72 वर्षीय दिव्यांग पति को घरेलू हिंसा के आरोपों से बरी किया गया
हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में एक 72 वर्षीय दिव्यांग पति पर घरेलू हिंसा और भरण-पोषण नहीं देने के आरोप लगाने वाली 37 वर्षीय पत्नी की अपील खारिज कर दी गई है. अदालत ने कहा कि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य नहीं पेश किए गए.

सौजन्य से:- Amar Ujala
Himachal News: 72 वर्षीय दिव्यांग पति पर घरेलू हिंसा के आरोप साबित नहीं, 37 साल की पत्नी की अपील खारिज
किन्नौर से जुड़े घरेलू हिंसा मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 37 वर्षीय महिला की अपील खारिज कर दी। महिला ने अपने 72 वर्षीय लकवाग्रस्त पति पर घरेलू हिंसा और भरण-पोषण नहीं देने का आरोप लगाया था। अदालत ने कहा कि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए गए और निचली अदालत का फैसला सही है।
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विस्तार
पत्नी ने आरोप लगाया कि पति उसे घर छोड़ने के लिए मजबूर करता था। शराब पीकर गाली-गलौज करता था और जान से मारने की धमकी देता था। याचिकाकर्ता के अनुसार, साल 2019 को सब्जी लाने को कहने पर पति ने झगड़ा किया और दराती से हमला करने की धमकी दी। उसने यह भी कहा कि पति उसे कोई भरण-पोषण नहीं दे रहा है। दूसरी ओर, पति ने इन आरोपों का खंडन किया। साथ ही बताया कि पत्नी डेढ़ साल बाद ही छोड़कर चली गई। उसने 2007 में अदालत में दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दाखिल की थी, जिसे 9 मई 2008 को स्वीकार कर लिया गया था।
इसके बावजूद पत्नी ने उसका साथ नहीं दिया। यह भी कहा कि पत्नी की भरण-पोषण की पिछली याचिकाएं भी खारिज हो चुकी हैं। पति ने खुद को 72 वर्षीय लकवाग्रस्त व्यक्ति बताया, जिसे चौबीसों घंटे देखभाल की जरूरत है। पत्नी ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने तथ्यों को ठीक से नहीं समझा। उसके पास रहने के लिए घर नहीं है, जबकि पति अर्ध सैनिक बल से सेवानिवृत्त अधिकारी है। उसकी मासिक पेंशन 50 हजार रुपये से अधिक है। वह बागवानी से 5 से 6 लाख रुपये अतिरिक्त कमाते हैं।
पत्नी ने भरण-पोषण और निवास की मांग की। पति ने निचली अदालत के आदेश का समर्थन किया। सत्र न्यायाधीश ने पाया कि दोनों कानूनी रूप से विवाहित हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी नोट किया कि पत्नी 2007 में घर छोड़कर चली गई थी। दांपत्य अधिकारों की बहाली की डिक्री पारित हुई थी, जिसके बाद भी उसने पति का साथ नहीं दिया। अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि पति लकवाग्रस्त हैं और ठीक से चल नहीं सकते। याचिकाकर्ता ने 2019 में पति के साथ रहने का कोई विश्वसनीय सबूत पेश नहीं किया।
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