योगी राज में कानून‑व्यवस्था का गिरता भरोसा, 'ठोंक दो' से 'बुलडोजर' तक
2017 से सत्ता में आए भाजपा‑योगी सरकार के 'ठोंक दो' और 'बुलडोजर' अभियानों ने न्यायपालिका की आलोचना को आमंत्रित किया है, जहाँ एक कैबिनेट मंत्री तक ने एक हत्याकांड के बाद बुलडोजर कार्रवाई की मांग की। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चेतावनी दी है कि ऐसी नीतियों से उत्तर प्रदेश 'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' बन सकता है, जहाँ नागरिक स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी।

सौजन्य से:- Navjivan
उत्तर प्रदेश: खोजते रह जाओगे योगी राज में कानून व्यवस्था...
दावा था कि महिलाएं गहने पहनकर रात के 12 बजे बिना डर के सड़कों पर घूम सकती हैं। भुक्तभोगियों के अनुसार, अब यूपी में ऐसा ‘रामराज्य’ है कि वे दिन में भी सुरक्षित नहीं हैं। 'ठोंक दो' और 'बुलडोजर राज' की परिणति इसी रूप में सामने आ सकती थी, जैसी इन दिनों है
- लचर हो चुकी है उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था
- कैबिनेट मंत्री तक अब बुलडोजर एक्शन की मांग करने लगे हैं
- हाईकोर्ट की टिप्पणी: ऑरवेलियन डिस्टोपिया बन जाएगा प्रदेश
उत्तर प्रदेश में 2017 में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद से ही उसके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपराधियों पर अंकुश लगाने के नाम पर लोकतांत्रिक न्याय प्रणाली को मुंह चिढ़ाने वाला जो अनुत्तरदायी 'ठोंक दो' और निरंकुश 'बुलडोजर राज' चला रखा है, उसकी परिणति एकमात्र इसी रूप में सामने आ सकती थी, जैसी इन दिनों आ रही है।
अपराधियों को जेल या जहन्नुम भेजकर जंगलराज खत्म करने की बहुप्रचारित डींग के विपरीत नौ से ज्यादा सालों से चले आ रहे 'ठोंक दो' अभियान से प्रदेश के आम लोगों का जान-माल पहले से किंचित भी ज्यादा सुरक्षित हुआ होता तो उसकी थोड़ी-बहुत 'सार्थकता' मान ली जाती। लेकिन इसके सर्वथा विपरीत उसके चलते सत्ता तंत्र की चेतनाएं इतनी दूषित हो गई हैं कि कैबिनेट मंत्री तक, अपनी पर आ जाए, तो धरना देकर 'एनकाउंटर' और 'बुलडोजर ऐक्शन' की मांग करने लगे हैं। जैसे ऐसा करना उनके द्वारा ली गई संविधान की शपथ को अतिरिक्त सम्मान प्रदान करता हो! सच तो यह है कि इसके उलट मध्यकालीन मूल्यों और नैतिकताओं में उनका विश्वास संदेह के सारे दायरों से बाहर हुआ जा रहा है।
गोंडा जिले के परसपुर थाना क्षेत्र के शाहपुर धनोवा इलाके में निषाद समाज के राजनीतिक कार्यकर्ता विनोद साहनी द्वारा की गई एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर उनकी नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी गई। पुलिस से नाराज मत्स्य पालन विभाग के कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने उसी सरकार के खिलाफ, जिसका वह हिस्सा हैं, पहले लखनऊ में किंग जार्ज मेडिकल कालेज के पोस्टमार्टम हाउस में धरना दिया, फिर गोंडा में भी। फिर उन्होंने हत्यारों के एन्काउन्टर और संपत्तियों पर बुलडोजर ऐक्शन की भी मांग कर डाली। उनकी यह मांग यह साफ करने के लिए पर्याप्त थी कि संविधान और कानून के राज में उनका कितना (अ)विश्वास है। आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष और सांसद चंद्रशेखर आजाद ने तो यह मांग तक कर डाली कि साहनी की हत्या की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए संजय निषाद मंत्री पद से इस्तीफा दे दें।
सबसे बड़ा सच यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कानून के राज के प्रति कतई कोई सम्मान न प्रदर्शित करने और 'ठोंक दो' जैसे 'अभियानों' में समूचे तंत्र के दुरुपयोग से प्रदेश के पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी इतने डिमारलाइज हो गए हैं कि उनके लिए ठीक से नौकरी कर पाना तक दूभर हो गया है। उनकी मुश्किल यह है कि सरकार का रवैया कानून के शासन को प्रशासनिक बाधा मानने वाला है, जो न्यायिक कसौटी पर कहीं टिकता नहीं और उसकी जिम्मेदारी अंततः अधिकारियों को ही 'भुगतनी' पड़ती है।
