पासपोर्ट का मिसाल देना होगी नागरिकता की स्थिति, नहीं तो कैसे नागरिकों की पहचान होगी?
पासपोर्ट अधिनियम और नागरिकता अधिनियम में अंतर तो है, लेकिन सरकारी बयान से विवाद बढ़ गया है. विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी के इस बयान में कि भारतीय पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में, कानूनी और राजनीतिक हलकों में व्यापक बहस छेड़ दी है.

सौजन्य से:- ETV Bharat
Explained - 'पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण तो है, पर फुलप्रूफ नहीं', ये है असली वजह
पासपोर्ट कानून और नागरिकता कानून अलग-अलग हैं. दोनों में अंतर जानना आवश्यक है.
Published : June 26, 2026 at 4:37 PM IST
नई दिल्ली : पासपोर्ट पर भारतीय विदेश मंत्रालय के एक बयान से तूफान मच गया है. विपक्षी पार्टियां सरकार पर बरस पड़ी हैं. उनका कहना है कि अगर पासपोर्ट को भारत की नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा, तो फिर किस दस्तावेज पर सरकार भरोसा करेगी ?
दरअसल, विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के इस बयान ने कि भारतीय पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में, कानूनी और राजनीतिक हलकों में व्यापक बहस छेड़ दी है. विवाद बढ़ते ही केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि यह कोई नया कानूनी रुख नहीं है.
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, भारतीय कानून के तहत भारतीय पासपोर्ट को कभी भी नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में नहीं माना गया है, भले ही यह आमतौर पर आवेदक के दस्तावेजों के व्यापक सत्यापन के बाद ही जारी किया जाता है.
विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि पासपोर्ट का मुख्य कार्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा को सुगम बनाना और विदेशी सरकारों के लिए धारक की राष्ट्रीयता को प्रमाणित करना है. हालांकि पासपोर्ट कई एजेंसियों द्वारा जांच के बाद जारी किए जाते हैं, लेकिन कानूनी रूप से इन्हें नागरिकता प्रमाण पत्र के बजाय यात्रा दस्तावेज के रूप में वर्गीकृत किया जाता है.
इन बयानों से भ्रम की स्थिति पैदा हो गई, क्योंकि कई भारतीय नियमित रूप से पासपोर्ट को पहचान के सबसे विश्वसनीय रूपों में से एक के रूप में उपयोग करते हैं, सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने सवाल उठाया कि सरकारी पासपोर्ट नागरिकता का निर्णायक प्रमाण कैसे नहीं हो सकता, जबकि इसे प्राप्त करने में पुलिस सत्यापन और दस्तावेज जांच शामिल होती है. सरकार ने जवाब देते हुए कहा कि यह कानूनी स्थिति दशकों से चली आ रही है और इसे न तो हाल ही में लागू किया गया है और न ही पिछले 12 वर्षों में इसमें कोई बदलाव किया गया है.
पासपोर्ट अधिनियम और सिटिजनशिप अधिनियम में अंतर
पासपोर्ट अधिनियम, 1967
- केंद्र सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है या करवा सकती है जो भारत का नागरिक नहीं है, यदि सरकार की यह राय हो कि जनहित में ऐसा करना जरूरी है.
- इसका मतलब यह है कि यह कानून भारत से बाहर जाने और यात्रा करने के लिए पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने और उन्हें रेगुलेट करने के लिए है.
- यह भारतीय नागरिकता का अंतिम और अकाट्य प्रमाण नहीं है.
नागरिकता अधिनियम 1955
- यह कानून भारत के संविधान (अनुच्छेद 5-11) के आधार पर यह तय करता है कि भारत का नागरिक कौन बन सकता है और उसकी नागरिकता कैसे समाप्त हो सकती है.
- नागरिकता प्राप्त करने के तरीके - इसके तहत कोई व्यक्ति जन्म, वंश, पंजीकरण, नेचरलाइजेशन या किसी अन्य क्षेत्र के भारत में विलय से नागरिकता प्राप्त कर सकता है.
- भारतीय कानून के अनुसार, भारत में केवल सिंगल सिटिजनशिप की अनुमति है. कोई भी भारतीय नागरिक एक साथ किसी अन्य देश का पासपोर्ट या नागरिकता नहीं रख सकता. विदेशी नागरिकता प्राप्त करने के बाद, नागरिकता (संशोधन) नियमों के तहत भारतीय पासपोर्ट को तुरंत सरेंडर करना अनिवार्य है.
- नागरिकता पूरी तरह से भारत के संविधान और नागरिकता कानून पर निर्भर करती है.
