सुप्रीम कोर्ट ने दोहरे हत्याकांड में महिला को बरी करने का फैसला बरकरार रखा, डीएनए साक्ष्य अधूरा
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के 2014 के निर्णय को कायम रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने फोरेंसिक डीएनए पहेली को हल नहीं किया, जिससे परिस्थितियों की श्रृंखला पूरी तरह से अटूट नहीं रही। कोर्ट ने जोर दिया कि दोष सिद्ध होने के लिए हर कड़ी बेगुनाही की संभावनाओं को समाप्त कर दे, जबकि अधिकांश खून के नमूनों का डीएनए प्रोफ़ाइल बनाना संभव नहीं रहा।

सौजन्य से:- ETV Bharat
दोहरे हत्याकांड में महिला को बरी करने का फैसला बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- DNA पहेली अनसुलझी
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने 28 जुलाई, 2014 के अपने फैसले में आरोपी महिला के खिलाफ ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया था.
By Sumit Saxena
Published : October 3, 2026 at 5:03 PM IST
नई दिल्ली: एक क्राइम थ्रिलर की तरह सामने आए इस मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में अपनी सौतेली मां और सौतेले भाई की हत्या की आरोपी महिला के खिलाफ हर एक परिस्थितिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence) की बारीकी से पड़ताल की. इस मामले में एक फोरेंसिक ट्विस्ट शामिल था: सभी चीजों पर लगे खून के धब्बे लगभग एक ही समय पर एकत्र किए गए थे, फिर भी कुछ खून के धब्बे नष्ट हो गए जबकि एक सुरक्षित रहा.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह नोट किया कि अभियोजन पक्ष इस "डीएनए पहेली" को सुलझाने में नाकाम रहा — परिस्थितियों की कड़ी में दरार की संभावना ने सबूतों को अधूरा छोड़ दिया.
उच्च न्यायालय के बरी करने के फैसले को बरकरार रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि परिस्थितियों की कड़ी पूरी तरह से अचूक होनी चाहिए; दोष सिर्फ तभी स्थापित किया जा सकता है जब हर एक कड़ी बेगुनाही की संभावना को पूरी तरह खारिज कर दे.
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि यह हैरानी की बात है कि कैबिनेट (फर्नीचर) से लिए गए खुरचन और कैबिनेट से सूती धागे द्वारा उठाए गए एक नमूने को छोड़कर, अन्य सभी नमूने नष्ट हो गए.
पीठ ने 1 अक्टूबर के अपने फैसले में कहा, "दिलचस्प बात यह है कि कैबिनेट का कंट्रोल सैंपल फोरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया था. इसके अलावा, अगर सभी वस्तुओं पर खून के धब्बे लगभग एक ही समय पर एकत्र किए गए थे, तो अन्य खून के धब्बों का नष्ट हो जाना और एक ही स्थान पर मिले खून के धब्बे का नष्ट न होना ऐसी बात है जो हमें असमंजस में डालती है."
पीठ ने कहा कि कमरे में आरोपी का खून मिलना इस बात का इशारा है कि किसी समय आरोपी वहां मौजूद थी.
पीठ ने कहा कि अहम बात यह है कि आरोपी का खून मरने वाले के कपड़ों या उस कपड़े पर नहीं मिला जिससे कथित तौर पर उनका गला घोंटा गया था. पोस्टमार्टम से पता चला कि मौत गला घोंटने की वजह से हुई थी, जो शायद 5 से 7 दिन पहले हुई होगी. इससे यह पता नहीं चलता कि आरोपी महिला 31 अगस्त, 2011 को या किसी भी तारीख को वहां मौजूद थी और अभियोजन का केस खुद यह है कि आरोपी पहले भी नियमित तौर पर मृतक के घर जाती रही है.
पीठ ने कहा कि पहले किसी चोट की वजह से कैबिनेट पर खून गिरने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
पीठ ने कहा, "इसके अलावा, महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोपी का खून मरने वाले के कपड़ों या किसी ऐसे कपड़े या चीज पर नहीं मिला जिसका इस्तेमाल दोनों मृतकों का गला घोंटने के लिए किया गया हो. इसलिए, यह बात, भले ही इसे साबित मान लिया जाए, यह पुख्ता नहीं करती कि आरोपी ने ही अपराध किया है."
