भूख हड़ताल के दौरान सरकार जबरदस्ती खाना खिला सकती है क्या?
भारतीय कानून के तहत सरकार की यह क्या है कि किसी भी सक्षम वयस्क को जबरदस्ती खाना खिलाने की इजाजत नहीं है, लेकिन जीवन खतरे में होने पर चिकित्सक हस्तक्षेप कर सकते हैं। दिल्ली HC ने सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य निगरानी का निर्देश दिया।

सौजन्य से:- ABP News
Sonam Wangchuk Hunger Strike: क्या सोनम वांगचुक को जबरन खाना खिला सकती है सरकार, क्या कहता है कानून?
Sonam Wangchuk Hunger Strike: सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के बीच लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या उन्हें जबरदस्ती खाना खिलाया जा सकता है. आइए जानते हैं.
- सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से कानूनी बहस छिड़ी।
- सक्षम वयस्क को जबरन खिलाना भारतीय कानून में वर्जित है।
- जीवन खतरे में होने पर चिकित्सक हस्तक्षेप कर सकते हैं।
- दिल्ली HC ने सोनम के स्वास्थ्य निगरानी का निर्देश दिया।
Sonam Wangchuk Hunger Strike: दिल्ली के जंतर मंतर पर 21 दिन की भूख हड़ताल के बाद शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को पुलिस के ले जाने से एक बार फिर से एक बड़ी बहस छिड़ गई है. लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के दौरान सरकार के दखल की कानूनी सीमाएं क्या हैं. जिस तरफ समर्थकों का यह आरोप है कि पुलिस ने उन्हें जबरदस्ती हटाया वहीं अब यह सवाल भी सामने आ रहा है कि क्या सरकार किसी भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति को खाना खिलाने या फिर इलाज करने के लिए कानूनी तौर पर मजबूर कर सकती है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.
क्या कहता है कानून?
भारतीय कानून के तहत ऐसा कोई भी नियम नहीं है जो सरकार को किसी ऐसे मानसिक रूप से सक्षम वयस्क को जबरदस्ती खाना खिलाने की इजाजत दे जिसने अपनी मर्जी से भूख हड़ताल का फैसला किया हो. हालांकि कानूनी स्थिति तब जटिल हो जाती है जब प्रदर्शनकारी की जान को तुरंत खतरा हो. ऐसे मामले में सरकार की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह जीवन की रक्षा करे.
संवैधानिक अधिकार और सरकार का कर्तव्य
यह कानूनी बहस दो संवैधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने पर केंद्रित है. संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन का अधिकार देता है. इस अनुच्छेद से किसी व्यक्ति के जीवन को गंभीर खतरा होने पर उसकी रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है.
इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण भूख हड़ताल को लोकतांत्रिक विरोध और अभिव्यक्ति की आजादी का भी एक जायज तरीका माना है. अदालतों का आमतौर पर यह मानना रहा है कि सरकार को अपनी मर्जी से की गई भूख हड़ताल का सम्मान करना चाहिए जब तक कि जान बचाने के लिए मेडिकल दखल काफी ज्यादा जरूरी ना हो जाए.
सोनम वांगचुक के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने अधिकारियों को यह निर्देश दिया कि वह लगातार उनके स्वास्थ्य पर नजर रखें और उचित चिकित्सा देखभाल सुनिश्चित करें. हालांकि अदालत ने खास तौर से यह आदेश नहीं दिया कि उन्हें जबरदस्ती खाना खिलाया जाए.
क्या भूख हड़ताल करना गैर कानूनी है?
भारत में भूख हड़ताल करना अपने आप में कोई भी आपराधिक अपराध नहीं है. पहले आत्महत्या की कोशिश भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत एक दंडनीय अपराध थी. हालांकि मेंटल हेल्थ केयर एक्ट 2017 और भारतीय न्याय संहिता के बाद आम भूख हड़ताल करने वाले व्यक्तियों को सिर्फ इस वजह से अपराधी नहीं माना जाता क्योंकि वह खाना खाने से इनकार करते हैं.
हालांकि इसमें भी एक अपवाद है. भारतीय न्याय संहिता की धारा 226 के तहत कानूनी कार्रवाई हो सकती है अगर कोई भी व्यक्ति ऐसा काम खास तौर पर इस वजह से करता है ताकि किसी भी सरकारी कर्मचारी को उसके आधिकारिक कर्तव्य निभाने से रोका जा सके.
जबरदस्ती खाना खिलाने पर मेडिकल नैतिकता
अंतर्राष्ट्रीय मेडिकल नैतिकता भी सक्षम वयस्कों को जबरदस्ती खाना खिलाने के खिलाफ है. वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के माल्टा घोषणा पत्र के मुताबिक मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति को जबरदस्ती खाना खिलाना नैतिक रूप से गलत माना जाता है. असल में भारत में डॉक्टर आमतौर पर प्रदर्शनकारियों के फैसले का सम्मान करते हैं. ऐसा तब तक जब तक कि उस व्यक्ति की हालत गंभीर न हो जाए. अगर व्यक्ति बेहोश हो जाता है या फिर उसकी जान को खतरा पैदा करने वाली मेडिकल स्थिति पैदा हो जाती है तो डॉक्टर जान बचाने के लिए इमरजेंसी इलाज जैसे कि नसों के जरिए फ्लूइड देना, लाइफ सपोर्ट या फिर दूसरे जरूरी उपाय शुरू कर सकते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति से मंजूरी लेना मुमकिन नहीं है.
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पुराने मामलों से क्या पता चलता है?
भारत में कई हाई प्रोफाइल भूख हड़ताल हुई हैं जिनसे यह पता चलता है कि अधिकारियों ने ऐसी स्थिति को कैसे संभाला है. मणिपुर की एक्टिविस्ट इरोम शर्मिला की 16 साल लंबी भूख हड़ताल के दौरान उन्हें बार-बार हिरासत में लिया गया और नेसोगैस्ट्रिक ट्यूब के जरिए खाना खिलाया गया. हालांकि यह सब मेंटल हेल्थ केयर एक्ट लागू होने से पहले हुआ था इस वजह से उस समय की कानूनी स्थिति आज की स्थिति से अलग थी.
हाल ही में 2024 में किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल की भूख हड़ताल के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को यह निर्देश दिया था कि वह उनके स्वास्थ्य पर कड़ी नजर रखें और विरोध जारी रखने के उनके फैसले का सम्मान भी करें.
क्या सरकार सोनम वांगचुक को जबरदस्ती खाना खिला सकती है?
कानूनी तौर पर सरकार आमतौर पर सोनम वांगचुक को उनकी मर्जी के खिलाफ जबरदस्ती खाना नहीं खिला सकती जब तक कि वे मानसिक रूप से स्वस्थ हों और अपने स्वास्थ्य के बारे में सोच समझकर फैसला लेने में सक्षम हों.
हालांकि अगर उनकी हालत इतनी बिगड़ जाती है कि शरीर के जरूरी अंग काम करना बंद कर दें या फिर वे बेहोश हो जाएं तो डॉक्टर मेडिकल जरूरत और कोर्ट के निर्देशों के आधार पर जान बचाने के लिए इलाज शुरू कर सकते हैं.
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