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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, वयस्क मानकर सजा पाए नाबालिग की सजा रद्द नहीं होगी लेकिन मेरिट पर हुई दोषसिद्धि कायम

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी किशोर के मामले की सुनवाई यदि रेग्युलर ट्रायल कोर्ट में हुआ हो और उसे वयस्क मानकर सुनवाई हुई हो और दोषी करार दिया गया हो तो बाद में नाबालिग साबित होने पर सजा कायम नहीं रह सकती लेकिन दोषसिद्धी रद्द नहीं की जा सकती है।

15 अगस्त 2026 को 06:55 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, वयस्क मानकर सजा पाए नाबालिग की सजा रद्द नहीं होगी लेकिन मेरिट पर हुई दोषसिद्धि कायम

सौजन्य से:- Navbharat Times

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वयस्क मानकर सजा पाए आरोपी के नाबालिग साबित होने पर उसकी सजा रद्द होगी, लेकिन मेरिट पर हुई दोषसिद्धि कायम रहेगी।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी किशोर के मामले की सुनवाई यदि रेग्युलर ट्रायल कोर्ट में हुआ हो और उसे वयस्क मानकर सुनवाई हुई हो और दोषी करार दिया गया हो तो बाद में नाबालिग साबित होने पर सजा कायम नहीं रह सकती लेकिन दोषसिद्धी रद्द नहीं की जा सकती है। अगर अपराध किए जाने की तारीख पर आरोपी किशोर था यह साबित होता है तो नियमित अदालत द्वारा सुनाई गई सजा कायम नहीं रह सकती। कोर्ट ने यह टिप्पणी हत्या के एक मामले में की, जिसमें आरोपी को वयस्क मानकर मुकदमा चलाया गया था।

आजीवन कारावास की सजा रद्द

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ के सामने यह मामला आया। आरोपी पर हत्या का अपराध साबित होने के बाद नियमित अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर आरोपी ने दलील दी कि उसकी किशोरावस्था अपील लंबित रहने के दौरान साबित हो चुकी है। यानी घटना के वक्त वह नाबालिग था इसलिए नियमित अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि प्रथम दृष्टया अवैध है और उसे भी रद्द किया जाना चाहिए।

दोषसिद्धि रद्द करने से कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस अरविंद कुमार द्वारा लिखे गए फैसले में साफ किया गया कि नियमित अदालत द्वारा की गई सुनवाई के बावजूद यदि दोषसिद्धि गुण-दोष के आधार पर हुई है, तो केवल आरोपी के किशोर होने के कारण उसे रद्द करने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, नियमित आपराधिक अदालत द्वारा एक वयस्क को ध्यान में रखकर सुनाई गई सजा किशोर पर लागू नहीं हो सकती। यानी जुवनाइल को सजा नहीं दी जा सकती है।

कोर्ट ने दिया रिहाई का आदेश

अदालत ने कहा कि मेरिट के आधार पर हुई दोषसिद्धि को केवल इस कारण रद्द करने की आवश्यकता नहीं है कि व्यक्ति की सुनवाई नियमित अदालत ने की थी लेकिन अदालत ने साफ किया कि नाबालिग के लिए वयस्क के लिए निर्धारित सजा कायम नहीं रह सकती। अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता अपराध की तारीख पर किशोर था। साथ ही, वह कानून के तहत निर्धारित अधिकतम अवधि से भी अधिक समय जेल में रह चुका था। इस आधार पर कोर्ट ने उसकी किशोर होने की स्थिति को स्वीकार करते हुए उसकी रिहाई का आदेश दिया।

आजीवन कारावास और सात साल की सजा लागू नहीं होगी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाई गई आजीवन कारावास तथा सात साल के कठोर कारावास की सजा, जुर्माने और जुर्माना अदा न करने की स्थिति में लागू होने वाली शर्तों सहित, अपीलकर्ता के खिलाफ प्रभावी नहीं रह सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम याची को नाबालिग मानते हैं। ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाई गई आजीवन कारावास और सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा, जुर्माने तथा डिफॉल्ट संबंधी शर्तों सहित, अपीलकर्ता के खिलाफ लागू नहीं हो सकती। घटना के साल यानी 1981 में आरोपी 18 साल से कम का था।

दोषसिद्धि से जुड़ी अयोग्यता भी लागू नहीं होगी

अदालत ने जेजे एक्ट 2000 की धारा 19 का भी उल्लेख किया। इस प्रावधान के तहत अधिनियम के तहत किशोर के रूप में निपटाए गए व्यक्ति को किसी अन्य कानून के तहत दोषसिद्धि से जुड़ी अयोग्यता का सामना नहीं करना पड़ता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह सुरक्षा अपीलकर्ता को भी मिलेगी। उसने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, सोनीपत को रिकॉर्ड से संबंधित आवश्यक वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर अपील को आंशिक रूप से मंजूर कर दिया। मामला हरियाणा का है।

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी, नवभारत टाइम्स में लीगल एडिटर हैं। वह 22 साल से भी ज्यादा वर्षों से लीगल रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शुरुआत में वह दिल्ली की निचली अदालत और सीबीआई कवर करते थे और बाद में वह दिल्ली हाई कोर्ट और फिर लगातार डेढ़ दशक से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे हैं। इस दौरान राजेश ने देश के तमाम हाई प्रोफाइल केस नीतीश कटारा मर्डर केस, जेसिक लाल केस, बोफोर्स केस, उपहार केस, पार्लियामेंट अटैक केस, प्रिय दर्शनी मट्टू केस से लेकर तमाम संवैधानिक मसले कवर किए जिनमें अनुच्छेद-370, तीन तलाक, निजता का अधिकार, होमो सेक्सुअलिटी को अपराध से बाहर करने का मामला और राम मंदिर मसले अहम है। राजेश ने इस 22 साल के करियर के दौरान दो साल 2006 से लेकर 2007 के सितंबर तक सहारा समय टीवी चैनल में भी बतौर लीगल संवावददाता काम किया। इसके बाद दोबारा वह नवभारत टाइम्स आए और उसके बाद लगातार कानूनी अफेयर्स को कवर करते रहे। नेशनल ब्यूरो में रहते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय को कवर करने के साथ साथ कानून के विषय पर लगातार एडिट पेज पर लिख रहे हैं। साथ ही लगातार ऑनलाइन माध्यम के लिए भी सक्रिय रिपोर्टिंग करते रहे हैं और ..कोर्ट रूम..नाम के एक साप्ताहिक विडियो इंटरव्यू भी लगातार देते हैं जिनमें सप्ताह भर के मुख्य कानूनी मसले पर उनका साक्षात्कार प्रसारित होता है। इसके अलावा वह लगातार लीगल मसले पर लीगल फोरम नामक कॉलम भी लिखते रहे हैं। उन्होंने दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में एमएससी किया है। साथ ही उन्होंने जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा किया और एलएलबी भी कर रखा है।... और पढ़ें

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