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पंजाब सरकार ने 14191 करोड़ DA के दावे को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट में लीव पटीशन दायर

सरकार ने बताया कि 15 दिनों में 14191 करोड़ रुपये का भुगतान असम्भव है और राज्य के कर्मचारियों का मूल वेतन केंद्र से पहले ही अधिक है, जिससे बजट का 51% वेतन‑पेंशन में ही जा रहा है। इसलिए DA बढ़ाने से वित्तीय दबाव बढ़ेगा, इस कारण राज्य ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पटीशन फाइल की है।

2 सितंबर 2026 को 12:32 am बजे
पंजाब सरकार ने 14191 करोड़ DA के दावे को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट में लीव पटीशन दायर

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

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DA मामले में सुप्रीम कोर्ट के द्वार पंजाब सरकार:दलील-14191 करोड़ 15 दिन में देना संभव नहीं, केंद्र से ज्यादा सेलरी दे रहे; मुलाजिम बोले-हम भी तैयार

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पंजाब सरकार ने मुलाजिमों को DA जारी करने के लिए हाथ खड़े कर दिए। सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की डबल बैंच के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के लिए स्पेशल लीव पटीशन फाइल कर दी है।

सरकार ने अपनी पटीशन में साफ कह दिया कि मुलाजिमों को 15 दिन में 14191 करोड़ रुपए की राशि देना संभव ही नहीं है। यही नहीं सरकार ने अपनी पटीशन में केंद्र सरकार और पंजाब सरकार के मुलाजिमों के वेतन के आंकड़े भी दिए हैं।

पंजाब सरकार की दलील है कि वो केंद्र सरकार से ज्यादा वेतन अपने मुलाजिमों को दे रहे हैं। अगर डीए लागू किया तो मुलाजिमों की सेलरी और ज्यादा हो जाएगी। अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट पंजाब सरकार की स्पेशल लीव पटीशन को सुनवाई के लिए कब लिस्टेड करता है।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर सुनवाई करने से पहले मुलाजिमों का पक्ष भी जानेगा क्योंकि मुलाजिम पहले की सुप्रीम कोर्ट में केविएट फाइल कर चुके हैं। उधर, साझा मुलाजिम मंच के अध्यक्ष सुखचैन सिंह खैहरा ने भी सरकार को सुप्रीम कोर्ट में पूरा जवाब देने की बात कही है।

उनका कहना है कि पंजाब सरकार को जिस तरह हाईकोर्ट की सिंगल बैंच और डबल बैंच में मुंह की खानी पड़ी है वैसे ही सुप्रीम कोर्ट में भी खानी पड़ेगी। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट बंगाल के मामले में भी अपना आदेश सुना चुकी है और उसी आदेश के आधार पर हाईकोर्ट ने भी फैसला दिया है।

पंजाब सरकार ने पटीशन में दी ये 7 अहम दलीलें, जानिए...

1. पंजाब के कर्मचारियों की सैलरी केंद्र से पहले ही ज्यादा है

पंजाब सरकार का सबसे मुख्य तर्क यह है कि राज्य के कर्मचारियों का मूल वेतन केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तुलना में पहले से ही काफी अधिक तय किया हुआ है। बेसिक पे ज्यादा होने की वजह से 42% डीए मिलने के बावजूद पंजाब के कर्मचारियों को घर ले जाने वाली कुल सैलरी केंद्रीय कर्मचारियों के 60% डीए से भी ज्यादा मिलती है। सरकार की दलील है कि जब बेसिक पे के ज्यादा होने से कुल वेतन पहले ही केंद्रीय कर्मचारियों से अधिक बन रहा है, तो बिना सोचे-समझे केवल डीए का प्रतिशत बढ़ा देने से खजाने पर बेवजह और बहुत भारी बोझ पड़ेगा।