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के 28 जुलाई, 2014 के फैसले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया. उच्च न्यायालय ने आरोपी महिला अंचला उर्फ चंचला के खिलाफ ट्रायल कोर्ट के फैसले और उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि परिस्थितियों की श्रृंखला इतनी पूरी होनी चाहिए कि बेगुनाही की किसी भी उचित परिकल्पना को खारिज किया जा सके और यह संकेत मिले कि पूरी मानवीय संभावना के साथ यह कृत्य आरोपी द्वारा ही किया गया था. पीठ ने यह स्पष्ट किया कि एक दाग वाली चीज को छोड़कर, बाकी खून के धब्बे इस हद तक नष्ट हो चुके थे कि उनका डीएनए प्रोफाइल तैयार करना मुमकिन नहीं था.
पीठ ने कहा, "घटनास्थल से उठाए गए अन्य खून से सने कपड़े, जैसे कि रजाई का कवर, तकिए का कवर आदि, डीएनए प्रोफाइल क्यों नहीं बना सके, जबकि ट्रंक या कैबिनेट के ऊपर मिले खून से सना कपड़ा ऐसा कर सका, जब कि ऐसा लगता है कि खून उसी दिन यानी हत्या के दिन ही बहा था — यह एक ऐसा पहलू है जिसे साक्ष्य का मूल्यांकन करते समय हमें निश्चित रूप से ध्यान में रखना चाहिए."
पीठ ने इस बात पर विचार किया कि अपराध के दृश्य का पता कब चला; घटनास्थल से नमूने कब एकत्र किए गए; आरोपी को कब गिरफ्तार किया गया; आरोपी के खून का नमूना कब एकत्र किया गया; और नमूने को विश्लेषण के लिए फॉरेंसिक प्रयोगशाला में कब भेजा गया.
अभियोजन पक्ष का दावा
अभियोजन पक्ष का दावा था कि अपने सौतेले भाई को वसीयत में मिली अपने दिवंगत पिता की संपत्ति को हड़पने के लिए उस महिला ने दोनों की हत्या कर दी, जो हर दो से तीन महीने में अपनी सौतेली मां से मिलने आती थी.
उच्च न्यायालय ने कहा कि कथित उद्देश्य स्थापित नहीं हुआ और शिकायतकर्ता, जो मृतक महिला के पिता हैं, की गवाही पर संदेह जताया, क्योंकि वे पास में रहने के बावजूद छह से सात दिनों तक चुप रहे.
राज्य की अपील की जांच करते हुए, पीठ ने कहा कि दोषमुक्ति के फैसले तब तक बरकरार रहते हैं, जब तक कि निष्कर्ष विकृत या स्पष्ट रूप से साक्ष्यों के विपरीत न हों. पीठ ने कहा, "दोषी के बरी होने से होने वाला न्याय का हनन, किसी निर्दोष को सजा मिलने से होने वाले न्याय के हनन से कम नहीं है."
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि मौतें मानव वध थीं, लेकिन अभियोजन पक्ष यह संदेह से परे साबित नहीं कर सका कि वे 31 अगस्त और 1 सितंबर, 2011 की मध्य रात को हुई थीं. आखिरी बार देखे जाने वाले गवाह के रूप में शिकायतकर्ता का बयान बाद में जोड़े गए बदलावों के कारण अविश्वसनीय पाया गया.
पीठ ने कहा कि टॉवर-लिंक्ड कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDRs) के बिना आरोपी के इशारे पर घर की चाबियां और फोन बरामद होने की बात में विश्वसनीयता की कमी है.
पीठ ने टैक्सी चालक और होटल कर्मचारियों की गवाही पर भी विचार नहीं किया. पीठ ने कहा कि जांच अधिकारी यह समझाने में विफल रहे कि इन गवाहों की पहचान कैसे की गई थी, जिससे उनके फर्जी होने की संभावना बढ़ गई. अभियोजन पक्ष ने एक टैक्सी चालक से पूछताछ की थी, जिसने बयान दिया था कि वह 31 अगस्त, 2011 की शाम को आरोपी को चंबा से दियूर लाया था और उसी देर रात उसे वापस चंबा ले गया था जहां वह एक होटल में रुकी थी.
पीठ ने कहा, "हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रहा. इसके चलते, हमें उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता. उसके अनुसार अपील खारिज की जाती है."
क्या था मामला
7 सितंबर 2011 को, भागी राम नाम के एक व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दी कि उनकी बेटी पिछले 6-7 दिनों से लापता थी और उसके घर पर ताला लगा हुआ था. रिपोर्ट में उसके घर से दुर्गंध आने का जिक्र किया गया था. रिपोर्ट दर्ज होने पर, पुलिस टीम कथित तौर पर ताला तोड़कर घर में दाखिल हुई और उन्हें दो शव मिले, जो महिला और उसके नाबालिग बेटे के थे.
यह भी पढ़ें- 2008 अहमदाबाद बम धमाके: SC ने इंडियन मुजाहिदीन के दोषी की मौत की सजा के अमल पर लगाई रोक
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