सुप्रीम कोर्ट नहीं रोक सकता पूरी तरह विपक्षी प्रदर्शन, पर लगा सकता है कानूनी सीमाएँ
संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत विचार अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार है, लेकिन अदालत ने कहा है कि सार्वजनिक व्यवस्था और आम जनजीवन की सुरक्षा के लिए इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगाना संभव है। पुलिस और न्यायालय आंदोलन के समय, स्थान और लोगों की संख्या तय कर सकते हैं, तथा हिंसा या सार्वजनिक उपद्रव की स्थिति में रोक लगा सकते हैं।

सौजन्य से:- ABP News
क्या विपक्ष को प्रदर्शन करने से रोक सकता है सुप्रीम कोर्ट, जान लें कानून?
सीजेपी को प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिली है. सुप्रीम कोर्ट विपक्ष को शांतिपूर्ण प्रदर्शन से पूरी तरह रोक नहीं सकता, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था और आम जनता की सुविधा के लिए उस पर कानूनी शर्तें लगा सकता है.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर पुलिस की पाबंदियों, हिरासत और बैरिकेडिंग को लेकर उठ रहे सवालों के बीच विपक्षी प्रदर्शनों पर कानूनी बहस छिड़ गई है. 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन की दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी थी. नई दिल्ली में बीएनएस की धारा 163 लागू होने और सुरक्षा बढ़ाए जाने के बावजूद प्रदर्शनकारियों का जमावड़ा बना रहा. अब 10 अक्टूबर को सीजेपी द्वारा एसआईआर प्रक्रिया रोकने व सीईसी के इस्तीफे की मांग पर आयोजित होने वाले आंदोलन को भी मंजूरी नहीं मिली है.
शांतिपूर्ण आंदोलन का संवैधानिक आधार
हमारे देश का संविधान आम नागरिकों के साथ-साथ राजनीतिक दलों को भी अपनी आवाज उठाने और सरकार की नीतियों का विरोध करने की पूरी आजादी देता है. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत विचार प्रकट करने की अभिव्यक्ति और अनुच्छेद 19(1)(b) के जरिए बिना किसी हथियार के शांतिपूर्ण ढंग से एकत्रित होने का मौलिक अधिकार दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने भी कई प्रमुख मामलों की सुनवाई करते हुए यह माना है कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिए जनता और विपक्ष को विरोध दर्ज कराने का अधिकार मिलना बेहद जरूरी है.
अधिकारों पर जायज पाबंदियां
सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार असीमित या निरंकुश नहीं हो सकता. देश की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा और सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए इस अधिकार पर वाजिब सीमाएं लगाई जा सकती हैं. यदि किसी आंदोलन से कानून-व्यवस्था बिगड़ने या आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह ठप होने का खतरा बनता है, तो शासन-प्रशासन उस पर कानूनी दायरों के अंदर रहते हुए आवश्यक पाबंदियां लगाने का पूरा हक रखता है.
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जनता के अधिकारों के साथ संतुलन
न्यायपालिका का हमेशा से यह मानना रहा है कि किसी भी प्रदर्शनकारी समूह का अधिकार आम जनता की आवाजाही और मौलिक अधिकारों पर भारी नहीं पड़ना चाहिए. विरोध जताने के नाम पर मुख्य सड़कों, व्यस्त चौराहों या सार्वजनिक रास्तों को अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं किया जा सकता है. अदालतें और पुलिस प्रशासन इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि आंदोलन के कारण एम्बुलेंस, स्कूली बसों, दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों और स्थानीय दुकानदारों को भारी असुविधा का सामना न करना पड़े, ताकि नागरिक जीवन सामान्य रूप से चलता रहे.
अदालत और पुलिस का हस्तक्षेप
जब कभी किसी आंदोलन में हिंसा फैलने, सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाए जाने अथवा सार्वजनिक उपद्रव की आशंका होती है, तब पुलिस और अदालतें तुरंत कड़े कदम उठाती हैं. स्थानीय प्रशासन सुरक्षा स्थितियों का जायजा लेकर प्रदर्शन का स्थान, समय और लोगों की अधिकतम संख्या तय कर सकता है. अगर कोई संगठन या दल इन प्रशासनिक दिशानिर्देशों या अदालती आदेशों की अनदेखी करके नियम तोड़ता है, तो सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट मामले में संज्ञान लेकर प्रदर्शन पर रोक लगा सकते हैं और कड़ी कार्रवाई के निर्देश दे सकते हैं.
मजदूर किसान शक्ति संगठन मामला
23 जुलाई 2018 को मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के अधिकारों पर बहुत ही महत्वपूर्ण व्याख्या की थी. फैसले के पैराग्राफ 61 में अदालत ने साफ शब्दों में कहा था कि शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखना और विरोध दर्ज कराना नागरिकों का बुनियादी मौलिक अधिकार है. हालांकि, इसी फैसले में शीर्ष अदालत ने यह भी जोड़ा था कि विरोध प्रदर्शन का जरिया ऐसा होना चाहिए जिससे समाज के अन्य लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन न हो.
आंदोलन के लिए जंतर-मंतर ही क्यों?
राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर लंबे समय से देश के राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का सबसे प्रमुख केंद्र बना हुआ है. संसद भवन, विभिन्न मंत्रालयों और केंद्रीय कार्यालयों के पास होने के कारण यहां से उठने वाली आवाज सीधे सरकार तक पहुंचती है, जिससे इसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत बढ़ जाता है. देश के कोने-कोने से लोग अपनी मांगों को लेकर इसी स्थान पर जुटते हैं, जिससे यह विरोध दर्ज कराने की सबसे चर्चित जगह बन चुकी है.
स्थानीय निवासियों का हित
जंतर-मंतर का इलाका सिर्फ आंदोलनों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इसके आसपास कई आवासीय कॉलोनियां, सरकारी आवास, बैंक और व्यावसायिक दफ्तर भी स्थित हैं. साल 2018 में जब स्थानीय निवासियों ने रोज-रोज के शोर-शराबे, ट्रैफिक जाम और गंदगी से परेशान होकर अदालत का रुख किया, तो सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दिक्कतों को गंभीरता से लिया. अदालत ने निर्देश दिया कि आंदोलनकारियों के प्रदर्शन करने के अधिकार और वहां रहने वाले लोगों के शांति से रहने के अधिकार के बीच एक बेहतर तालमेल और संतुलन होना बेहद जरूरी है.
पाबंदियों का व्यावहारिक मतलब
कानूनी स्थिति का सीधा और स्पष्ट निष्कर्ष यह है कि केवल मौलिक अधिकार होने भर से किसी को भी कहीं भी, कभी भी और अपनी मर्जी के मुताबिक भीड़ जुटाने की छूट नहीं मिल जाती. प्रदर्शन हमेशा प्रशासन द्वारा तय किए गए स्थान, निश्चित समय और स्वीकृत दायरे में ही होना चाहिए. संवैधानिक अधिकार का सम्मान तभी तक सुरक्षित रहता है जब तक आंदोलन कानून की सीमाओं के भीतर, पूरी तरह अहिंसक और अनुशासित ढंग से आयोजित किया जाता है.
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