पासपोर्ट से नागरिकता नहीं मिलती है. और न ही यह वह कानूनी दस्तावेज है जो अदालत में नागरिकता पर सवाल उठने पर उसे पक्का तौर पर तय करता है. कई लोकतांत्रिक देशों की तरह, भारत में भी नागरिकता कानून और पासपोर्ट कानून के बीच फर्क किया जाता है. धोखाधड़ी, माता-पिता के बारे में विवाद या गैर-कानूनी तरीके से नागरिकता हासिल करने जैसे दुर्लभ मामलों में, नागरिकता को 'नागरिकता अधिनियम' के प्रावधानों और सहायक सबूतों के जरिए साबित करना पड़ सकता है. इसीलिए कानून की नजर में पासपोर्ट को हर स्थिति में पक्का सबूत नहीं माना जाता है. निरुपमा मेनन राव, पूर्व राजनयिक
क्या कहते हैं कानून के जानकार
"भारत में नागरिकता मुख्य रूप से नागरिकता अधिनियम, 1955 और जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिककरण और क्षेत्र के विलय से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के तहत निर्धारित की जाती है. पासपोर्ट इस बात का पुख्ता सबूत हो सकता है कि दस्तावेज जारी करते समय अधिकारियों ने व्यक्ति के नागरिकता के दावे को स्वीकार कर लिया था, लेकिन बाद में यदि कोई प्रश्न उठता है तो यह कानूनी रूप से निर्णायक नहीं है.” सत्य प्रकाश सिंह, कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञ
सिंह ने यह भी बताया कि भारतीय न्यायालयों ने वर्षों से यह माना है कि पासपोर्ट, मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और पैन कार्ड जैसे दस्तावेज साक्ष्य के रूप में तो मान्य हो सकते हैं, लेकिन वे अकेले नागरिकता संबंधी विवादों का निपटारा नहीं करते. उन्होंने कहा, "न्यायालय इसके बजाय दस्तावेजी साक्ष्यों की समग्रता और नागरिकता कानून के लागू प्रावधानों की जांच करते हैं.”
दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट सहित न्यायिक टिप्पणियों का भी हवाला दिया है, जो इस दृष्टिकोण का समर्थन करती हैं कि अकेले पासपोर्ट को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता.
पूर्व राजनयिकों का कहना है कि यह भ्रम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पासपोर्ट की दोहरी भूमिका के कारण उत्पन्न होता है. नई दिल्ली में ईटीवी भारत से बातचीत में पूर्व राजनयिक जेके त्रिपाठी ने कहा, "विदेशों में, पासपोर्ट को विदेशी सरकारों द्वारा इस बात के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता है कि जारीकर्ता देश धारक को यात्रा और कांसुलर सुरक्षा के लिए अपना नागरिक मानता है." हालांकि, त्रिपाठी इस बात पर जोर देते हैं कि प्रत्येक संप्रभु राज्य को अपने घरेलू कानूनों के तहत नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार है.
"पासपोर्ट मुख्य रूप से एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यात्रा दस्तावेज के रूप में कार्य करता है, न कि जारीकर्ता देश के भीतर नागरिकता संबंधी हर विवाद को सुलझाने वाले एक स्वतंत्र कानूनी प्रमाण पत्र के रूप में."- जेके त्रिपाठी, पूर्व राजनयिक
त्रिपाठी के अनुसार, कई देशों में नागरिकता निर्धारण के लिए अलग-अलग कानूनी ढांचे हैं, जिसका अर्थ है कि पासपोर्ट अक्सर एक प्रशासनिक निर्णय को दर्शाता है, न कि एक अपरिवर्तनीय कानूनी निर्णय को.
इनसे ही मिलती जुलती राय पूर्व राजनयिक निरुपमा राव ने दिया. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "पासपोर्ट इसलिए जारी किया जाता है क्योंकि सरकार इस बात से संतुष्ट हो जाती है कि आप भारतीय नागरिक हैं. इसलिए, आम जिंदगी और अंतरराष्ट्रीय यात्रा में यह नागरिकता का एक मजबूत सबूत है. लेकिन नागरिकता से जुड़े किसी कानूनी विवाद में, नागरिकता कानून ही मुख्य आधार होता है, और पासपोर्ट ऐसा पक्का सबूत नहीं है जो बाकी सभी सबूतों से ऊपर हो."
भारतीय नागरिकता का प्रमाण -कुछ देशों के विपरीत जो सभी नागरिकों को डेटिकेटेड नागरिकता प्रमाण पत्र जारी करते हैं, भारत में ऐसा कोई एक सार्वभौमिक दस्तावेज नहीं है जो देश में जन्मे प्रत्येक व्यक्ति की नागरिकता को निर्णायक रूप से स्थापित करता हो. इसके बजाय, कानूनी संदर्भ के आधार पर नागरिकता साबित करने के लिए कई दस्तावेजों का संयोजन आवश्यक हो सकता है. जैसे- जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता के रिकॉर्ड, निवास संबंधी दस्तावेज, पंजीकरण प्रमाण पत्र और अन्य आधिकारिक दस्तावेज उन मामलों में प्रासंगिक हो सकते हैं जहां नागरिकता पर सवाल उठाया जाता है. आधार कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज विशिष्ट प्रशासनिक उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं, लेकिन आमतौर पर इन्हें अकेले नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में नहीं माना जाता है.
