स्वतंत्रता संग्राम में वकीलों की भूमिका को याद किया, नई पीढ़ी के वकीलों पर है आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौर में बार ने जो जिम्मेदारी निभाई थी, अब उसे आगे ले जाने का दायित्व नई पीढ़ी के वकीलों पर है। उन्होंने युवा वकीलों से न्याय, संविधान और संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा को अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी बनाने का आह्वान किया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के स्वतंत्रता दिवस समारोह में CJI सूर्यकांत ने स्वतंत्रता संग्राम में वकीलों की भूमिका को याद किया। उन्होंने गांधी, अंबेडकर, पटेल और नेहरू जैसे नेताओं का उल्लेख करते हुए संविधान को जीवंत दस्तावेज बताया।
राजेश चौधरी, नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) की ओर से सुप्रीम कोर्ट के लॉन में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने स्वतंत्रता संग्राम में कानूनी बिरादरी की भूमिका को याद करते हुए कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौर में बार ने जो जिम्मेदारी निभाई थी, अब उसे आगे ले जाने का दायित्व नई पीढ़ी के वकीलों पर है। उन्होंने कहा कि आजादी केवल राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं थी, बल्कि कानून, सार्वजनिक बहस और संवैधानिक मूल्यों के जरिए भी ब्रिटिश शासन की वैधता को चुनौती दी गई थी।
गांधी से अंबेडकर तक कई बड़े नेता थे वकील
CJI ने महात्मा गांधी, डॉ. बी.आर. अंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल, मोतीलाल नेहरू और पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे राष्ट्र निर्माताओं को याद करते हुए कहा कि इन महान नेताओं का कानून से गहरा जुड़ाव था। वकीलों ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक ऐसी साझा राष्ट्रीय भाषा दी, जिसने देश की भौगोलिक और भाषाई विविधता के बावजूद लोगों को एकजुट किया। उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य केवल शासन और व्यवस्था बनाए रखना नहीं है। उसका मूल मकसद न्याय की सेवा करना, स्वतंत्रता की रक्षा और हर व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करना है। इसी सोच ने स्वतंत्र भारत में ऐसा संवैधानिक ढांचा तैयार किया, जिसमें नागरिकों के साथ-साथ राज्य के प्रत्येक अंग को भी कानून के अधीन रखा गया।
संविधान जीवंत दस्तावेज
मुख्य न्यायाधीश ने भारतीय संविधान को ‘जीवंत दस्तावेज’ बताते हुए कहा कि समय के साथ इसकी व्याख्या ने नागरिक अधिकारों का दायरा व्यापक किया है। उन्होंने अनुच्छेद 21 का उदाहरण देते हुए कहा कि जीवन के अधिकार को अब केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन और स्वच्छ पर्यावरण जैसे अधिकार भी इसके दायरे में आते हैं।
उन्होंने कानूनी सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से गरीब और वंचित तबकों तक न्याय पहुंचाने की संवैधानिक प्रतिबद्धता का भी उल्लेख किया।
‘अभी बहुत लंबा सफर बाकी’
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियां “हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी” और रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता “Miles to go before I sleep” का उल्लेख करते हुए CJI ने कहा कि राष्ट्र निर्माण की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। देश और न्याय व्यवस्था को लगातार आगे बढ़ाने की जरूरत है।
युवा वकीलों को सौंपी जिम्मेदारी
CJI ने कहा कि मौजूदा दौर में कानूनी पेशा पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण और प्रतिस्पर्धी है, लेकिन युवा वकीलों की तकनीकी दक्षता और सामाजिक संवेदनशीलता पर उन्हें पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौर में बार ने जो जिम्मेदारी निभाई थी, अब उसे आगे ले जाने का दायित्व नई पीढ़ी के वकीलों पर है। उन्होंने युवा वकीलों से न्याय, संविधान और संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा को अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी बनाने का आह्वान किया। समारोह में स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को नमन करते हुए उन्होंने कहा कि आज की स्वतंत्रता के पीछे अनगिनत पुरुषों और महिलाओं के त्याग और सपने हैं, जिन्हें आने वाली पीढ़ियों को आगे बढ़ाना है।
लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें
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