2. राज्य की कुल कमाई का 51% हिस्सा सिर्फ वेतन और पेंशन में जा रहा

पंजाब सरकार ने रिजर्व बैंक, 15वें वित्त आयोग और कैग के आंकड़ों का हवाला देते हुए अपनी खस्ताहाल वित्तीय स्थिति की पूरी तस्वीर कोर्ट के सामने रखी है। राज्य सरकार की कुल राजस्व प्राप्ति (कमाई) का लगभग 51% हिस्सा सिर्फ अपने मौजूदा और पूर्व कर्मचारियों के वेतन व पेंशन का भुगतान करने में ही खर्च हो जाता है। अगर तुलना की जाए तो देश के अन्य प्रमुख राज्यों में यह औसत केवल 38% है। अगर वेतन और पेंशन के साथ-साथ राज्य द्वारा लिए गए पुराने कर्जों के ब्याज के भुगतान को भी जोड़ दिया जाए, तो पंजाब की कुल कमाई का करीब 82% हिस्सा इन्हीं तीन चीजों को निपटाने में खत्म हो जाता है। सरकार का तर्क है कि अगर कर्मचारियों का डीए 18% और बढ़ाया गया, तो वेतन-पेंशन का यह खर्च 52% से बढ़कर सीधा 58% हो जाएगा। ऐसे में सरकार के पास आम जनता के लिए स्कूल चलाने, अस्पताल बनाने, सड़कें और पुल तैयार करने, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और कर्ज का मूलधन चुकाने के लिए एक भी रुपया नहीं बचेगा।

3. केंद्र की तर्ज पर डीए देना कोई कानूनी बाध्यता नहीं है

पंजाब सरकार ने याचिका में साफ किया है कि उसके पास अपने कर्मचारियों के लिए खुद के नियम बनाने का अधिकार है। राज्य कर्मचारियों की सेवा शर्तें 'पंजाब सिविल सर्विसेज (रिवाइज्ड पे) रूल्स, 2021' से संचालित होती हैं, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत तैयार किया गया था। इन नियमों में कहीं भी यह शर्त नहीं लिखी है कि राज्य सरकार को केंद्र सरकार के डीए दर, केंद्रीय सूचकांक या किसी ऑटोमैटिक फॉर्मूले का ही पालन करना होगा। डीए की दर और समय तय करना पूरी तरह से राज्य सरकार का अपना अधिकार और फैसला है। हर राज्य की आर्थिक क्षमता और कमाई के स्रोत अलग-अलग होते हैं। पंजाब में हमेशा से ही डीए की दरें केंद्र से अलग रही हैं। सरकार का कहना है कि इतिहास में कभी भी दोनों दरें एक जैसी नहीं रही हैं, इसलिए केंद्र की तर्ज पर ही डीए मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता।

4. IAS अफसरों के साथ राज्य के कर्मचारियों की तुलना करना गलत:

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह मुख्य आधार बनाया था कि जब पंजाब में तैनात आईएएस (IAS) अफसरों को उसी सरकारी खजाने से 60% डीए दिया जा रहा है, तो राज्य के आम कर्मचारियों को 42% देकर भेदभाव क्यों किया जा रहा है। इसके जवाब में सरकार ने तर्क दिया कि आईएएस अफसर 'अखिल भारतीय सेवा' के तहत आते हैं। उनका डीए और सेवा शर्तें केंद्र सरकार के कानूनों के तहत तय होती हैं। पंजाब सरकार के पास आईएएस अफसरों के डीए में फेरबदल करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इसके विपरीत, राज्य के अपने कर्मचारियों की सेवा शर्तें पूरी तरह से राज्य सरकार के कानून के अधीन आती हैं। दो अलग-अलग कानूनों और अलग-अलग सेवाओं से जुड़े वर्गों की आपस में बराबरी नहीं की जा सकती। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) की आड़ लेकर आईएएस अफसरों की तर्ज पर राज्य कर्मचारियों को डीए देने का निर्देश देना कानूनी रूप से गलत है। सुप्रीम कोर्ट भी पहले के कई मामलों में कह चुका है कि केंद्रीय कानून वाले आईएएस अफसरों के डीए की तुलना राज्य कानून वाले कर्मचारियों से नहीं की जा सकती।

