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सुप्रीम कोर्ट ने कहा - हम बुलडोजर न्याय के खिलाफ फैसले पर कायम हैं

सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिकाओं पर टिप्पणी की और कहा कि संबंधित उच्च न्यायालय ही अलग- अलग तथ्यात्मक विवादों का सामना कर सकते हैं, जिन पर उसके फैसले का गलत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा.

16 जुलाई 2026 को 03:14 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने कहा - हम बुलडोजर न्याय के खिलाफ फैसले पर कायम हैं

सौजन्य से:- ETV Bharat

'हम बुलडोजर न्याय के खिलाफ फैसले पर कायम', अवमानना याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि क्या उसके फैसले का इस्तेमाल सभी गैर-कानूनी कब्जों पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए किया जा सकता है?

By Sumit Saxena

Published : July 16, 2026 at 5:57 PM IST

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने गुरुवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले पर कायम है – जो नवंबर 2024 में दिया गया था, जिसमें "बुलडोजर न्याय" के खिलाफ सुरक्षा उपाय तय किए गए थे – लेकिन उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हर मामले में अलग-अलग तथ्यात्मक विवाद शामिल हैं जिन्हें संबंधित उच्च न्यायालय (HCs) ही सबसे अच्छे तरीके से सुलझा सकते हैं.

सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ (जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना शामिल थे) ने फैसले का उल्लंघन कर तोड़फोड़ का आरोप लगाने वाली अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. पीठ ने कहा कि अवमानना याचिकाओं में मुख्य मुद्दा यह था कि क्या याचिकाकर्ताओं के परिसर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सुरक्षा उपायों का उल्लंघन करके ध्वस्त किया गया था.

पीठ ने सभी अवमानना याचिकाओं को संबंधित उच्च न्यायालयों को भेज दिया, और सभी मामलों को खुला छोड़ दिया. पीठ ने यह स्पष्ट किया कि उसने आरोपों के गुण पर कोई राय नहीं दी है और उच्च न्यायालयों के सामने कार्यवाही लंबित रहने तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम सुरक्षा जारी रहेगी. हालांकि, पीठ ने आगे कहा कि सभी पक्ष उच्च न्यायालयों के सामने अंतरिम आदेश में बदलाव की मांग करने के लिए स्वतंत्र होंगे, जो ऐसे आवेदनों पर स्वतंत्र रूप से फैसला करेंगे.

पीठ ने कहा, "हम इन कार्यवाही के रिकॉर्ड को संबंधित उच्च न्यायालयों को ट्रांसफर करना सही समझते हैं," और उच्च न्यायालयों से यह भी कहा कि वे संबंधित रिकॉर्ड मंगाएं और अगर जरूरी हो, तो सभी वास्तविक मुद्दों को तय करने के लिए जिला कोर्ट के जरिये सबूत हासिल करें.

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को तोड़ा गया और कानून के खिलाफ जाकर ध्वस्तीकरण के आदेश पास किए गए. हालांकि संबंधित अधिकारियों ने दावा किया कि ध्वस्तीकरण कानूनी थे. पीठ ने कहा कि इन मामलों में "तथ्य संबंधी कई प्रश्न" उठाए गए हैं, जिन पर उसके समक्ष चल रही न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही में ठीक से फैसला नहीं किया जा सकता.

सुनवाई के दौरान, पीठ ने अलग-अलग पक्षों के वकील से पूछा कि क्या उसके फैसले का इस्तेमाल सभी गैर-कानूनी कब्जों पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए किया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों से यह पता लगाने को कहा कि क्या उनके मुवक्किलों को कानून के तहत उठाए गए कड़े कदमों के लिए अलग किया गया था, जबकि दूसरों को उसी स्तर की जांच का सामना नहीं करना पड़ रहा था. वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि उनके मुवक्किल गणेश गुप्ता, जो दिल्ली के रहने वाले हैं, का फ्रूट जूस का स्टॉल था, जिस पर बुलडोजर चला. जस्टिस बागची ने कहा, "सवाल यह है कि क्या इस व्यक्ति के पास कानूनी अधिकार (authorization) था या कानून की प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं?"

