित याचिका में ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों, मौजूदा व्यवस्था के तहत उठाए जा रहे कदमों और क्या नियमित निगरानी की जरूरत है, इन सभी पहलुओं की जांच की जाएगी.
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने तेज आवाज और बच्ची की मौत के बीच किसी तरह का संबंध स्थापित नहीं किया है.
अख़बार के मुताबिक, खंडपीठ ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण की व्यापक समस्या और इससे जुड़े कानूनी सुरक्षा उपायों को लागू करने के मुद्दे पर अलग से विचार किए जाने की जरूरत है. अदालत ने कहा कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था के बावजूद सार्वजनिक स्थानों पर ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 के उल्लंघन अक्सर देखने को मिलते हैं.
अदालत ने आम लोगों में ध्वनि प्रदूषण को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया. उसने कहा कि जागरूकता की कमी भी नियमों के उल्लंघन की एक वजह हो सकती है.
अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, लखनऊ के स्थानीय निकायों और प्रमुख सरकारी विभागों के अधिकारियों को मामले में पक्षकार बनाया है. बलरामपुर के जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और मुख्य चिकित्सा अधिकारी को भी मामले में पक्षकार बनाए जाने का निर्देश दिया गया है. राज्य सरकार से घटना को लेकर रिपोर्ट और ध्वनि नियंत्रण से जुड़े कानूनों को लागू करने के लिए उठाए गए या प्रस्तावित कदमों की जानकारी अदालत में पेश करने को कहा गया है.
इस मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी.
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