5. महज 15 दिनों के भीतर ₹14,191 करोड़ का बकाया देना नामुमकिन

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह वर्ष 2016 से 2021 तक का बकाया डीए सिर्फ 15 दिनों (दो हफ्तों) के अंदर जारी करे। सरकार का कहना है कि यह कुल बकाया राशि लगभग ₹14,191 करोड़ बैठती है। यह राशि पंजाब के पूरे साल के सैलरी और पेंशन बजट के लगभग तीन महीने के कुल खर्च के बराबर है। किसी भी राज्य सरकार के लिए महज 15 दिनों के भीतर अपने खजाने से इतनी बड़ी रकम अचानक निकालना वित्तीय रूप से पूरी तरह असंभव है। अगर सरकार ऐसा करती है तो राज्य का पूरा प्रशासनिक और आर्थिक तंत्र तुरंत ठप हो जाएगा।

6. सरकार बकाये से भाग नहीं रही, पहले से ही किस्तों में भुगतान कर रही है

याचिका में सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि उसने कर्मचारियों के पुराने बकाये का भुगतान करने से कभी इंकार नहीं किया है। राज्य सरकार ने 13 फरवरी 2025 को कैबिनेट में पास करके और 18 फरवरी 2025 को आदेश जारी करके ₹14,191 करोड़ के बकाये को चुकाने के लिए 4 साल की एक व्यवस्थित किस्त योजना बनाई थी। इस योजना के तहत सरकार अब तक ₹6,100 करोड़ से अधिक का बकाया कर्मचारियों को पहले ही बांट चुकी है। हाईकोर्ट की अपनी ही डिवीजन बेंच ने 21 फरवरी 2025 को इस किस्त योजना को रिकॉर्ड पर लिया था। ऐसे में अब अचानक पूरे बकाये को एक साथ 15 दिन में चुकाने का नया आदेश देना बिल्कुल भी व्यावहारिक नहीं है।

7. टेक-होम सैलरी को केंद्र के बराबर करने का नया प्रस्ताव दिया

पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक नया समाधान पेश किया है। सरकार ने कहा है कि उसका मकसद कर्मचारियों को उनके हक से वंचित रखना नहीं है। सरकार इस बात के लिए तैयार है कि जिन श्रेणियों या पदों पर पंजाब के कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी केंद्रीय कर्मचारियों से कम बन रही है, वहां डीए बढ़ाकर उस अंतर को खत्म कर दिया जाए। लेकिन सरकार पूरे पे-स्ट्रक्चर पर एक समान प्रतिशत में डीए बढ़ाकर उन कर्मचारियों का वेतन और ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहती जो पहले से ही केंद्रीय कर्मचारियों के मुकाबले काफी ज्यादा पैसा घर ले जा रहे हैं।

साझा मुलाजिम मंच ने सरकार की याचिका पर कही ये बातें, जानिए..

- सरकार की नीयत में खोट: प्रधान सुखचैन सिंह खैहरा का कहना है कि सरकार अपना बकाया दबाने के लिए तरह-तरह के बहाने बना रही है। उन्हें पहले से अंदाजा था कि सरकार हाईकोर्ट का फैसला मानने के बजाय सुप्रीम कोर्ट भागेगी, इसीलिए उन्होंने पहले ही केविएट फाइल कर दी थी ताकि सरकार एकतरफा स्टे न ले सके।

- बंगाल मामले की नजीर: कर्मचारी नेताओं का दावा है कि पश्चिम बंगाल सरकार के ऐसे ही मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही कर्मचारियों के हक में फैसला दे चुका है और राज्य सरकार की याचिका खारिज कर चुका है। उसी ऐतिहासिक फैसले को आधार बनाकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की सिंगल और डबल बेंच ने फैसला दिया है।

- अदालत में बेनकाब करेंगे आंकड़े: मुलाजिम मंच का कहना है कि सरकार बेसिक पे और डीए के आंकड़ों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रही है। पंजाब के कर्मचारियों का काम और सेवा शर्तें अलग हैं। वे सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखेंगे और सरकार के हर एक दावे की हवा निकालेंगे।

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