होमकानूनशासन की बेरुखी और हुकूमत का खेल
कानून

शासन की बेरुखी और हुकूमत का खेल

एक समाज में जहाँ न्याय मौन है और सच्चाई को दबाया जाता है, वहाँ मज़हब के नाम पर हिंसा होती है और गरीबी का दंश झेलने वाले लोगों को न्याय नहीं मिलता। यह एक दर्दनाक वास्तविकता है जिसे कवि ने अपनी रचना में उजागर किया है।

15 अगस्त 2026 को 05:55 pm बजे
शासन की बेरुखी और हुकूमत का खेल

सौजन्य से:- Amar Ujala

विज्ञापन

अदालत मौन है, और सच यहाँ ज़िंदा जलाया जाता है,

हुकूमत के इशारों पर तमाशा रोज़ नया रचाया जाता है।अजीब दौर है कि भूखे पेट को अब कोई रोटियाँ नहीं देता,

मगर मज़हब के नाम पर हर रोज़ ख़ून बहाया जाता है।

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'

- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।

😊अति सुंदर

😎बहुत खूब

👌अति उत्तम भाव

👍बहुत बढ़िया..

🤩लाजवाब

🤩बेहतरीन

🙌क्या खूब कहा

😔बहुत मार्मिक

😀वाह! वाह! क्या बात है!

🤗शानदार

👌गजब

🙏छा गये आप

👏तालियां

✌शाबाश

😍जबरदस्त

विज्ञापन

बेहतर अनुभव के लिए

4.3

ब्राउज़र में ही

Powered by Nyaya 247 News

संबंधित ख़बरें

इसी विषय की और ख़बरें →

ताज़ा ख़बरें