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छुआछूत का अंत सिर्फ कागज़ पर? जाति‑भेदभाव की रोज़मर्रा की सच्चाई

संविधान ने 1950 में छुआछूत को समाप्त करने का आदेश दिया, पर आज भी भारत में जाति के आधार पर भेदभाव जारी है। महोबा के एक प्राथमिक विद्यालय में एक छात्रा को पानी पीने पर शिक्षक ने मारपीट की, जो इस सामाजिक कड़ियाँ की जमीनी वास्तविकता को उजागर करता है।

31 अगस्त 2026 को 03:33 pm बजे
छुआछूत का अंत सिर्फ कागज़ पर? जाति‑भेदभाव की रोज़मर्रा की सच्चाई

सौजन्य से:- Khabar Lahariya

अगर कोई व्यक्ति आपको आपकी जाति पूंछ ले, बोले मुझे छूना नहीं, तुम्हारे बच्चों को स्कूल में बाकी बच्चों से अलग बैठाए, तो…..? बहुत बुरा लगेगा न? सेम हम सबको यह व्यवहार बहुत हर्ट करता है जब कोई ऐसा व्यवहार करे। महोबा जिले के एक प्राथमिक विद्यालय में एक छात्रा ने टीचर के घड़े से पानी पी लिया जिससे टीचर ने उसकी बेरहमी से पिटाई कर दी। दोस्तों मैं हूँ कंचन शेंद्रे, स्वागत करती हूँ अपने इस एपिसोड में। दोस्तों, सीधी बात करें तो अगर भारत में कुछ चीज़ें बहुत धीरे बदली हैं, तो उनमें से एक है जाति के आधार पर भेदभाव। हमारी जाति व्यवस्था बहुत पुरानी है। 1950 में संविधान लागू हुआ और उसमें साफ लिखा गया—छुआछूत खत्म। लेकिन सच क्या है? इतने साल बाद भी कई लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ये भेदभाव आज भी दिख जाता है।

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खेती का जिम्मा महिलाओं पर, जमीन का हक किसके नाम?/Land lease in the name of women

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