दिल्ली हाई कोर्ट ने पत्नी पर पति के ससुरालीजनों के खिलाफ रेप के 'नए ट्रेंड' पर जताई चिंता
दिल्ली हाई कोर्ट ने वैवाहिक मामलों में पत्नी द्वारा पति के ससुरालीजनों के खिलाफ रेप के आरोप लगाने के नये ट्रेंड को चिंता का विषय बताया है. इस ट्रेंड का उद्देश्य पति के ससुरालीजनों को ज्यादा पैसे दे कर समझौता करने के लिए दबाव बनाना है.

सौजन्य से:- ThePrint Hindi
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई पर रोक लगा दी. यह मामला दो भाइयों के खिलाफ था, जिन पर उनकी भाभी ने रेप, क्रूरता और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे. कोर्ट ने कहा कि अब एक “नया ट्रेंड” देखने को मिल रहा है, जिसमें शादी से जुड़े विवादों में शिकायत करने वाली महिलाएं अपने ससुराल वालों पर यौन अपराधों के आरोप भी जोड़ देती हैं, ताकि उन पर ज्यादा पैसे देकर समझौता करने का दबाव बनाया जा सके.
जस्टिस गिरीश कथपालिया ने कहा कि यह ट्रेंड 2014 में सुप्रीम कोर्ट के अर्निश कुमार बनाम बिहार राज्य फैसले के बाद से देखने को मिल रहा है. यह एक अहम फैसला था, जिसमें पुलिस द्वारा IPC की धारा 498A और दहेज कानूनों के मामलों में बिना सोचे-समझे गिरफ्तारी करने पर सख्त नियम बनाए गए थे. इस फैसले के बाद उन मामलों में, जिनमें अधिकतम सजा 7 साल तक है, तुरंत गिरफ्तारी करना आसान नहीं रहा.
कोर्ट ने कहा, “हाल के समय में, जब से सुप्रीम कोर्ट ने अर्निश कुमार मामले में फैसला दिया है, तब से एक ट्रेंड शुरू हो गया है. शिकायत करने वाली महिलाएं अब रेप, छेड़छाड़ और दूसरे गंभीर यौन अपराधों के आरोप लगाने लगी हैं, ताकि उनके ससुराल वालों पर भारी रकम देकर शादी का विवाद खत्म करने का दबाव बनाया जा सके.”
कोर्ट ने यह बात 10 जुलाई को कही, जब वह उन दोनों भाइयों की याचिका पर सुनवाई कर रहा था. दोनों ने अपनी भाभी द्वारा दर्ज FIR रद्द करने की मांग की थी. FIR में उन पर क्रूरता, आपराधिक विश्वासघात, रेप, यौन उत्पीड़न, आपराधिक धमकी और महिला की मर्यादा भंग करने जैसे आरोप लगाए गए थे.
शादी से जुड़े मामलों में पति और उसके परिवार पर यौन अपराधों के आरोप लगाने के इस “ट्रेंड” पर बात करते हुए वरिष्ठ वकील गीता लूथरा ने दिप्रिंट से कहा, “मामले की शुरुआत धारा 498A यानी क्रूरता से होती है, और फिर आरोप रेप, अश्लील हरकत, अश्लील फोटो खींचने और महिला की मर्यादा भंग करने तक पहुंच जाते हैं.”
उन्होंने कहा, “ईमानदारी से एक सर्वे होना चाहिए, जिसमें असली और झूठे मामलों को अलग किया जाए. कितने मामले संपत्ति के झगड़े या शादी के विवाद की वजह से दर्ज होते हैं, और कितने सच में सही होते हैं? इसकी जांच होनी चाहिए.”
“जब से सुप्रीम कोर्ट ने अर्निश कुमार का फैसला दिया है, तब से शिकायत करने वाली महिलाएं रेप और दूसरे गंभीर यौन अपराधों के आरोप लगाने लगी हैं, ताकि ससुराल वालों पर भारी रकम देकर शादी का विवाद खत्म करने का दबाव बनाया जा सके,” हाई कोर्ट ने कहा.
