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सुप्रीम कोर्ट ने दवा कंपनियों की ‘फ्रीबी’ पर रोक हेतु समिति गठन का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों को गिफ्ट, यात्रा और हॉस्पिटैलिटी जैसी सुविधाएँ देने वाली दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं को नियमन करने के लिए केंद्र सरकार को एक सलाहकार समिति बनाकर उसकी सिफारिशों पर अनुपालन हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई 29 जनवरी को निर्धारित की गई है और समिति संबंधित पक्षों के सुझावों पर विचार कर वैधानिक उपाय प्रस्तावित करेगी।

8 अक्टूबर 2026 को 12:05 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने दवा कंपनियों की ‘फ्रीबी’ पर रोक हेतु समिति गठन का आदेश दिया

सौजन्य से:- Navbharat Times

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों को गिफ्ट, यात्रा और हॉस्पिटैलिटी जैसे लाभ देने वाली दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं पर वैधानिक नियंत्रण की जरूरत पर समिति बनाने को कहा है। कोर्ट ने केंद्र से अनुपालन हलफनामा मांगा और मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को तय की।

नई दिल्ली: डॉक्टरों को प्रभावित करने के लिए दवा कंपनियों की ओर से दिए जाने वाले गिफ्ट, यात्रा, हॉस्पिटैलिटी और अन्य प्रलोभनों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को फार्मास्युटिकल कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं पर रोक के लिए वैधानिक नियम बनाने की जरूरत पर सिफारिश देने वाली समिति गठित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने केंद्र से समिति की सिफारिशों पर कार्रवाई संबंधी अनुपालन हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि समिति संबंधित पक्षों के सुझावों और रिप्रजेंटेशन पर विचार कर केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें देगी।

डॉक्टरों पर कार्रवाई, कंपनियों पर क्या?

मामला दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच कथित अनैतिक लेन-देन और मार्केटिंग प्रथाओं को नियंत्रित करने से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने सवाल उठाया कि मौजूदा व्यवस्था में डॉक्टरों को दवा कंपनियों से गिफ्ट या अन्य लाभ लेने पर कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन ऐसे लाभ देने वाली फार्मा कंपनियों को दंडित करने के लिए समान वैधानिक व्यवस्था नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इस असमानता के कारण दवा कंपनियां डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन को प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने सरकार को वैधानिक व्यवस्था बनाने का निर्देश देने या तब तक अंतरिम दिशानिर्देश तय करने की मांग की।

UCPMP को कानूनी ताकत देने पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट पहले ही Uniform Code for Pharmaceutical Marketing Practices (UCPMP), 2024 के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठा चुका है। कोर्ट ने पूछा था कि जब इस कोड को लागू कराने के लिए पर्याप्त वैधानिक तंत्र नहीं है तो इसकी अनिवार्यता कितनी प्रभावी होगी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से बताया था कि फार्मास्युटिकल विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग और विधि कार्य विभाग के बीच इस मुद्दे पर विचार-विमर्श हुआ है। केंद्र ने कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं को नियंत्रित करने के लिए वैधानिक व्यवस्था की जरूरत और उसके स्वरूप पर विचार करने के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित करने का निर्णय लिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी जताई थी चिंता

याचिकाकर्ताओं ने 2022 के सुप्रीम कोर्ट के Apex Laboratories मामले के फैसले का भी हवाला दिया। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि डॉक्टरों और मरीजों के बीच एक तरह का विश्वास आधारित रिश्ता होता है और डॉक्टरों को दिए जाने वाले लाभ उनके प्रिस्क्रिप्शन को प्रभावित कर सकते हैं। कोर्ट ने डॉक्टरों को गिफ्ट, इलेक्ट्रॉनिक सामान, विदेश यात्राओं और मेडिकल कॉन्फ्रेंस के खर्च जैसे लाभ देने की प्रथा को समाज के लिए नुकसानदेह चक्र बताया था। अब नई समिति यह देखेगी कि दवा कंपनियों की ऐसी गतिविधियों पर रोक के लिए कानून जरूरी है या नहीं और अगर जरूरी है तो उसका स्वरूप क्या हो।

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी, नवभारत टाइम्स में लीगल एडिटर हैं। वह 22 साल से भी ज्यादा वर्षों से लीगल रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शुरुआत में वह दिल्ली की निचली अदालत और सीबीआई कवर करते थे और बाद में वह दिल्ली हाई कोर्ट और फिर लगातार डेढ़ दशक से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे हैं। इस दौरान राजेश ने देश के तमाम हाई प्रोफाइल केस नीतीश कटारा मर्डर केस, जेसिक लाल केस, बोफोर्स केस, उपहार केस, पार्लियामेंट अटैक केस, प्रिय दर्शनी मट्टू केस से लेकर तमाम संवैधानिक मसले कवर किए जिनमें अनुच्छेद-370, तीन तलाक, निजता का अधिकार, होमो सेक्सुअलिटी को अपराध से बाहर करने का मामला और राम मंदिर मसले अहम है। राजेश ने इस 22 साल के करियर के दौरान दो साल 2006 से लेकर 2007 के सितंबर तक सहारा समय टीवी चैनल में भी बतौर लीगल संवावददाता काम किया। इसके बाद दोबारा वह नवभारत टाइम्स आए और उसके बाद लगातार कानूनी अफेयर्स को कवर करते रहे। नेशनल ब्यूरो में रहते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय को कवर करने के साथ साथ कानून के विषय पर लगातार एडिट पेज पर लिख रहे हैं। साथ ही लगातार ऑनलाइन माध्यम के लिए भी सक्रिय रिपोर्टिंग करते रहे हैं और ..कोर्ट रूम..नाम के एक साप्ताहिक विडियो इंटरव्यू भी लगातार देते हैं जिनमें सप्ताह भर के मुख्य कानूनी मसले पर उनका साक्षात्कार प्रसारित होता है। इसके अलावा वह लगातार लीगल मसले पर लीगल फोरम नामक कॉलम भी लिखते रहे हैं। उन्होंने दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में एमएससी किया है। साथ ही उन्होंने जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा किया और एलएलबी भी कर रखा है।... और पढ़ें

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