हाई कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण 14% तक सीमित, 27% का 2019 का आदेश रद्द
हाई कोर्ट ने 2019 में अध्यादेश के तहत बढ़ाए गए ओबीसी आरक्षण को असंवैधानिक ठहराते हुए 27% के बजाय 14% आरक्षण लागू करने का आदेश दिया। मार्च 2019‑सितंबर 2022 के बीच 27% आरक्षण से नियुक्त कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षित रहेगी, जबकि नई भर्ती में केवल 14% आरक्षण रहेगा। सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का इरादा रखती है।

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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हाई कोर्ट में थी 90 याचिकाएं:सरकार ने कहा-कांग्रेस की गलती से केस हारे...हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे
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हाई कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% करने वाले 2019 के संशोधित कानून और अध्यादेश को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया है। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में साफ किया कि प्रदेश की सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में ओबीसी को अब 14% आरक्षण ही मिलेगा।
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि आरक्षण की 50% सीमा पार करने के लिए सरकार को असाधारण परिस्थिति के ठोस प्रमाण देने होंगे। केवल ओबीसी आबादी अधिक होने के आधार पर आरक्षण बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने अध्यादेश के जरिए 2019 में इसे लागू किया था।
ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के खिलाफ अशिता दुबे सहित 90 से अधिक याचिकाएं थीं। सरकार ने महाजन आयोग की 1982 की रिपोर्ट और पुराने प्रयासों का हवाला दिया था। इसे कोर्ट ने पर्याप्त संवैधानिक आधार नहीं माना। साथ ही अब भर्ती एजेंसियों को रोके गए पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया निर्धारित समय में पूरी करनी होगी।
एक्सपर्ट के मुताबिक, यह फैसला अशिता दुबे एवं अन्य बनाम मप्र शासन एवं अन्य और इससे जुड़ी याचिकाओं पर दिया गया है। सुनवाई 5 अगस्त को पूरी हुई थी। कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। 9 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया।
आगे क्या? सुप्रीम कोर्ट से जब तक नए निर्देश न जारी हों नई भर्तियों में ओबीसी को 14% आरक्षण ही मिलेगा...
नई भर्तियों के मामले में क्या होगा? चूंकि इस पूरे मामले में अदालत अपना निर्णय सुना चुकी है, इसलिए अब सरकारी सेवाओं में आगे जितनी भी नई भर्तियां होंगी, उसमें ओबीसी का रिजर्वेशन 14 फीसदी ही रखा जाएगा। कोई प्रोविजनल लिस्ट नहीं बनेगी।
अगर कोई सुप्रीम कोर्ट गया तो? जैसा कि सरकार और ओबीसी महासभा जा भी रही है? सरकार और ओबीसी महासभा ने कहा- महासभा इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। प्रदेशव्यापी आंदोलन भी करेगी। जानकारों के मुताबिक जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई निर्देश नहीं देता, अब 14% के हिसाब से ही भर्ती होगी।
सितंबर 2029 से 2022 तक 27% के हिसाब से हुई हुई भर्तियों का क्या होगा? मार्च 2019 से लेकर 29 सितंबर 2022 तक 27 फीसदी आरक्षण के हिसाब जितनी भी भर्तियां हुई हैं और पिछड़े वर्ग का जो चयन हुआ है, उस आधार को सुरक्षित रखा गया है। यानी जो एक्सेस अपॉइंटमेंट्स हुए हैं उनको आगामी तीन भर्तियों में एडजस्ट किया जाएगा।
प्रोविजनल लिस्ट में जो 13% पद ओबीसी और अनारक्षित वर्ग के रखे गए हैं, उनका क्या होगा? होल्ड लिस्ट (प्रोविजिनल लिस्ट) में 13% ओबीसी और अनारक्षित वर्ग के पद थे, वो अब पूरे अनारक्षित वर्ग को चले जाएंगे। यानी अनारक्षित वर्ग से ही भर्ती होगी। ओबीसी की लिस्ट पर आगे सरकार कोई निर्णय करेगी। अनारक्षित वर्ग की भर्ती तीन माह के भीतर करनी होगी।
(महाधिवक्ता प्रशांत सिंह के मुताबिक)
कोर्ट ने भी माना-अध्यादेश चुनावी लाभ के लिए था
अदालत ने माना है कि यह अध्यादेश चुनावी लाभ के लिए लाया गया था। इसमें ऐसी संवैधानिक कमियां थीं जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता था। भाजपा हमेशा ओबीसी वर्ग के आरक्षण और पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक मान्यता देने की पक्षधर रही है। सीएम ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर सभी की सहमति से कोर्ट में पक्ष रखा था। अब भी मप्र सरकार पूरी जिम्मेदारी के साथ सुप्रीम कोर्ट जाकर पक्ष रखेगी। -प्रहलाद पटेल, कैबिनेट मंत्री, मप्र