‘ट्रेंड’ बनाम असली मामले
याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट को बताया कि शिकायत करने वाली महिला की शादी उनके भाई से 2016 में हुई थी. उसने सितंबर 2023 में तलाक की अर्जी दी. इसके बाद अप्रैल 2024 में FIR दर्ज हुई, लेकिन उसमें रेप का कोई आरोप नहीं था.
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, रेप का आरोप पहली बार जून 2024 में सामने आया, जब महिला का बयान दर्ज हुआ. तब उसने पहली बार कहा कि उसके एक देवर ने 2017 में उसका रेप किया था.
जस्टिस कथपालिया ने कहा कि महिला ने यह नहीं बताया कि कथित रेप और FIR दर्ज होने के बीच इतने सालों की देरी क्यों हुई. इसे देखते हुए उन्होंने ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई पर रोक लगा दी.
यह पहली बार नहीं है जब जजों ने चिंता जताई हो कि दहेज और तलाक के मामलों में पत्नियां अपने पति और उनके परिवार पर गंभीर यौन अपराधों के आरोप लगा रही हैं.
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालतों ने एक असली समस्या की ओर इशारा किया है. लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि यौन हिंसा की असली शिकायतों को भी हर मामले के तथ्यों के आधार पर गंभीरता से देखा जाना चाहिए.
गीता लूथरा ने कहा कि उन्होंने समय के साथ आरोपों का तरीका बदलते देखा है. पहले रेप के आरोप लगाए जाते थे, फिर अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोप आने लगे, और अब POCSO कानून के तहत भी मामले दर्ज किए जा रहे हैं.
उन्होंने कहा, “पहले लोग IPC की धारा 377 लगाते थे, जो अप्राकृतिक यौन संबंध से जुड़ी थी. फिर उन्होंने वैवाहिक रेप के आरोप लगाने शुरू किए. अब तो पति के भाई, पिता, मां या बहन के खिलाफ भी POCSO के तहत मामले दर्ज किए जा रहे हैं, जहां लड़ रहे पति-पत्नी के नाबालिग बच्चे को शिकायतकर्ता बना दिया जाता है. लेकिन असली मामले हमेशा रहेंगे.”
लूथरा के मुताबिक, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि असली और झूठे मामलों में फर्क किया जाए, बिना किसी के लिए कानून को कमजोर किए. अगर कोई आरोप झूठा साबित होता है तो उस पर जल्दी कार्रवाई होनी चाहिए, और अगर मामला असली है तो पीड़ित को पूरा संरक्षण मिलना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि इस बात पर ठोस रिसर्च होनी चाहिए कि कितने मामलों में आपराधिक कानून का इस्तेमाल सिर्फ संपत्ति या शादी के विवाद में दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है, न कि सिर्फ लोगों की राय के आधार पर.
ऐसा क्यों हो रहा है
दिल्ली की वकील आकांक्षा मेहता ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐसे मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया है, जिस पर संस्थागत स्तर पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है.
उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने अर्निश कुमार मामले में शादी से जुड़े विवादों में गिरफ्तारी के अधिकार के गलत इस्तेमाल को रोकने की कोशिश की थी. लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं था कि लोग समझौते में दबाव बनाने या अपनी सौदेबाजी मजबूत करने के लिए और ज्यादा गंभीर आरोप लगाने लगें.”
उन्होंने कहा कि अगर बाद में आरोप झूठे भी साबित हो जाएं, तब भी उन आरोपों से जुड़ा दाग और बदनामी जिंदगी भर साथ रह सकती है.
2014 के इस ऐतिहासिक फैसले में कहा गया था कि जिन अपराधों में अधिकतम सजा 7 साल तक है, उनमें पुलिस बिना सोचे-समझे गिरफ्तारी नहीं करेगी. ऐसे मामलों में CrPC की धारा 41A के तहत पहले आरोपी को नोटिस भेजना होगा और उसके बाद ही गिरफ्तारी की जा सकेगी.