हेगड़े ने कहा कि एक मामले में एक टीवी एंकर बुलडोजर पर बैठकर वहां आया. CJI ने कहा कि इन आरोपों के बारे में किसी को तो फैसला करना ही होगा. एक मामले का हवाला देते हुए, CJI ने कहा कि प्रतिवादी का कहना है कि विवादित इलाका सफाई कर्मचारियों के पुनर्वास के लिए बनी सरकारी योजना का हिस्सा था और दूसरे पक्ष की मनमानी के कारण, वे सफाई कर्मचारियों का पुनर्वास नहीं कर पा रहे हैं.

CJI ने कहा, “और, वह यहां बुलडोजर का दावा कर रहे हैं… हमें इस तरह के दावे पर ध्यान क्यों देना चाहिए. इसलिए, हाई कोर्ट इस मामले में शामिल होगा…" पीठ ने कहा कि वह 2024 के फैसले में जारी कोर्ट के निर्देशों का गलत इस्तेमाल नहीं होने दे सकती.

एक पक्ष की तरफ से वरिष्ठ वकील सी.यू. सिंह ने कहा, "अगर सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसले पर कायम नहीं रहता…"

CJI ने जवाब दिया, "किसने कहा कि हम (अपने फैसले पर) कायम नहीं रहेंगे. हम अपने फैसले पर कायम रहेंगे…"

सिंह ने जोर देकर कहा कि फैसले को पलटना नहीं चाहिए. जस्टिस बागची ने कहा कि फैसले में यह साफ किया गया कि सार्वजनिक जगहों पर बिना अनुमति के कब्जा फैसले में दिए गए निर्देशों के तहत नहीं आता है.

CJI ने एक और अवमानना याचिका का जिक्र करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के जवाब में कहा गया है कि प्रतिवादियों ने ध्वस्त की गई संपत्तियों की गलत पहचान की है, और जिस क्षेत्र की पहचान की गई है वह एक बस्ती है, जो कानूनी तौर पर रहने वालों को आवंटित की गई है, जबकि गिराया गया हिस्सा दूसरी प्रॉपर्टी पर हुआ था.

CJI ने पूछा, "अब इस तथ्य के सवाल को कौन तय करेगा…इसलिए हम एक ऐसा फोरम बनाना चाहते हैं जहां सबूत पेश किए जा सकें और नतीजे बताए जा सकें. अगर किसी ने इस कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन करके प्रॉपर्टी गिराने की हिम्मत की है, तो नतीजे भुगतने होंगे. लेकिन अगर कोई सही कार्रवाई की जाती है या कार्रवाई सही है…तो पुनर्स्थापना का कानून है, क्षति का कानून है, कुछ किया जा सकता है. लेकिन यह पूरा अभ्यास किसी को तो करना ही होगा."

एक पक्ष की तरफ से वरिष्ठ वकील हुजेफा अहमदी ने कहा कि 1999 से 2024 तक अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की, और यह एक स्थानीय नेता के पत्र की वजह से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था, "आप इस खास राज्य में एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद कैसे बना सकते हैं?"

अहमदी ने कहा, "इसके बाद, यह कार्रवाई शुरू हुई...लेकिन यह सोच विचार करके चुनने का मामला है...मेरे मामले में सार्वजनिक संपत्ति पर किसी भी तरह के कब्जे का कोई आरोप नहीं है. आरोप यह है कि आपने जितना बनाना चाहिए था, उससे ज्यादा किया है...एक ऐसी जमीन जिसके बारे में मेरे पास खुद बिक्री दस्तावेज है..."

यह भी पढ़ें- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और CBSE से कहा, 9वीं क्लास के स्टूडेंट्स पर नई भाषा का बोझ न डालें

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