27% आरक्षण में जिनको नौकरी मिल चुकी, उनकी नौकरी सुरक्षित
मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच 27% ओबीसी आरक्षण के आधार पर नियुक्त अभ्यर्थियों की नौकरियां सुरक्षित रहेंगी। अतिरिक्त 13% पदों पर जो लोग सरकारी सेवा में जा चुके हैं, उनका समायोजन आगामी तीन भर्ती अभियानों में किया जाएगा।
कर्मचारी चयन मंडल (ईएसबी) ने 2023-24 के बाद की पुलिस आरक्षक, उच्च माध्यमिक व हाईस्कूल टीचर, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी, वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, वन रक्षक, क्षेत्र रक्षक, जेल प्रहरी, स्टाफ नर्स, सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी एवं अन्य पद, सहायक ग्रेड-3, स्टेनोटाइपिस्ट, स्टेनोग्राफर, उपयंत्री, तकनीशियन, सहायक मानचित्रकार एवं समकक्ष पद, पर्यवेक्षक, पुलिस आरक्षक, सूबेदार एवं उपनिरीक्षक, पैरामेडिकल पदों की परीक्षाएं कराई हैं।
इनमें 13% के हिसाब से 9500 के करीब पद होल्ड पर हैं। इसी तरह एमपी पीएससी में 2019 के बाद से राज्य सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, आयुष अन्य परीक्षाओं में 1300 पदों को होल्ड पर रखा है। कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार को ईएसबी व पीएससी ने 29 सितंबर 2022 के बाद 87-13% फॉर्मूले के तहत रोके गए 13% पदों पर सामान्य वर्ग के पात्र अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्ति देने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
सरकार की वो 5 चूक - जिससे कोर्ट में नहीं टिका ओबीसी को 27% आरक्षण का केस
1 सरकार कोर्ट में विशेष या आपात परिस्थिति साबित नहीं कर सकी
सुप्रीम कोर्ट में इंद्रा साहनी और जयश्री पाटिल केस में तय की गई 50% की संवैधानिक आरक्षण सीमा का पालन करना अनिवार्य है। 50% से अधिक आरक्षण केवल असाधारण और विशेष परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है, जबकि राज्य सरकार कोर्ट में ऐसी कोई विशेष परिस्थिति, भौगोलिक अलगाव या आपात स्थिति सिद्ध नहीं कर सकी।
2 सिर्फ आबादी अधिक है, इस कारण आरक्षण नहीं बढ़ा सकते हैं...
कोर्ट ने पाया कि लोक सेवाओं और उच्च शिक्षा में ओबीसी वर्ग का पहले से ही पर्याप्त प्रतिनिधित्व है। वे समाज व सत्ता की मुख्यधारा का हिस्सा हैं। संविधान का अनुच्छेद 16(4) पर्याप्त प्रतिनिधित्व की गारंटी देता है, आबादी के अनुपात में आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportionate Representation) की नहीं।
3 कोर्ट ने पूछा -43 साल पुरानी रिपोर्ट को आधार कैसे बना सकते हैं?
सरकार ने 1983 की पुरानी महाजन समिति की रिपोर्ट और 2023 की डॉ. बीआर अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विवि (BRAUSS) रिपोर्ट पर भरोसा किया। 2023 के सर्वे को कोर्ट ने अवैज्ञानिक माना, क्योंकि 7.26 करोड़ की आबादी में 10,000 लोगों का ही सर्वे किया गया था। साथ ही 45 साल पुराने डेटा आधार नहीं बन सकते।
4 राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाह जरूरी थी, पर सरकार ने ली नहीं
102वें संविधान संशोधन (अनुच्छेद 338B(9) के अनुसार, आरक्षण नीति से जुड़े प्रमुख निर्णय लेने से पहले संवैधानिक निकाय राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श जरूरी था, जो राज्य सरकार ने नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट के नज़ीरों के अनुसार, 50% सीमा लांघने जैसे फैसलों में यह अनदेखी कानून को संवैधानिक रूप से अमान्य कर देती है।
5 फर्स्ट क्लास ओबीसी अफसरों की कमी का कारण 68% पद खाली होना है
कोर्ट ने कहा कि प्रथम श्रेणी (Class-I) के पदों पर ओबीसी के कम प्रतिनिधित्व (वर्तमान में केवल 9.55%) का मुख्य कारण आरक्षण कोटा की कमी नहीं, बल्कि सरकार द्वारा स्वीकृत पदों को न भरना (लगभग 68.24% यानी दो-तिहाई से अधिक पदों का खाली रहना) है। इनको भरने से ही ओबीसी का प्रतिनिधित्व 3 गुना हो जाएगा।
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