मेहता ने कहा कि इस फैसले से बचने के लिए शिकायतों में ऐसे गंभीर आरोप जोड़ दिए जाते हैं, जिनमें 7 साल से ज्यादा की सजा हो सकती है. जैसे पति पर IPC की धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) या परिवार के दूसरे सदस्यों पर IPC की धारा 376 (रेप) के आरोप.
ऐसे मामलों में पुलिस को अर्निश कुमार फैसले के नियम मानने की जरूरत नहीं होती और वह पति या उसके परिवार के लोगों को बिना नोटिस सीधे गिरफ्तार कर सकती है.
मेहता ने कहा, “अगर किसी पर झूठा यौन अपराध का गंभीर आरोप लग जाए, तो उसका दाग और बदनामी केस खत्म होने के बाद भी बनी रहती है. और हर झूठा आरोप असली पीड़ितों की शिकायतों पर लोगों के भरोसे को थोड़ा-थोड़ा कम करता है.”
जस्टिस कथपालिया की चिंता हाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से भी मेल खाती है.
ईश्वर चंद शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पति और उसके परिवार के खिलाफ चल रही कार्रवाई रद्द कर दी. कोर्ट ने कहा कि शादी के विवादों में रेप, महिला की मर्यादा भंग करने के लिए हमला, आपराधिक धमकी और मारपीट जैसे आपराधिक कानूनों का गलत इस्तेमाल बढ़ता दिख रहा है.
2025 के इस फैसले में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि धारा 498A जैसी धाराओं का इस्तेमाल निजी बदला लेने के लिए बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि अगर बिना ठोस जानकारी के सभी पर एक जैसे आरोप लगा दिए जाएं, तो उनकी अच्छी तरह जांच होनी चाहिए, वरना कानून का गलत इस्तेमाल होगा.
यह मामला उस पति की याचिका से जुड़ा था, जिसने सितंबर 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके, उसकी मां, भाई और बहन के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रद्द करने से इनकार कर दिया गया था.
उसकी पत्नी ने रेप, मारपीट और बल प्रयोग के आरोप लगाने के साथ-साथ POCSO कानून की गंभीर धाराएं भी लगाई थीं, जो यौन उत्पीड़न से जुड़ी हैं. उसने यह भी आरोप लगाया था कि उसकी बेटी के साथ उसके “शराबी” पति ने दुर्व्यवहार किया, उसे मारा-पीटा और गालियां दीं.
इस फैसले पर गीता लूथरा ने कहा, “हमें सच में जस्टिस नागरत्ना के यह कहने की जरूरत थी. देश की सबसे बड़ी अदालत की एक महिला जज ने इस गलत तरीके की ओर ध्यान दिलाया. वह हमेशा महिलाओं के अधिकारों को लेकर संतुलित और सावधान रहती हैं. मेरे पास भी असली और ऐसे दोनों तरह के मामले आते हैं. हर झूठे मामले के साथ कई असली मामले भी होते हैं.”
उन्होंने कहा कि परिवार के लोगों पर झूठे आरोप लगाने से पूरे परिवार टूट सकते हैं. उन्होंने कहा, “ऐसा करना खतरनाक है, क्योंकि इससे समाज की बुनियाद कमजोर होती है. मैंने ऐसे मामले भी देखे हैं, जहां लोग अपने ही माता-पिता पर आरोप लगा देते हैं.”
दूसरी ओर, आपराधिक मामलों के वकील अर्पित गोयल ने कहा कि यह वही है जो वकील रोज देखते हैं.
उन्होंने कहा, “शादी से जुड़े विवादों में अक्सर एक साथ कई केस दर्ज होते हैं. इनमें गुजारा भत्ता, साथ रहने की बहाली, तलाक, घरेलू हिंसा और पति, उसके रिश्तेदारों, यहां तक कि दूर के परिवार वालों के खिलाफ भी आपराधिक मामले शामिल होते हैं.”
