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सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण न्याय का ‘बरगद’ कहा CJI सूर्यकांत, विकास‑संरक्षण में संतुलन जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण न्याय में बरगद के पेड़ जैसा दृढ़ स्थान अपनाया, बताया कि संरक्षण और विकास विरोधी नहीं बल्कि साथ-साथ चलने चाहिए। अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण को मौलिक अधिकार मानते हुए, न्यायालय ने ‘पारिस्थितिकी‑केंद्रित आनुपातिकता’ की अवधारणा को लागू करने की जरूरत पर बल दिया और जलवायु परिवर्तन के अधिकार‑प्रभावों को उजागर किया।

20 सितंबर 2026 को 10:05 am बजे
सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण न्याय का ‘बरगद’ कहा CJI सूर्यकांत, विकास‑संरक्षण में संतुलन जरूरी

सौजन्य से:- Navbharat Times

CJI सूर्य कांत ने सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण न्याय का ‘बरगद का पेड़’ बताते हुए कहा कि विकास और संरक्षण में टकराव नहीं, बल्कि संतुलन जरूरी है। उन्होंने कहा कि स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार मौलिक अधिकार है और जलवायु परिवर्तन का असर समानता, आजीविका और स्वास्थ्य जैसे अधिकारों पर भी पड़ सकता है।

नई दिल्ली: पर्यावरण और पारिस्थितिकी की सुरक्षा में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका का जिक्र करते हुए CJI सूर्यकांत ने शनिवार को शीर्ष अदालत को पर्यावरण न्याय का ‘बरगद का पेड़’ बताया। उन्होंने कहा कि संरक्षण और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण ( NGT ) की ओर से आयोजित ‘पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य’ कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए CJI ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों और न्यायपालिका की भूमिका पर विस्तार से बात की।

CJI सूर्य कांत ने कहा कि पर्यावरण की सुरक्षा के लिए संविधान में प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन संविधान के शब्द केवल बीज की तरह हैं। इन्हें अंकुरित होने और जीवन पाने के लिए न्यायिक समझ के पोषण की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इसी भूमिका को निभाया है। उनके मुताबिक, शीर्ष अदालत पर्यावरण न्याय के ‘बरगद के पेड़’ की तरह मजबूती से खड़ी रही है, जिसकी जड़ें भारत के सभ्यतागत मूल्यों में गहरी हैं और जिसकी शाखाएं आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करती हैं।

‘संरक्षण के बिना प्रगति मृगतृष्णा’

CJI ने कहा कि दशकों से सुप्रीम कोर्ट इस विचार का समर्थन करता रहा है कि संरक्षण के बिना प्रगति एक ऐसी मृगतृष्णा है, जो पारिस्थितिक विनाश के रेगिस्तान में गायब हो जाती है। उन्होंने कहा कि अदालत के फैसलों में इस बात पर जोर दिया गया है कि प्रकृति की रक्षा करना केवल परोपकार का कार्य नहीं, बल्कि आत्म-संरक्षण है। यह जीवन की निरंतरता में किया जाने वाला निवेश है।

अनुच्छेद 21 के तहत प्रदूषण मुक्त पर्यावरण का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट के सक्रिय दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि शीर्ष अदालत ने प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के अधिकार को अनुच्छेद 21 में सीधे शामिल करके इसे मौलिक अधिकार बनाया है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण से जुड़े न्यायिक दृष्टिकोण का यही क्रम आज तक आगे बढ़ा है और हाल में सुप्रीम कोर्ट ने ‘पारिस्थितिकी-केंद्रित आनुपातिकता’ की अवधारणा को स्पष्ट किया है।

विकास की अनुमति, लेकिन शर्तों और जवाबदेही के साथ

CJI ने कहा कि ‘पारिस्थितिकी-केंद्रित आनुपातिकता’ का अर्थ यह है कि पर्यावरण संरक्षण मजबूत होना चाहिए, लेकिन इतना विवेकपूर्ण भी होना चाहिए कि वह दुनिया के मौजूदा स्वरूप के साथ तालमेल बैठा सके। उन्होंने कहा कि इस अवधारणा के तहत विकास की अनुमति देने का व्यावहारिक तरीका यह है कि उसके साथ लागू करने योग्य शर्तें, विशेषज्ञों की निगरानी, बहाली, क्षतिपूरक वनीकरण और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

जलवायु परिवर्तन से मौलिक अधिकार भी प्रभावित

CJI सूर्यकांत ने कहा कि हालिया भारतीय जलवायु न्यायशास्त्र ने इस मुद्दे को संवैधानिक रूप से और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। उन्होंने कहा कि न्यायशास्त्र यह मानता है कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव समानता, आजीविका और स्वास्थ्य जैसे मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके साथ ही यह उन आवश्यक परिस्थितियों को भी प्रभावित कर सकता है, जो इन अधिकारों का सार्थक रूप से आनंद लेने के लिए जरूरी हैं।

लेखक के बारे मेंअशोक उपाध्यायअशोक उपाध्याय, नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क पर काम करने का 12 साल का अनुभव। साल 2014 में नवभारत टाइम्स हिंदी अखबार से पत्रकारिता के सफर की शुरुआत की थी। पॉलिटिक्स और क्राइम बीट पर रिपोर्टिंग का काफी अनुभव है। अमर उजाला देहरादून में भी सेंट्रल डेस्क पर काम किया है। साथ ही कई चुनावों में ग्राउंड रिपोर्टिंग की है। पिछले 6 साल से NBT डिजिटल में न्यूज डेस्क पर काम कर रहे हैं। गूगल ट्रेंड्स को पकड़ने की अच्छी समझ है।

विशेषज्ञता- राजनीति, क्राइम की खबरों पर अच्छी पकड़ के साथ करंट अफेयर्स और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अच्छा खासा अनुभव है। करंट टॉपिक पर विश्लेषण और ओपिनियन लिखने में खास रुचि है।

पत्रकारिता अनुभव: प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 12 साल से कार्यरत हैं।

JIMMC नोएडा से साल 2013 में पत्रकारिता की पढ़ाई की है। इससे पहले साल 2010 में एमएमएच कॉलेज गाजियाबाद (सीसीएस यूनिवर्सिटी मेरठ) से राजनीतिक शास्त्र में मास्टर डिग्री हासिल की। लोक प्रशासन विषय पर खास पकड़ है। पत्रकारिता से पहले यूपीएससी और उत्तराखंड और यूपी पीसीएस एग्जाम की तैयारी के दौरान समाजशास्त्र, संविधान समेत कई विषयों का अध्ययन किया। संवेदनशील मुद्दों पर लिखने की खास कला है। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कई मार्मिक लेख लिखे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए लोगों की समस्याओं के समाधान का प्रयास किया है, कई बार सफलता भी मिली है। पत्रकारिता में आगे और बेहतर सीखने और समझने का क्रम जारी है।... और पढ़ें

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