मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने NSA के मनमाने इस्तेमाल पर सख्त चेतावनी, दो भाइयों को तुरंत रिहा किया
हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के मनमाने और लापरवाह इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई तथा राजेंद्र तथा राजेश ठाकुर भाइयों की निवारक हिरासत रद्द कर उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने अधिकारियों की एक दिन में पूरी प्रक्रिया की जल्दबाजी पर सवाल उठाया और संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों की रक्षा के महत्व पर बल दिया।

सौजन्य से:- Jagran
'NSA के मनमाना इस्तेमाल से यह एक आम कानून बन गया', मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के मनमाने और लापरवाह इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई है।
HighLights
- मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने NSA के मनमाने इस्तेमाल पर आपत्ति जताई।
- अदालत ने दो भाइयों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।
- NSA आदेशों की त्वरित प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए।
डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के मनमाने और लापरवाह तरीके से इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने दो भाइयों की निवारक हिरासत को रद करते हुए उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है और चेतावनी दी है कि संविधान के इस बेहद कड़े कानून का इस्तेमाल अब सामान्य प्रक्रिया की तरह लापरवाही से किया जा रहा है।
मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस विवेक अग्रवाल की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने राजेंद्र ठाकुर और राजेश ठाकुर नाम के दो सगे भाइयों की नजरबंदी को खारिज करते हुए उन्हें छोड़ने का आदेश दिया है।
जानिए दोनों भाईयों पर क्यों लगाया गया था NSA?
बता दें कि जबलपुर के जिला कलेक्टर ने सार्वजनिक शांति के लिए खतरा बताते हुए 6 जनवरी को इन दोनों भाइयों को तीन महीने के लिए हिरासत में लेने का आदेश दिया था, जिसे बाद में बढ़ा दिया गया था। हाई कोर्ट ने यह फैसला 11 सितंबर को सुनाया था, जिसे 5 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
पहले तो अदालत ने पाया कि दोनों भाइयों पर कुल 14 मामले दर्ज थे, जिनमें से 11 मामलों में वे पहले ही बरी हो चुके थे। बाकी बचे 3 मामलों में मारपीट, अछूत हरकत और मामूली बमबाजी जैसे आरोप थे। ऐसे में अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने बिना दिमाग लगाए और बिना सही तथ्य जाने ही उन पर NSA लगा दिया।
एक ही दिन में कागजी कार्रवाई पूरी होने पर सवाल
दूसरी ओर बेंच ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि सिटी एसपी के प्रस्ताव से लेकर कलेक्टर के नजरबंदी आदेश तक की पूरी फाइल चार अधिकारियों से गुजरी और महज़ एक ही दिन में सारी प्रक्रिया पूरी कर ली गई। अदालत ने कहा कि इतनी जल्दबाजी यह साबित करती है कि अधिकारियों ने स्वतंत्र रूप से सोच-समझकर फैसला नहीं लिया।
संविधान के नियमों का दिया हवाला
साथ ही सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 ,जो नागरिकों को मौलिक अधिकार देते हैं, के तहत मिले सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी नागरिक को मनमाने ढंग से हिरासत में न रखा जाए।
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