अमेरिका की अदालत ने गौतम अडानी से कुछ सवाल किए!
अमेरिकी अदालत ने उद्योगपति गौतम अडानी को एक हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा है, जिसमें उन्हें यह बताना होगा कि क्या उन्हें इस बात की जानकारी है कि अमेरिकी न्याय विभाग की ओर से उनके खिलाफ चलाए जा रहे आपराधिक मुकदमे को वापस लेने की कोशिश के संबंध में कोई समझौता या आश्वासन दिया गया था. न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट की अमेरिकी जिला अदालत के जस्टिस निकोलस गराफिस ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष की हालिया दलील से ऐसा संदेह पैदा होता है कि इस मामले में कोई ऐसा समझौता या व्यवस्था हो सकती है, जिसका अदालत के सामने खुलासा नहीं किया गया है.

सौजन्य से:- The Wire - Hindi
नई दिल्ली: अमेरिका की एक संघीय अदालत के जज ने उद्योगपति गौतम अडानी को एक हलफनामा (एफिडेविट) दाखिल करने का आदेश दिया है. इसमें उन्हें यह बताना होगा कि क्या उन्हें इस बात की जानकारी है कि अमेरिकी न्याय विभाग (यूएस जस्टिस डिपार्टमेंट) की ओर से उनके खिलाफ चलाए जा रहे आपराधिक मुकदमे को वापस लेने की कोशिश के संबंध में कोई समझौता या आश्वासन दिया गया था.
न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट की अमेरिकी जिला अदालत के जस्टिस निकोलस गराफिस ने 8 जुलाई को जारी अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष (प्रॉसिक्यूटर्स) की हालिया दलील से ऐसा संदेह पैदा होता है कि इस मामले में कोई ऐसा समझौता या व्यवस्था हो सकती है, जिसका अदालत के सामने खुलासा नहीं किया गया है.
यह आदेश उस कानूनी प्रक्रिया का ताज़ा घटनाक्रम है, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिकी न्याय विभाग नवंबर 2024 में दायर उस आरोप पत्र को पूरी तरह और स्थायी रूप से खारिज करवाने की कोशिश कर रहा है. उस आरोप पत्र में गौतम अडानी और सात अन्य लोगों पर भारत में नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) परियोजनाओं के ठेके हासिल करने के लिए 25 करोड़ डॉलर (250 मिलियन डॉलर) की कथित रिश्वत योजना चलाने का आरोप लगाया गया था.
जस्टिस गराफिस ने गौतम अडानी को 15 जुलाई तक शपथपत्र (हलफनामा) दाखिल कर दो सवालों के जवाब देने का निर्देश दिया है.
पहला, क्या उन्हें इस आरोप पत्र (इंडिक्टमेंट) को खारिज कराने के संबंध में किसी भी तरह के वादा, प्रस्ताव, मांग, प्राप्ति, सहमति या स्वीकार किए गए किसी आश्वासन की जानकारी है?
दूसरा, क्या उन्हें इस बात की जानकारी है कि आरोप पत्र वापस लेने के बदले किसी प्रकार का कोई समझौता या लेन-देन हुआ है, जिसमें किसी चीज़ का आदान-प्रदान किया गया हो?
जज का यह आदेश 4 जुलाई को दाखिल किए गए 10 पन्नों के एक लिखित जवाब के बाद आया. यह जवाब अमेरिकी न्याय विभाग के वरिष्ठ अधिकारी आर. ट्रेंट मैककॉट्टर ने दाखिल किया था. उन्होंने कहा कि अडानी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा वापस लेने का निर्णय लेने वाले वे ही अंतिम और एकमात्र अधिकारी थे.
उस दस्तावेज़ में मैककॉट्टर ने उन खबरों को खारिज किया, जिनमें कहा गया था कि अडानी द्वारा अमेरिका में प्रस्तावित निवेशों ने न्याय विभाग के अभियोजन वापस लेने के फैसले को प्रभावित किया.
उन्होंने लिखा कि न्याय विभाग के वर्तमान या पूर्व अज्ञात अधिकारियों के ये आरोप कि उन्होंने निवेश संबंधी प्रतिबद्धताओं के बदले मुकदमा वापस लेने की मांग की थी, ‘झूठे’ हैं. उनका कहना था कि प्रतिभूति (सिक्योरिटीज़) से जुड़े आरोप वापस लेने का फैसला उन्होंने उस विषय पर कोई चर्चा होने से पहले ही कर लिया था.
हालांकि, मैककॉट्टर ने यह स्वीकार किया कि अमेरिका में संभावित निवेश का मुद्दा बातचीत के दौरान उठा था. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बचाव पक्ष के वकीलों के लिए यह कहना पूरी तरह उचित होता कि आरोप पत्र दाखिल होने के कारण पिछले 18 महीनों से अभियुक्त अमेरिकी वित्तीय प्रणाली तक पहुंच नहीं बना पा रहे थे. साथ ही, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आरोप सार्वजनिक होने से पहले ही अभियुक्त अमेरिका में निवेश करने की अपनी इच्छा सार्वजनिक रूप से जता चुके थे.