मिसाल के तौर पर पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी एक टिप्पणी में अधिकारियों को यह तक सुना दिया कि नौकरशाही और पुलिस का यही रवैया रहा, तो प्रदेश ऐसे 'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' (यानी दमनकारी और क्रूर राज्य) में बदल जाएगा, जिसमें नागरिकों की स्वतंत्रता पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी के विरुद्ध पुलिस द्वारा ढोंग के तौर पर जारी कानूनी नोटिसों और मनगढ़ंत कहानियों की बिना पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को याद रखना चाहिए कि उनका कर्तव्य भारत के संविधान के प्रति निष्ठा रखना है, किसी राजनीतिक सत्ता या आका के प्रति नहीं। नोएडा में मजदूर आंदोलन से जुड़े इस मामले में कोर्ट ने यह भी कहा कि गौतमबुद्धनगर (नोएडा) की तत्कालीन जिलाधिकारी मेधा रूपम ने बिना किसी ठोस सबूत के, सिर्फ पुलिस की रिपोर्ट पर आंखें मूंदकर आकृति पर एनएसए लगा दिया ताकि उससे डरकर दूसरे लोग आवाज उठाने की हिम्मत न करें।
कोर्ट ने मेधा रूपम की निंदा करते हुए उनके और संबंधित दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से कटौती करके आकृति को पांच लाख रुपयों का मुआवजा देने और उनकी 'गंभीर लापरवाही' को उनके सर्विस रिकॉर्ड में 'डिस्प्लेज़र' (नाखुशी) के रूप में दर्ज करने का आदेश भी दिया। लेकिन पता चला है कि प्रदेश सरकार ने इस आदेश को मानने के बजाय उसके विरुद्ध अपील करने का फैसला किया है।
इसी हाईकोर्ट द्वारा पिछले दो वर्षों के आदेशों के विश्लेषण से उजागर हुआ है कि प्रदेश में पुलिस और प्रशासन ने एनएसए एवं गुंडा ऐक्ट लगाने का एक ढर्रा बना लिया है, जिसमें जिलाधिकारियों के पास पहले से टाइप या छपे-छपाए फॉर्मेट होते हैं और उनमें बिना सोचे-विचारे संबंधित व्यक्ति का नाम भरकर उस पर एनएसए लगाने का आदेश जारी कर दिया जाता है। गत मई में संभल में एक मामले में वहां के जिलाधिकारी ने घर की चारदीवारी के भीतर गोकशी के आरोप पर भी अभियुक्त पर एनएसए लगा दिया था, जिसे कोर्ट ने यह कहते हुए रद्द कर दिया कि उससे सार्वजनिक व्यवस्था को कोई खतरा नहीं था।
हद तो तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में शामिल छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक या दमनकारी कार्रवाई न करने के आदेश के बावजूद गौतमबुद्धनगर पुलिस कमिश्नरेट में एसीपी और एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट रवि शंकर मिश्रा ने गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के कानून के छात्र अक्षत त्रिपाठी कर कार्रवाई कर दी। उसे नोटिस जारी कर उस पर 'सरकार विरोधी भड़काऊ बातें' करने का आरोप लगाते हुए 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड भरने का आदेश दे डाला।
मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में आया, तो उसने पूछा कि मजिस्ट्रेट की यह मजाल कैसे हुई कि वह उसके आदेश का उल्लंघन करे? इसके बाद रविशंकर मिश्रा और सम्बंधित पुलिस सब-इंस्पेक्टर शिवा पांडे को निलंबित किया गया।
गत वर्ष अप्रैल में प्रतापगढ़ जिले के कंधई थाने के प्रभारी गुलाब सिंह सोनकर ने सर्वोच्च न्यायालय की मनाही के बावजूद एक याची को गिरफ्तार कर उससे मारपीट तक कर डाली थी। कहा था कि 'मैं किसी कोर्ट का आदेश नहीं मानूंगा और तुम्हारा सारा हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट निकाल दूंगा।' याची के अनुसार न्यायालय के 28 मार्च 2025 के सुरक्षा आदेश के बावजूद थाना प्रभारी ने 23 अप्रैल 2025 को उसे उसके काम की जगह से घसीटा, गिरफ्तार किया और पीटा।