आधार कार्ड में संशोधन कर नागरिकता का प्रमाण दिया जा सकता है
"सरकार को कानूनी ढांचे में औपचारिक रूप से संशोधन करना चाहिए ताकि पासपोर्ट और आधार कार्ड दोनों को भारतीय नागरिकता का वैध और पक्का सबूत माना जा सके, जब तक कि सरकार उन्हें स्पष्ट रूप से रद्द या वापस न ले ले. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण को भारत में रहने वाले गैर-नागरिकों के लिए खास तौर पर एक अलग तरह का आधार कार्ड (जिसके सामने की तरफ तिरछी लाल पट्टी हो) जारी करना चाहिए."- शशि थरूर, कांग्रेस सांसद
क्या आम पासपोर्ट धारकों को चिंता करनी चाहिए - कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि असली पासपोर्ट धारकों को घबराने की कोई खास वजह नहीं है. कानूनी विशेषज्ञ मोहन श्याम ने ईटीवी भारत को बताया, "सरकार पासपोर्ट जारी करने से पहले दस्तावेज सत्यापन और पुलिस जांच करती रहती है, और अधिकांश नागरिकों के लिए पासपोर्ट यात्रा और आधिकारिक लेन-देन के लिए सरकार द्वारा जारी सबसे भरोसेमंद पहचान दस्तावेजों में से एक है."
उनके अनुसार, हालिया स्पष्टीकरण को मौजूदा कानून के तहत पासपोर्ट की कानूनी स्थिति के बारे में एक बयान के रूप में बेहतर समझा जाना चाहिए, न कि इस संकेत के रूप में कि वैध पासपोर्ट धारकों की नागरिकता रद्द होने का खतरा है.
सत्य प्रकाश सिंह ने कहा, "अंततः, इस बहस ने एक व्यापक मुद्दे को उजागर किया है. भारत का नागरिकता ढांचा किसी एक सार्वभौमिक पहचान दस्तावेज के बजाय वैधानिक प्रावधानों और दस्तावेजी सबूतों पर आधारित है. हालांकि एक भारतीय पासपोर्ट इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि अधिकारियों ने यात्रा उद्देश्यों के लिए किसी व्यक्ति के राष्ट्रीयता के दावे को स्वीकार कर लिया है, लेकिन नागरिकता के प्रश्न, जब कानूनी रूप से विवादित होते हैं, तो केवल पासपोर्ट के आधार पर नहीं बल्कि लागू कानूनों और सबूतों के संपूर्ण समूह के आधार पर तय किए जाते हैं."
"भारतीय पासपोर्ट की वैश्विक रैंकिंग पहले से ही 75वीं है. नियमों के अनुसार, केवल भारतीय नागरिक ही भारतीय पासपोर्ट प्राप्त कर सकते हैं, जबकि गैर-नागरिक ऐसा केवल केंद्र सरकार की मंजूरी से ही कर सकते हैं. यदि कोई व्यक्ति गलत दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट प्राप्त करता है, तो उस पर पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. इसलिए, भारतीय पासपोर्ट रखने वाले किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिक माना जाना चाहिए, क्योंकि यह नागरिकता का एक वैध कानूनी प्रमाण है. संविधान में एकल नागरिकता का प्रावधान है, और राज्यों को इस पर निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है. मतदाता सूची में नाम शामिल होना और भारतीय पासपोर्ट का होना, दोनों ही वैध दस्तावेज हैं." वकील विराग गुप्ता
केरल में सबसे अधिक पासपोर्ट धारक
एक अंग्रेजी अखबार इकोनोमिक टाइम्स ने अपने एक लेख में कुछ आंकड़ों का जिक्र किया है. इसके अनुसार देश की कुल आबादी में से 6.4 फीसदी लोगों के पास ही पासपोर्ट है. इनमें से 50 फीसदी केरल, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और पंजाब से हैं. केरल की 28 फीसदी आबादी के पास पासपोर्ट है, जो देश में सबसे अधिक है. छत्तीसगढ़ की 1.3 फीसदी आबादी के पास पासपोर्ट है, जो देश में सबसे कम है.
केरल: -1.27 करोड़
महाराष्ट्र: 1.27 करोड़
उत्तर प्रदेश: 1.07 करोड़
तमिलनाडु: 1.01 करोड़
पंजाब: 89 लाख
गुजरात: 78 लाख
कर्नाटक: 70 लाख
पश्चिम बंगाल: 51 लाख
दिल्ली : 45 लाख
तेलंगाना: 42 लाख
आंध्र प्रदेश: 37 लाख
राजस्थान: -35 लाख
बिहार: 30 लाख
मध्य प्रदेश: 19 लाख
ये भी पढ़ें : पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं, केवल यात्रा का दस्तावेज, MEA के बयान पर घमासान
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