उन्होंने कहा कि ज्यादातर मामलों में समझौते की रकम इस बात से तय होती है कि लोगों को मुकदमे और गिरफ्तारी का कितना डर है, न कि केस कितना मजबूत है या परिवार की आर्थिक स्थिति क्या है.
यह पहली चेतावनी नहीं
इस साल की शुरुआत में सनी कांत बनाम राज्य मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ चल रही कार्रवाई रद्द कर दी. कोर्ट ने पाया कि उसकी पत्नी के आरोप आपस में ही विरोधाभासी थे. एक तरफ उसने कहा कि उसका पति नपुंसक था और शादी पूरी नहीं कर सकता था, वहीं दूसरी तरफ उसने आरोप लगाया कि उसी पति ने उसे जबरन ओरल सेक्स करने पर मजबूर किया.
जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने कहा कि शिकायत में कहीं भी विरोध, जबरदस्ती, धमकी या यह नहीं बताया गया कि संबंध बिना सहमति के थे. इसलिए केवल अस्पष्ट आरोपों के आधार पर मामला नहीं चलाया जा सकता, जब तक अपराध के जरूरी तत्व साबित न हों.
ऐसा ही मामला 2023 में मध्य प्रदेश में भी सामने आया, जब हाई कोर्ट ने कांग्रेस विधायक उमंग सिंघार के खिलाफ रेप, अप्राकृतिक यौन संबंध और क्रूरता की FIR रद्द कर दी. यह शिकायत उनकी पत्नी ने दर्ज कराई थी. कोर्ट ने कहा कि दोनों साथ रहते थे और हनीमून पर भी गए थे, लेकिन शिकायत में किसी भी कथित घटना की तारीख, समय या जगह का जिक्र नहीं था.
कोर्ट ने यह भी देखा कि शिकायत करने वाली महिला पर 10 करोड़ रुपये मांगने और सिंघार का राजनीतिक करियर खत्म करने की धमकी देने के आरोप थे. कोर्ट ने कहा कि यह मामला साफ तौर पर गलत मंशा से दर्ज किया गया था.
हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मुकदमे के पीछे निजी बदला या गलत मकसद हो, तो ऐसे मामले खत्म कर दिए जाने चाहिए.
कानून में एक ‘कमी’
गोयल के मुताबिक, इन फैसलों से पता चलता है कि संसद ने अब तक इस मुद्दे पर जरूरी बदलाव नहीं किए हैं.
उन्होंने कहा, “2013 के निर्भया सुधारों के बाद संसद ने महिलाओं की सुरक्षा मजबूत करने के लिए यौन अपराधों से जुड़े कानूनों का दायरा बढ़ाया. लेकिन साथ ही ऐसे मामलों में, जहां शादी का विवाद शुरू होने के बाद रेप जैसे आरोप लगाए जाते हैं और मामला साफ तौर पर गलत मंशा से दर्ज होता है, उनसे बचाव के लिए कोई कानूनी सुरक्षा नहीं बनाई गई.”
गोयल ने कहा कि वह चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति बनाई जाए, जो इस विषय पर सुधारों का सुझाव दे.
फिर भी वकीलों ने साफ कहा कि अदालतों की यह चिंता इस बात का कारण नहीं बननी चाहिए कि तलाक के दौरान आने वाली हर यौन उत्पीड़न की शिकायत को शक की नजर से देखा जाए.
एक वकील ने कहा, “आखिर में हर मामले को उसके अपने तथ्यों के आधार पर ही देखना होगा. कानून के गलत इस्तेमाल पर सख्ती होनी चाहिए, लेकिन इससे असली पीड़ितों की बात सुनना मुश्किल नहीं होना चाहिए.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: क्या वांगचुक को हटाया जाना ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ? जंतर-मंतर पर सैकड़ों लोग समर्थन में जुटे
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