न्यायालय ने प्रदेश के गृह विभाग को इसकी जांच करने का आदेश दिया तो याची की बातों की पुष्टि हुई। तब न्यायालय ने यह कहते हुए थाना प्रभारी को कड़ी फटकार लगाई कि पुलिस की वर्दी की आड़ में किसी भी अधिकारी को न्याय की धारा को दूषित करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
गत जून में इलाहाबाद हाईकोर्ट को एक मामले में कहना पड़ा था कि पुलिस अधिकारी राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए संविधान की अवहेलना करते हैं। कुछ ही दिनों पहले कोर्ट को देवरिया जिले के पुलिस अधीक्षक और एक थानाप्रभारी को अवैध हिरासत के एक मामले में 'झूठों का झुंड' कहा था और पीड़ितों को थाना प्रभारी के वेतन से मुआवजा देने का निर्देश देना पड़ा था। कोर्ट ने पुलिस की "हाफ-एनकाउंटर" की कहानियों पर भी सवाल उठाए और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने के लिए पुलिस तंत्र की खिंचाई की थी।
प्रदेश के लोग याद दिलाते हैं कि 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दावा किया था कि योगी ने प्रदेश में ऐसा रामराज्य ला दिया है कि 16 साल की युवती भी गहने पहनकर रात के 12 बजे बिना डर के सड़कों पर घूम सकती है, लेकिन भुक्तभोगियों के अनुसार, अब प्रदेश में ऐसा ‘रामराज्य’ है कि युवतियां दिन में भी सुरक्षित नहीं हैं।
गत बारह सितंबर को लखनऊ में बीजेपी के प्रदेश मुख्यालय में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा 'सेवा संकल्प अभियान' को लेकर बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछने वाली स्वतंत्र पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव के साथ हुई बदसलूकी भी इसकी एक मिसाल है। दिव्या का 'कुसूर' बस इतना था कि मुख्यमंत्री पत्रकारों के सवाल लिए बिना जाने लगे, तो उसने तेज आवाज में इसका विरोध किया और सवाल पूछा। बीजेपी समर्थकों और नेताओं द्वारा उसको घेरकर अपशब्द कहे गए और दुर्व्यवहार किया गया। धमकियां भी दी गईं कि उसके घर पर बुलडोजर चला दिया जाएगा।
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 9 वर्षों से ज्यादा के योगी राज में पुलिस और अपराधियों के बीच 17,000 से अधिक 'एनकाउंटर' हुए हैं। इनमें 289 कथित कुख्यात अपराधियों को मारा, हजारों को घायल और 34,000 से अधिक को गिरफ्तार किया गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन एनकाउंटरों की कार्यप्रणाली, पैरों में गोली मारने के पैटर्न और स्वतंत्र जांच को लेकर पुलिस के दावों पर कई बार सवाल उठाए हैं, फिर भी इन पर अंकुश नहीं लग पाया है।
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. रामबहादुर वर्मा कहते हैं कि इन एनकाउंटरों का सच समझने के लिए जानना जरूरी है कि प्रदेश की जो पुलिस इन दिनों ‘मुठभेड़ बहादुर’ बनी हुई है, उसका आज़ादी के पहले से ही एक खास तरह का सामंती और अभिजनवादी वर्गचरित्र है और पुलिस सुधारों के अभाव में वह अभी भी इससे मुक्त नहीं हो पाई है।
इसी का कुफल है कि जो दलित, पीड़ित, वंचित और अल्पसंख्यक समुदाय नए-पुराने सामंतों, पुलिस और अपराधियों सबकी कारगुजारियों की सबसे ज्यादा कीमत चुकाते हैं, पुलिस द्वारा अपराधी करार देकर मुठभेड़ में मार दिए जाने वाले युवा भी सर्वाधिक उन्हीं के होते हैं। कई बार वे पुलिसके अत्याचारों के प्रतिरोध की भी कीमत चुकाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश को दरकिनार करके बुलडोजर ऐक्शन भी सबसे ज्यादा इन्हीं के विरुद्ध होता है। लेकिन योगी की सरकार को ऐसी किसी भी समझदारी से वास्ता रखना गवारा नहीं है।
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