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सुप्रीम कोर्ट में आईपीएस और आईएएस अधिकारियों के विवाद पर चिंता, मध्यस्थता के लिए कहा

सुप्रीम कोर्ट ने आईपीएस अधिकारी डी रूपा मौदगिल और आईएएस अधिकारी रोहिणी सिंधुरी के बीच चल रहे विवाद पर चिंता जताई और मध्यस्थता के जरिए विवाद समाप्त करने की सलाह दी। अदालत ने कहा कि लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई दोनों के करियर को नुकसान पहुंचा सकती है।

12 जून 2026 को 12:09 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट में आईपीएस और आईएएस अधिकारियों के विवाद पर चिंता, मध्यस्थता के लिए कहा

सौजन्य से:- Jansatta

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक बार फिर आईपीएस अधिकारी डी रूपा मौदगिल और आईएएस अधिकारी रोहिणी सिंधुरी से अपने लंबे समय से चले आ रहे विवाद को मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाने की सलाह दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि लंबे वक्त से चल रही कानूनी लड़ाई दोनों के करियर को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ रोहिणी सिंधुरी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें रूपा मौदगिल द्वारा दायर मानहानि मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के आदेश को बरकरार रखा गया था।

यह विवाद साल 2023 में दोनों वरिष्ठ अधिकारियों के बीच सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप से शुरू हुआ था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस लंबे समय से चल रहे विवाद पर चिंता जताई और कहा कि लगातार चल रही कानूनी लड़ाई दोनों अधिकारियों के करियर को नुकसान पहुंचा सकती है। अदालत ने दोनों को आपसी बातचीत और मध्यस्थता के जरिए विवाद खत्म करने पर विचार करने की सलाह दी।

शीर्ष अदालत ने कहा, “दोनों ही बेहतरीन अधिकारी हैं, लेकिन वह एक-दूसरे का करियर बर्बाद कर रहे हैं। इस अदालत की राय है कि इस मामले को मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाया जा सकता है”

विवाद की प्रकृति और पक्षों के रुख को ध्यान में रखते हुए पीठ ने उनके बीच संभावित समझौते की सुविधा के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ को मध्यस्थ नियुक्त किया।

क्या है पूरा विवाद?

यह विवाद फरवरी 2023 से शुरू हुआ, जब रोहिणी सिंधुरी को पता चला कि मौदगिल ने फेसबुक पोस्ट में उनके खिलाफ कई आरोप लगाए हैं। इन पोस्ट में मौदगिल ने कथित तौर पर सिंधुरी पर उनकी निजी तस्वीरें साथी आईएएस अधिकारियों के साथ साझा करने का आरोप लगाया।

इन आरोपों के बाद दोनों अधिकारियों के बीच सार्वजनिक रूप से तीखी बयानबाजी हुई, जिसे काफी मीडिया कवरेज मिला। विवाद बढ़ने पर कर्नाटक सरकार ने दोनों अधिकारियों का तबादला कर दिया।

इसके बाद सिंधुरी ने मौदगिल को कानूनी नोटिस जारी कर बिना शर्त माफी मांगने और अपनी प्रतिष्ठा को हुए नुकसान और मानसिक पीड़ा के लिए 1 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की।

मार्च 2023 में बेंगलुरु की एक अदालत ने सिंधुरी की शिकायत का संज्ञान लेते हुए मौदगिल के खिलाफ आपराधिक मानहानि की कार्यवाही शुरू की। आईपीएस अधिकारी ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में इसे चुनौती दी, लेकिन मामले को रद्द करने की उनकी याचिका खारिज कर दी गई । उच्च न्यायालय ने कहा कि आरोपों के लिए पूर्ण सुनवाई आवश्यक है।

इसके बाद मौदगिल ने दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। जस्टिस अभय एस ओका (अब सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान, न्यायालय ने विवाद की सार्वजनिक प्रकृति पर बार-बार चिंता व्यक्त की। न्यायालय ने कहा कि वरिष्ठ सिविल सेवकों के बीच इस तरह का आचरण शासन और प्रशासनिक कामकाज को प्रभावित कर सकता है।

दिसंबर 2023 में अदालत ने आपराधिक मानहानि की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी और दोनों अधिकारियों को मीडिया से बात न करने का निर्देश दिया था। अदालत ने समझौते को भी प्रोत्साहित किया और सुझाव दिया कि मौदगिल सोशल मीडिया पोस्ट हटा दें और मामले को समाप्त करने के लिए माफी मांगने पर विचार करें।

कई अवसरों के बावजूद, मध्यस्थता के प्रयास सफल नहीं हुए। सिंधुरी ने कहा कि आरोपों से उनकी प्रतिष्ठा को गंभीर और अपूरणीय क्षति पहुंची है और उन्होंने समझौता करने से इनकार कर दिया । नवंबर 2024 में अदालत ने मौदगिल को मानहानि के मुकदमे को रद्द करने की मांग वाली अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति दी, क्योंकि उन्हें सूचित किया गया था कि कोई समझौता नहीं हो सका है और मामला मुकदमे के लिए आगे बढ़ेगा।

भारतीय न्यायपालिका और राजनीति के इतिहास में 12 जून 1975 की तारीख एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज है जिसने देश की दिशा और दशा को हमेशा के लिए बदल दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट का ‘कोर्ट रूम नंबर 24’ उस ऐतिहासिक घटना का गवाह बना जहां एक सिटिंग प्रधानमंत्री के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया गया। यह फैसला देने वाले व्यक्ति थे जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा। इलाहाबाद हाईकोर्ट का ‘कोर्ट रूम नंबर 24’ भारतीय न्यायिक इतिहास में सिर्फ एक कमरा नहीं है बल्कि यह वह जगह है जहा भारत के लोकतंत्र, सत्ता और संविधान के बीच टकराव ने एक नया अध्याय लिखा। पढ़ें पूरी खबर।

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