जीएसटी अधिकारी अब नहीं कर सकते सिंगल हाथ में गिरफ्तारी—नई नियमावली से मिलेगी व्यापारियों को राहत
1 अप्रैल 2027 से लागू होने वाली नई जीएसटी गिरफ्तारी नियमावली के तहत अधिकारियों को सख्त सीमाएँ मिलेंगी और केवल अदालत की मंजूरी से ही गिरफ्तारी और दंड का निर्णय हो सकेगा। इसके साथ ही आपराधिक अभियोजन की सीमा पाँच करोड़ रुपये तक बढ़ाई गई है, जिससे पाँच करोड़ से कम के मामलों में दंड और नागरिक कार्यवाही लागू होगी। यह बदलाव अनावश्यक आपराधिक कार्यवाही को घटाकर करदाताओं की रक्षा और अनुपालन को सरल बनाने का उद्देश्य रखता है।

सौजन्य से:- ABP News
क्या GST अफसर को है गिरफ्तारी का अधिकार, जानें क्या है कानून?
GST Arrest Rules: हाल ही में जीएसटी परिषद ने एक बड़ा फैसला लिया है. आइए जानते हैं क्या है यह फैसला और इसका प्रभाव व्यापारियों पर कैसे पड़ेगा. जानें इस बारे में पूरी जानकारी.
- अधिकारियों को सख्त सीमाएं, अदालतें ही सजा का निर्धारण करेंगी।
GST Arrest Rules: जीएसटी अधिकारियों के पास सब सीधे गिरफ्तारी करने का अधिकार नहीं है. व्यापार मालिकों को राहत देने की उम्मीद वाले के कदम के रूप में जीएसटी परिषद ने कथित तौर पर टैक्स संबंधी अपराधों के लिए गिरफ्तारी और आपराधिक अभियोजन को कंट्रोल करने वाले नियमों में बदलाव को मंजूरी दे दी है.
नए प्रावधान 1 अप्रैल 2027 से प्रभावित होने की बात कही गई है. इन बदलावों का उद्देश्य अनावश्यक आपराधिक कार्यवाही को कम करना, टैक्स अनुपालन को आसान बनाना और करदाताओं को मनमानी कार्यवाही से बचाना है.
जीएसटी गिरफ्तारी के संबंध में नए नियम
प्रस्तावित परिवर्तनों के तहत संदिग्ध टैक्स चोरी से निपटने के दौरान जीएसटी अधिकारियों को सख्त सीमाओं का सामना करना पड़ेगा. इसका उद्देश्य इस बात को पक्का करना है कि टैक्स पेयर्स पर सिर्फ इस वजह से आपराधिक कार्यवाही नहीं की जाए क्योंकि किसी अधिकारी को अनियमितता का संदेह है.
रिपोर्ट के मुताबिक सजा, जुर्माना और जेल का निर्धारण करने में अदालतें केंद्रीय भूमिका निभाएंगी. हालांकि अपराध और सजा तय करने में न्यायिक भागीदारी किसी जांच के दौरान किसी को गिरफ्तार करने के कानूनी अधिकार से अलग हैं. इस वजह से यह दावा की हर जीएसटी गिरफ्तारी के लिए अदालत की मंजूरी अनिवार्य होगी आखिरी वैधानिक प्रावधानों के खिलाफ जांच की जानी चाहिए.
आपराधिक अभियोजन सीमा बढ़ाकर 5 करोड़ की गई
एक और बड़ा परिवर्तन यह है कि एक आपराधिक मुकदमा चलाने की सीमा में बढ़ोतरी की गई है. पहले सीमा एक करोड़ बताई गई थी अब संशोधित सीमा 5 करोड़ बताई गई है. यह परिवर्तन आपराधिक मुकदमा चलाने के योग्य टैक्स संबंधी मामलों की संख्या को कम कर सकता है. यह टैक्स चोरी और तुलनात्मक रूप से छोटे विवादों के बीच अंतर करेगा. इससे व्यवसाय को अपने आप से अपराधी कार्रवाई का सामना किए बिना अनुपालन गलतियों को ठीक करने पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी.
हालांकि एक मौद्रिक सीमा को पार करके अपने आप में अपराध स्थापित नहीं करता है. अपराध की प्रकृति, लागू वैधानिक प्रावधान और मौजूद सबूत इस बात को तय करने में जरूरी है कि अभियोजन सही है या फिर नहीं.
क्या 5 करोड़ से कम की टैक्स चोरी पर सिर्फ जुर्माना लगेगा?
5 करोड़ से कम की अनियमितताओं को आपराधिक मामलों के बजाय दंड और नागरिक कार्यवाही के जरिए से कंट्रोल किया जाएगा. इससे टैक्स विवाद, गलत फाइलिंग या फिर दूसरे अनुपालन मुद्दों से निपटने वाले व्यवसायों को राहत मिल सकती है.
इसके बाद भी करदाताओं को यह नहीं मानना चाहिए की 5 करोड़ से कम का हर अपराध अपने आप से आपराधिक अभियोजन से छूट प्राप्त है. किसी अपराध का उपचार लागू कानून की सटीक शब्दावली पर निर्भर होता है. इसमें लागू होने वाले अपवाद या फिर अलग-अलग अपराध शामिल हैं.
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पिछली जीएसटी गिरफ्तारी प्रणाली क्या करती थी?
केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम 2017 की धारा 69 और 125 के तहत आयुक्त के पास अपराधों के लिए गिरफ्तारी प्राधिकरण और अभियोजन से संबंधित शक्तियां हैं. इन प्रावधानों का इस्तेमाल टैक्स चोरी, धोखाधड़ी वाले इनपुट टैक्स क्रेडिट दावों और नकली चालान से जुड़े मामलों में किया गया है.
पिछले ढांचे में लागू कानूनी जरूरत के अधीन कानून द्वारा तय परिस्थितियों में गिरफ्तारी की अनुमति थी. इसका मतलब यह नहीं होता कि हर टैक्स विसंगति अपने आप से गिरफ्तारी को सही ठहराती है. प्रासंगिक वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन करने के लिए जांच और प्रवर्तन कार्रवाई की जरूरत थी.
अब नए सुधारों का उद्देश्य गैर जरूरी आपराधिक कार्यवाही की संभावना को कम करना और व्यवसायों के लिए अधिक स्पष्टता देना है. उनका वास्तविक प्रभाव अंतिम संशोधन और प्रवर्तन अधिकारी उन्हें कैसे लागू करते हैं इस बात पर निर्भर होगा. इसी के साथ सबूत किसी भी आपराधिक जांच के केंद्र में हैं. टैक्स चोरी के आरोपी की कानून के मुताबिक जांच की जानी चाहिए. इसी के साथ अधिकारी सिर्फ संदेह को अपराध का सबूत नहीं मान सकते. साथ ही गिरफ्तारी पर सटीक प्रतिबंध लागू कानून और न्यायिक फैसलों पर निर्भर करते हैं.
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