भारत में मध्यस्थता: एक प्रभावी वैकल्पिक विवाद समाधान
भारत की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बहुत अधिक है, जिसके कारण मध्यस्थता एक प्रभावी वैकल्पिक विवाद समाधान के रूप में तेजी से उभरी है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय भी मध्यस्थता को बढ़ावा दे रहे हैं। मध्यस्थता में एक निष्पक्ष और तटस्थ तीसरा व्यक्ति मध्यस्थता मदद करता है जो दोनों पक्षों को आपसी बातचीत के जरिए एक सर्वमान्य और शांतिपूर्ण समाधान निकालने में मदद करता है। कई मामलों का समाधान मध्यस्थता के जरिए हुआ है, जिनमें रिलायंस परिवार संपत्ति विवाद, टाटा-डोकोमो विवाद, अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद और वोडाफोन टैक्स विवाद शामिल हैं। इन मामलों को मध्यस्थता के जरिए समाधान मिला जो व्यावहारिक विकल्प था

सौजन्य से:- Navbharat Times
Mediation.. Alternative Dispute Resolution India : भारत में कई ऐसे हाई-प्रोफाइल कानूनी विवाद रहे हैं, जिनका समाधान वर्षों तक अदालतों में लंबित रहने के बाद मध्यस्थता के जरिए संभव हुआ। इससे समय, लागत और रिश्तों की बचत हुई।
नई दिल्ली: भारत की अदालतों में एक मोटे अनुमान के तौर पर पेंडिग मामलों की संख्या इतनी ज्यादा है कि यदि अदालतें प्रतिदिन और 24 घंटे भी मामलों की सुनवाई करना शुरु कर दें तो भी 50 साल लग जाएंगे। समय समय पर सुप्रीम कोर्ट के लिए भी भारत की न्याय व्यवस्था में वर्षों से लंबित मामलों की संख्या लगातार चिंता का विषय रही है। ऐसे में मध्यस्थता Mediation एक प्रभावी वैकल्पिक विवाद समाधान के रूप में तेजी से उभरी है। सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालय भी कई मामलों में पक्षकारों को मध्यस्थता अपनाने की सलाह देते रहे हैं।
अदालत के बाहर विवादों को सुलझाने की एक वैकल्पिक प्रक्रिया के रुप में मध्यस्थता का चलन बढ़ने लगा है। इसमें एक निष्पक्ष और तटस्थ तीसरा व्यक्ति जो मध्यस्थ या मीडिएटर होता है, दोनों पक्षों को आपसी बातचीत के जरिए एक सर्वमान्य और शांतिपूर्ण समाधान निकालने में मदद करता है। कई बार तो मध्यस्थता अदालत के फैसले से अधिक व्यावहारिक विकल्प साबित हो सकती है। यदि दोनों पक्ष सहमत होते हैं तो वर्षों तक चलने वाली मुकदमेबाजी से बचा जा सकता है। हालांकि मध्यस्थता तभी सफल होगी जब दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार हों। यदि सहमति नहीं बनती है तो मामला फिर नियमित न्यायिक सुनवाई के लिए अदालत में लौट सकता है। हाल के वर्षों में संसद ने भी मध्यस्थता अधिनियम, 2023 (Mediation Act, 2023) लागू कर इस व्यवस्था को कानूनी आधार दिया।
चर्चित और विवादित मामले, जिन्हें मध्यस्थता के जरिए सुलझाया गया
भारत के कई चर्चित विवाद ऐसे रहे हैं, जिनका समाधान अंततः अदालत के फैसले से नहीं बल्कि बातचीत और मध्यस्थता के जरिए संभव हुआ। आइए जानते हैं ऐसे पांच प्रमुख मामलों के बारे में..
1. रिलायंस परिवार संपत्ति विवाद :
धीरूभाई अंबानी के निधन के बाद रिलायंस साम्राज्य में संपत्ति को लेकर विवाद हुआ था। इस विवाद को सुलझाने के लिए कोई कानूनी मुकदमा नहीं लड़ा गया। परिवार की मुखिया कोकिलाबेन अंबानी ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई और पूर्व बैंकर केवी कामथ की मदद से दोनों भाइयों के बीच संपत्तियों का शांतिपूर्ण बंटवारा किया गया। उन्होंने 2005 में एक समझौता कराकर रिलायंस साम्राज्य का औपचारिक बंटवारा कर दिया।
2.टाटा-डोकोमो विवाद ( Tata-Docomo Dispute ):
टाटा-डोकोमो विवाद एक बहुचर्चित अंतरराष्ट्रीय कानूनी और व्यावसायिक मामला था। यह टाटा संस और जापानी टेलीकॉम कंपनी एनटीटी डोकोमो के बीच साझेदारी टूटने और शेयर बायबैक (शेयरों की पुनर्खरीद) को लेकर हुआ था। टाटा और जापान की कंपनी डोकोमो के बीच हुए अरबों डॉलर के विवाद को लंदन कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन (LCIA) की मध्यस्थता से सुलझाया गया था।
3. अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद :
भारत का सबसे बड़ा भूमि विवाद जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा साल 2019 में इस मामले के स्थायी समाधान के लिए एक मध्यस्थता पैनल का गठन किया। इसमें जस्टिस एफ. एम. कलीफुल्ला (अध्यक्ष), आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू शामिल थे। मध्यस्थता समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, लेकिन दोनों पक्षों (हिंदू और मुस्लिम) के बीच जमीन के मालिकाना हक को लेकर कोई आम सहमति नहीं बन पाई और यह प्रयास विफल हो गया। लेकिन इसने बाद के ऐतिहासिक अदालती फैसले का मजबूत आधार तैयार किया।
4.वोडाफोन टैक्स विवाद (Vodafone Tax Dispute):
वोडाफोन टैक्स विवाद Vodafone Tax Dispute भारत सरकार और ब्रिटेन की टेलीकॉम कंपनी वोडाफोन के बीच 11 अरब डॉलर के 2007 के हचिसन-वोडाफोन सौदे पर टैक्स लगाने को लेकर हुआ एक बड़ा कानूनी विवाद था। सितंबर 2020 में, हेग (नीदरलैंड्स) स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) ने वोडाफोन के पक्ष में फैसला सुनाया। ट्रिब्यूनल ने माना कि भारत की ओर से पिछली तिथि से टैक्स की मांग करना अंतरराष्ट्रीय संधियों के खिलाफ और अनुचित था। जिसके बाद वोडाफोन और भारत सरकार के बीच का बहुचर्चित ₹20,000 करोड़ का टैक्स विवाद मध्यस्थता के जरिए ही हल किया गया।
5.कल्याणी परिवार संपत्ति विवाद ( Kalyani Family Dispute ):
भारत के प्रमुख कारोबारी घराने, 'भारत फोर्ज' Bharat Forge के चेयरमैन बाबा कल्याणी और उनके परिवार के सदस्यों के बीच का संपत्ति और उत्तराधिकार का विवाद, लगभग 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति और पारिवारिक व्यवसाय के बंटवारे से जुड़ा हुआ है। यह विवाद तब चर्चा में आया जब परिवार की मुखिया, माता सुलोचना के निधन के बाद उनकी दो वसीयते सामने आईं। बाबा कल्याणी 2012 की वसीयत को सही मानते हैं, जबकि उनके भाई 2022 की वसीयत का हवाला देते हैं। अब इस मामले में ताजा अपडेट के अनुसार इस विशाल पारिवारिक और संपत्ति विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश एल. नागेश्वर राव को मध्यस्थ नियुक्त किया है जिसके बाद, इस मामले के जल्द ही सुलझ जाने की उम्मीद है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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