जस्टिस गराफिस ने कहा कि मैककॉट्टर के इन दावों ने इस मामले में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है.
उन्होंने अपने आदेश में लिखा, ’26 जून 2026 के इस अदालत के मेमोरेंडम एवं आदेश के जवाब में श्री मैककॉट्टर की दलील ने पहली बार इस आशंका को जन्म दिया है कि अभियोग वापस लेने के संबंध में एक संभावित समझौता, जिसमें एक या एक से अधिक आरोपी शामिल हो सकते हैं, हुआ हो सकता है, जिसे न तो किसी आधिकारिक दस्तावेज़ में दर्ज किया गया है और न ही अब तक इस अदालत के संज्ञान में लाया गया है.’
जज ने यह भी उल्लेख किया कि 24 जून को गौतम अडानी के वकीलों द्वारा भेजे गए पत्र, जिसमें यह बताया गया था कि तीनों आरोपी अभियोजन वापस लेने (मुकदमा खारिज करने) का समर्थन क्यों कर रहे हैं, उसमें कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं था कि मामला वापस लेने के संबंध में कोई समझौता हुआ है. इतना ही नहीं, पत्र में इस तरह के किसी समझौते का भी जिक्र नहीं था कि आरोप इस शर्त पर हटाए जाएं कि कोई आरोपी अमेरिका में निवेश करेगा.
गराफिस ने कहा कि फेडरल रूल्स ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर के नियम 48(a) के तहत सरकार की मुकदमा खारिज करने की याचिका स्वीकार करने से पहले अदालत को यह सुनिश्चित करना होगा कि मुकदमा वापस लेने के लिए जो कारण बताए गए हैं, वही वास्तव में इस अनुरोध के वास्तविक और ठोस आधार हैं.
उन्होंने पहले के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि नियम 48(a) का उद्देश्य कार्यपालिका (सरकार) को असीमित अधिकार देना नहीं, बल्कि उसके अधिकारों पर न्यायिक निगरानी बनाए रखना है.
भारतीय फैसलों में कथित रिश्वतखोरी के आरोपों की जांच नहीं हुई
गराफिस का यह ताज़ा आदेश उस फैसले के दो सप्ताह से भी कम समय बाद आया है, जिसमें उन्होंने न्याय विभाग की अभियोग खारिज करने की मांग को तत्काल मंजूरी देने से इनकार कर दिया था.
उस समय जज ने न्याय विभाग की मूल याचिका को ‘संक्षिप्त, सतही और केवल निष्कर्षात्मक’ बताते हुए कहा था कि उसमें पर्याप्त कारण नहीं दिए गए हैं. उन्होंने अभियोजकों को निर्देश दिया था कि वे मुकदमा वापस लेने के प्रत्येक कारण का विस्तार से स्पष्टीकरण दें.
जवाब में मैककॉटर ने तर्क दिया कि बाइडेन प्रशासन ने राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित होकर यह मुकदमा दायर किया था, जिसका मकसद केवल आरोपियों का नाम सार्वजनिक कर उन्हें बदनाम करना था. उनका यह भी कहना था कि इस मामले में आरोपियों को कभी अदालत तक लाकर मुकदमा चलाने की संभावना बहुत कम थी.
मैककॉटर ने यह भी दावा किया कि भारतीय अधिकारियों ने पहले ही इन आरोपों के कई पहलुओं की जांच की थी और उन्हें ऐसा कोई कृत्य नहीं मिला, जिस पर कानूनी कार्रवाई की जा सके.
हालांकि, न्याय विभाग की ओर से दायर दस्तावेज़ों के साथ संलग्न भारत की तीन न्यायिक और नियामकीय संस्थाओं के फैसलों में उस कथित रिश्वतखोरी की साजिश की जांच नहीं की गई थी, जो अमेरिकी अभियोग का आधार है.
इन फैसलों में केवल अलग-अलग कानूनी कार्यवाहियों का निपटारा किया गया था. इनमें से किसी भी फैसले में यह निर्धारित नहीं किया गया कि भारतीय सरकारी अधिकारियों को वास्तव में रिश्वत दी गई थी या नहीं.
मई में अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसी) द्वारा गौतम अडानी और सागर अडानी के साथ एक प्रस्तावित दीवानी (सिविल) समझौता किए जाने के बाद, अमेरिकी न्याय विभाग ने इस आपराधिक मामले को खारिज करने की याचिका दायर की थी.
नवंबर 2024 में सार्वजनिक किए गए आपराधिक अभियोग में आरोप लगाया गया था कि अडानी समूह के अधिकारियों ने भारत में बिजली खरीद समझौते हासिल करने के लिए कई वर्षों तक रिश्वतखोरी की एक साजिश चलाई. साथ ही, उन्होंने अमेरिका से जुड़े ऋण प्रतिभूतियां खरीदने वाले निवेशकों को गुमराह किया.
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
गुजरात उच्च न्यायालय के मध्यस्थता सप्ताह ने मांगी: पारदर्शिता, जवाबदेही और अंतिमता की नई कानूनी रूपरेखा

सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी होर्डिंग विवाद में हाईकोर्ट को फैसला देने का निर्देश, सुनवाई से मना किया

सुप्रीम कोर्ट से वंतारा तक: न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की नई भूमिका में सुरक्षा के सवाल

केन्द्र ने अनिल अंबानी की काले धन याचिका को दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए स्थानांतरित करने का आग्रह किया

SC जज संदीप मेहता ने CJI को चौथा पत्र लिखा, राजस्थान HC के जज पर शक्ति दुरुपयोग का आरोप

खुले नाले ने आगरा में मौतें, पर्यावरणविद अदालत की राह पकड़ने को तैयार

CJI सूर्यकांत को जस्टिस मेहता की चौथी चिट्ठी, राजस्थान HC जज पर फिर गंभीर आरोप

भैरूंदा से नेशनल लोक अदालत के प्रचार हेतु जागरूकता वाहन रवाना
ताज़ा ख़बरें
- राष्ट्रीय लोक अदालत की तैयारी: निकिता गौड़ ने मध्यस्थों से अधिकतम मामलों के निस्तारण का आह्वान
- सुप्रीम कोर्ट के जज ने सीजीआई को चौथा पत्र लिखा, राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश पर दुरुपयोग का आरोप
- मधेपुरा में 12 सितंबर को राष्ट्रीय लोक अदालत, 9500 मामलों के लिए 14 बेंचों के साथ
- सुप्रीम कोर्ट ने TMC के साइनबोर्ड हटाने के मामले में दखल से इनकार, हाई कोर्ट में सुनवाई जारी
- डॉक्टरों पर हमला करने वाले राजनेताओं की तुरन्त हिरासत की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा बयान
- राष्ट्रीय लोक अदालत की सफलता के लिए अधिवक्ताओं से सहयोग का आह्वान
- सुप्रीम कोर्ट की नई मासिक व्याख्यान श्रृंखला: कानून, न्याय और शिक्षा का सतत मंच
- शेरघाटी में राष्ट्रीय लोक अदालत के लिए जागरूकता मोहीम शुरू

