माँ को सगे बेटे से मिल रहा भरण-पोषण, तो सौतेले बेटे से नहीं मांग सकती
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा गया है कि यदि माँ को सगे बेटे से कोर्ट के आदेश पर भरण-पोषण मिल रहा है, तो वह सौतेले बेटे से दोबारा भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक बार भरण-पोषण का आदेश हो जाने के बाद 'खुद को भरण-पोषण करने में असमर्थ' वाली स्थिति समाप्त हो जाती है।

सौजन्य से:- Jagran
'सगा बेटा कोर्ट के आदेश पर भरण-पोषण दे रहा तो सौतेले से दोबारा नहीं मांग सकती मां': इलाहाबाद HC का महत्वपूर्ण आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि यदि सगा बेटा कोर्ट के आदेश पर मां को भरण-पोषण दे रहा है, तो मां सौ ...और पढ़ें
HighLights
- गाजीपुर निवासी कुसुम की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करने वाले आदेश में की टिप्पणी
- परिवार न्यायालय मुजफ्फरनगर के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका ई कोर्ट ने खारिज की
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी महिला का सगा बेटा कोर्ट के आदेश पर उसे भरण-पोषण दे रहा है तो वह सौतेले बेटे से दोबारा भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक बार भरण-पोषण का आदेश हो जाने के बाद ‘खुद को भरण-पोषण करने में असमर्थ’ वाली स्थिति समाप्त हो जाती है।
ट्रायल कोर्टने भरण-पोषण का आदेश दिया था
न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की एकलपीठ ने गाजीपुर निवासी कुसुम की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करने वाले आदेश में यह टिप्पणी की है। याची ने मुजफ्फरनगर के अपर प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय संख्या-2 द्वारा 15 मई 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत दायर मामले कुसुम को आठ हजार रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।
सरकारी व विपक्षी के वकीलों का तर्क
याची का कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने भरण-पोषण का दायित्व केवल (विपक्षी संख्या-3) गौरव शर्मा पर डाला है जो उसका सगा बेटा है, जबकि (विपक्षी संख्या-2) अरुण शर्मा को सौतेला बेटा होने के कारण दायित्व से मुक्त कर दिया। अरुण पर भी भार डाला जाय। सरकारी वकील तथा विपक्षी अरुण वकील ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि जब सगा बेटा पर्याप्त साधन रखता है और मां का भरण-पोषण कर रहा है तो सौतेले बेटे को इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
'अब कुसुम की 'असमर्थता' की स्थिति खत्म हो गई'
कोर्ट ने धारा 125 सीआरपीसी की व्याख्या करते हुए कहा कि इस धारा के तहत पिता, माता, पत्नी और बच्चों को भरण-पोषण का अधिकार है, बशर्ते वे खुद को भरण-पोषण करने में असमर्थ हों और जिसके खिलाफ मांग की जा रही है उसके पास पर्याप्त साधन हों। कोर्ट ने माना कि याचिका दायर करते समय कुसुम असमर्थ रही होंगी, लेकिन ट्रायल कोर्ट के आदेश के बाद सगे बेटे से आठ हजार रुपये मिलने लगे हैं। चूंकि सगे बेटे ने इस आदेश को चुनौती नहीं दी है इसलिए अब कुसुम की 'असमर्थता' की स्थिति खत्म हो गई है।
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'किसी दूसरे व्यक्ति से दोबारा मांग नहीं की जा सकती'
कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण मांगने वाले का यह अधिकार जरूर है कि यदि एक से अधिक व्यक्ति दायित्व में हैं तो कोर्ट तय करे कि किससे कितना लिया जाए। लेकिन एक बार कोर्ट द्वारा भरण-पोषण तय हो जाने और उसका भुगतान शुरू हो जाने के बाद उसी आधार पर किसी दूसरे व्यक्ति से दोबारा मांग नहीं की जा सकती। पीठ ने माना कि विपक्षी संख्या दो को केवल सौतेला बेटा होने के कारण दायित्व से मुक्त करना गलत नहीं है, खासकर तब जब सगा बेटा पहले से भुगतान कर रहा है। कोर्ट ने कहा- याचिका बिना ठोस कानूनी आधार, केवल विपक्षी संख्या-2 को परेशान करने के उद्देश्य से दायर की गई प्रतीत होती है।
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