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नेताओं का पासपोर्ट क्यों अटक जाता है, जानिए कैसे होती है प्रक्रिया

जनप्रतिनिधियों के पासपोर्ट को लेकर छत्तीसगढ़ में संकट क्यों? जानें क्या कहता है पासपोर्ट कानून और इसकी प्रक्रिया

22 जुलाई 2026 को 10:13 am बजे
नेताओं का पासपोर्ट क्यों अटक जाता है, जानिए कैसे होती है प्रक्रिया

सौजन्य से:- ETV Bharat

Explainer : आंदोलन की FIR, अदालत की मंजूरी और विदेश यात्रा पर ब्रेक! नेताओं जनप्रतिनिधियों का पासपोर्ट क्यों बन जाता है मुश्किल?

धरना प्रदर्शन के मामलों से लेकर लंबित आपराधिक प्रकरण तक, पासपोर्ट कानून की प्रक्रिया में जनप्रतिनिधि फंस जाते हैं.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : July 22, 2026 at 2:50 PM IST

रायपुर: लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों के लिए धरना-प्रदर्शन, घेराव, चक्का जाम और आंदोलन राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा होते हैं, लेकिन यही आंदोलन कई बार उनकी विदेश यात्रा की राह में सबसे बड़ी कानूनी बाधा बन जाते हैं. आंदोलन के दौरान दर्ज होने वाली एफआईआर और लंबित आपराधिक प्रकरण पासपोर्ट बनवाने या उसके नवीनीकरण में अड़चन पैदा करते हैं. पुलिस सत्यापन में दर्ज मामलों का उल्लेख होने पर पासपोर्ट कार्यालय आवेदन रोक देता है या फिर सीमित अवधि के लिए पासपोर्ट जारी करता है. ऐसे में जनप्रतिनिधियों को पुलिस, पासपोर्ट कार्यालय और अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं.

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों के चुनावी हलफनामों और हालिया राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालें तो बड़ी संख्या में विधायक और जनप्रतिनिधि किसी न किसी आपराधिक मामले का सामना कर चुके हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर नेताओं का पासपोर्ट क्यों अटक जाता है और कानून इसके बारे में क्या कहता है? देखिए ईटीवी भारत के वरिष्ठ संवाददाता प्रवीण कुमार सिंह की यह खास रिपोर्ट.

धरना-प्रदर्शन से शुरू होती है पासपोर्ट की परेशानी

राजनीतिक दलों के नेता जनहित के मुद्दों को लेकर अक्सर धरना-प्रदर्शन, घेराव और चक्का जाम करते हैं. ऐसे आयोजनों के दौरान पुलिस भारतीय न्याय संहिता (पूर्व में आईपीसी), प्रतिबंधात्मक धाराओं और अन्य कानूनों के तहत प्रकरण दर्ज करती है. आंदोलन समाप्त होने के बाद कई मामलों में न तो समय पर जांच पूरी होती है और न ही उनका निराकरण हो पाता है. यही लंबित प्रकरण बाद में पुलिस सत्यापन के दौरान सामने आते हैं और पासपोर्ट जारी होने या उसके नवीनीकरण में सबसे बड़ी बाधा बन जाते हैं.

राजनीतिक आंदोलन को बना दिया जाता है आपराधिक मामला : विकास उपाध्याय

छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व विधायक एवं गृह विभाग के पूर्व संसदीय सचिव विकास उपाध्याय का कहना है कि सबसे ज्यादा परेशानी आज जनप्रतिनिधियों और नेताओं को ही उठानी पड़ रही है. उनका कहना है कि जनहित के मुद्दों पर आंदोलन करने वाले नेताओं के खिलाफ दर्ज प्रकरणों को राजनीतिक संदर्भ में नहीं बल्कि सामान्य आपराधिक मामलों के रूप में दर्ज किया जाता है. जबकि ये हत्या, लूट या डकैती जैसे अपराध नहीं होते, फिर भी पासपोर्ट सत्यापन के दौरान इन्हें गंभीरता से लिया जाता है.

पुलिस वेरिफिकेशन के दौरान लगा दी जाती है आपत्ति

विकास उपाध्याय कहते हैं जब कोई नेता पासपोर्ट के लिए आवेदन करता है तो उसका सत्यापन एसपी कार्यालय और फिर संबंधित थाने तक पहुंचता है. थाने में वर्षों पुराने आंदोलनों से जुड़े लंबित मामले सामने आ जाते हैं, जिसके आधार पर पासपोर्ट कार्यालय आवेदन पर आपत्ति लगाने लगता है. कई बार ऐसे मामलों का रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं होता, लेकिन वे कागजों में लंबित बने रहते हैं. पुलिस न तो मामलों को समय पर अदालत तक पहुंचाती है और न ही उनका समापन होता है. परिणाम यह होता है कि वर्षों बाद जब कोई जनप्रतिनिधि विदेश यात्रा करना चाहता है तो उसे पासपोर्ट नहीं मिल पाता.

कम समय के लिए जारी होता है पासपोर्ट

विकास उपाध्याय यह भी कहा कि यदि किसी तरह पासपोर्ट जारी भी हो जाए तो कई बार उसकी वैधता केवल छह महीने या एक वर्ष की होती है. ऐसे में यदि वीजा प्रक्रिया पूरी होने में समय लग जाए तो पासपोर्ट की अवधि समाप्त हो जाती है और पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू करनी पड़ती है.

क्या कहता है पासपोर्ट कानून ?

हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दिवाकर सिन्हा बताते हैं कि पासपोर्ट जारी करने से पहले पुलिस सत्यापन अनिवार्य प्रक्रिया है. यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई आपराधिक मामला न्यायालय में लंबित है या उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज है, तो पुलिस अपनी रिपोर्ट में इसका उल्लेख करती है. ऐसी स्थिति में पासपोर्ट कार्यालय आवेदन रोक सकता है और कई मामलों में अदालत की अनुमति के बाद ही पासपोर्ट जारी किया जाता है.

जन आंदोलन का जनप्रतिनिधियों के पासपोर्ट पर पड़ता है असर

दिवाकर सिन्हा कहते हैं आंदोलन, धरना, घेराव और चक्का जाम से जुड़े मामलों में भी यदि एफआईआर दर्ज है तो उसका असर पासपोर्ट पर पड़ता है. केवल नया पासपोर्ट ही नहीं बल्कि उसके नवीनीकरण में भी यही प्रक्रिया लागू होती है. यदि पुराने पासपोर्ट के बाद व्यक्ति के खिलाफ नए मामले दर्ज हो गए हैं तो रिन्यूअल भी प्रभावित हो सकता है.

'विपक्ष पर ज्यादा असर पड़ता है'

दिवाकर सिन्हा का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध-प्रदर्शन सामान्यतः विपक्ष करता है. ऐसे में आंदोलनों के दौरान सबसे पहले विपक्षी नेताओं के खिलाफ ही प्रकरण दर्ज होते हैं. कई बार केवल मौके पर मौजूद रहने वाले जनप्रतिनिधियों पर भी मामला दर्ज कर दिया जाता है. जब पासपोर्ट कार्यालय पुलिस से एनओसी मांगता है तो पुलिस लंबित मामलों का हवाला देते हुए आपत्ति दर्ज कर देती है. हालांकि उनका मानना है कि पुलिस को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि मामला किस प्रकृति का है और क्या वह वास्तव में गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है या केवल राजनीतिक आंदोलन से जुड़ा मामला है.

नया पासपोर्ट ही नहीं, रिन्यूअल भी आसान नहीं

कानूनी जानकारों के अनुसार पासपोर्ट का नवीनीकरण केवल पुराने दस्तावेज के आधार पर नहीं होता, बल्कि वर्तमान स्थिति भी देखी जाती है. यदि पहले कोई मामला दर्ज नहीं था, लेकिन बाद में व्यक्ति के खिलाफ कई प्रकरण दर्ज हो गए, तो रिन्यूअल भी अटक सकता है. ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति को अदालत से अनुमति लेकर ही आगे की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है.

विधायकों पर दर्ज मामले

छत्तीसगढ़ के चुनावी हलफनामे बताते हैं कि बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि किसी न किसी आपराधिक मामले का सामना करते रहे हैं. वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में 90 में से 24 विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी थी, जिनमें 13 पर गंभीर मामले दर्ज थे. कांग्रेस के 19, भाजपा के 3 और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के 2 विधायक इस सूची में शामिल थे. तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और बाद में मुख्यमंत्री बने भूपेश बघेल ने भी अपने खिलाफ दर्ज मामले की जानकारी हलफनामे में दी थी.

इससे पहले वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में 90 में से 15 विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी थी, जिनमें 8 पर गंभीर अपराध दर्ज थे। वहीं वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल हलफनामों के अनुसार 17 विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी. इनमें भाजपा के 12 और कांग्रेस के 5 विधायक शामिल थे.

ढाई साल में 9 विधायकों पर FIR, बढ़ीं कानूनी चुनौतियां

भाजपा सरकार के मौजूदा कार्यकाल के लगभग ढाई वर्षों में नौ विधायकों के खिलाफ विभिन्न मामलों में एफआईआर दर्ज हुई. इनमें कांग्रेस के सात और भाजपा के दो विधायक शामिल हैं. इन मामलों में आंदोलन, प्रशासनिक विवाद, कथित भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता, हिंसा और राजनीतिक बयानों से जुड़े आरोप शामिल रहे. ऐसे मामलों के लंबित रहने की स्थिति में संबंधित जनप्रतिनिधियों के लिए पासपोर्ट बनवाना या उसका नवीनीकरण और अधिक जटिल हो सकता है.

क्या राजनीतिक मामलों की FIR हो सकती है वापस ?

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि आंदोलन और राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामलों की सरकारें समय-समय पर समीक्षा कर उन्हें वापस भी लेती रही हैं. हालांकि भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराध, वित्तीय अनियमितता और गंभीर आपराधिक मामलों में दर्ज प्रकरणों को वापस लेना आसान नहीं होता. ऐसे मामलों का अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होता है.

पासपोर्ट बना राजनीति और कानून के बीच नई बहस

राजनीतिक दलों का आरोप है कि आंदोलन से जुड़े मामलों का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं को परेशान करने के लिए किया जाता है, जबकि सरकार का कहना है कि कानून सबके लिए समान है और पुलिस सत्यापन के आधार पर ही पासपोर्ट संबंधी निर्णय लिए जाते हैं. लेकिन इन दोनों दलीलों के बीच एक सच्चाई यह भी है कि बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि वर्षों पुराने आंदोलन संबंधी मामलों के कारण विदेश यात्रा नहीं कर पाते. अदालत की अनुमति, पुलिस सत्यापन और लंबित प्रकरणों की जटिल प्रक्रिया ने नेताओं और जनप्रतिनिधियों के लिए पासपोर्ट को केवल यात्रा का दस्तावेज नहीं, बल्कि एक बड़ी कानूनी चुनौती बना दिया है.

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