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अमेरिकी अदालत में अदाणी समूह का मुकदमा: जज की मंजूरी पर वकील ने क्या कहा

अमेरिकी कानूनी विशेषज्ञ क्रिस मैन ने कहा कि अदाणी समूह के खिलाफ दर्ज मामले को वापस लेने के लिए DOJ को अदालत की मंजूरी लेना कानूनन आवश्यक है। उनका कहना है कि अदालत सरकार को ऐसा मुकदमा चलाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती जिसे वह आगे नहीं बढ़ाना चाहती।

29 जून 2026 को 03:24 am बजे
अमेरिकी अदालत में अदाणी समूह का मुकदमा: जज की मंजूरी पर वकील ने क्या कहा

सौजन्य से:- Amar Ujala

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Case on Adani In US: अमेरिकी अदालत में क्या खत्म होगा अदाणी से जुड़ा मुकदमा, जज की मंजूरी पर वकील ने क्या कहा

Mon, 29 Jun 2026 07:52 AM IST

प्रशांत तिवारी

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला

Published by: प्रशांत तिवारी

Updated Mon, 29 Jun 2026 07:52 AM IST

सार

अमेरिकी कानूनी विशेषज्ञ क्रिस मैन के अनुसार अदाणी समूह के खिलाफ दर्ज मामले को वापस लेने के लिए DOJ को अदालत की मंजूरी लेना कानूनन आवश्यक है, लेकिन यह एक सामान्य न्यायिक प्रक्रिया है। उनका कहना है कि अदालत सरकार को ऐसा मुकदमा चलाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती जिसे वह आगे नहीं बढ़ाना चाहती।

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विस्तार

अमेरिका के एक वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ ने अदाणी समूह के खिलाफ दायर आरोपपत्र (इंडिक्टमेंट) को रद्द करने के लिए अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) की ओर से दाखिल याचिका पर जज निकोलस गैराफिस के हालिया आदेश को न्यायिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा बताया है। उनका कहना है कि अदालत की निगरानी किसी असाधारण कानूनी अड़चन का संकेत नहीं, बल्कि संघीय आपराधिक मामलों में अपनाई जाने वाली नियमित प्रक्रिया है।

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स्टेपटो के पार्टनर क्रिस मैन ने रखी कानूनी राय

समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में अंतरराष्ट्रीय लॉ फर्म स्टेपटो के पार्टनर और इंटरनेशनल व्हाइट-कॉलर तथा कॉर्पोरेट डिफेंस मामलों के विशेषज्ञ क्रिस मैन ने कहा कि इस तरह के मामलों में अदालत की मंज़ूरी आवश्यक होती है, लेकिन अंतिम निर्णय लेने के अधिकार मुख्य रूप से न्याय विभाग के पास ही रहते हैं। क्रिस मैन ने इससे पहले हंटर बाइडेन और वॉलमार्ट जैसी चर्चित हस्तियों एवं कंपनियों का DOJ और SEC की जटिल जांचों में प्रतिनिधित्व किया है।

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केस वापस लेने के लिए अदालत की मंजूरी क्यों जरूरी है?

क्रिस मैन ने बताया कि संघीय आपराधिक प्रक्रिया के नियम 48(a) के तहत यदि अभियोजन पक्ष किसी मामले को वापस लेना चाहता है तो उसे अदालत से 'लीव ऑफ कोर्ट' यानी न्यायालय की अनुमति लेनी होती है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह महज एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता है। उन्होंने कहा, 'यह पूरी तरह सामान्य प्रक्रिया है। किसी मामले को शुरू करने या वापस लेने के फैसले में न्याय विभाग के पास व्यापक अधिकार होते हैं। एक बार मामला अदालत में दाखिल हो जाए तो उसे वापस लेने के लिए जज की मंज़ूरी आवश्यक होती है, लेकिन मुझे ऐसा कोई मामला याद नहीं जिसमें किसी जज ने इस तरह की अनुमति देने से इनकार किया हो।"

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सरकार को मुकदमा चलाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता कोर्ट

इस सवाल पर कि क्या अदालत DOJ की याचिका को प्रभावी रूप से रोक सकती है, क्रिस मैन ने कहा कि न्यायपालिका की संवैधानिक सीमाएं स्पष्ट हैं। यदि सरकार किसी मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती तो जज के पास उसे मुकदमा चलाने के लिए बाध्य करने की शक्ति नहीं होती। मामले से जुड़े कानूनी सूत्रों के अनुसार अदालत ने अमेरिकी सरकार को 13 जुलाई 2026 तक अपना औपचारिक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। माना जा रहा है कि इससे मामले के निपटारे की प्रक्रिया तेज़ हो सकती है।

DOJ देगा और विस्तृत कानूनी विश्लेषण

विशेषज्ञों का मानना है कि न्याय विभाग अदालत की ओर से मांगे गए स्पष्टीकरण से पीछे नहीं हटेगा और अपनी दलीलों को अधिक विस्तृत कानूनी विश्लेषण के साथ पेश करेगा। क्रिस मैन ने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि DOJ के लिए यह कोई बड़ी परेशानी है। विभाग अधिक विस्तृत विश्लेषण के साथ वापस आएगा और मेरा मानना है कि वह अदालत की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा।' उन्होंने अनुमान जताया कि पूरी प्रक्रिया महीनों नहीं, बल्कि कुछ ही सप्ताह में पूरी हो सकती है।

अदाणी समूह ने आरोपों को बताया कानूनी रूप से कमजोर

अदाणी समूह का कहना है कि उसके खिलाफ दर्ज मामले में गंभीर कानूनी खामियां हैं। 24 जून 2026 को अदालत को भेजे गए पत्र में कंपनी ने कहा कि संबंधित लेन-देन गैर-अमेरिकी जारीकर्ताओं और ऋणदाताओं के बीच हुए थे तथा उन पर अंग्रेजी कानून लागू होता है। कंपनी ने तर्क दिया कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के 'मॉरिसन बनाम नेशनल ऑस्ट्रेलिया बैंक' फैसले के अनुसार ऐसे लेन-देन अमेरिकी प्रतिभूति कानून के दायरे में नहीं आते।

रिश्वत के आरोपों पर भी उठाए सवाल

बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि रिश्वतखोरी के आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। इसके समर्थन में भारत के एक पूर्व वरिष्ठ नियामक अधिकारी की विशेषज्ञ गवाही का हवाला दिया गया, जिसमें कथित भुगतान को अवैध रिश्वत नहीं, बल्कि पारदर्शी मूल्य छूट (प्राइस डिस्काउंट) बताया गया है। अदाणी समूह ने यह भी कहा कि निवेशकों को किसी प्रकार का वित्तीय नुकसान नहीं हुआ, क्योंकि सभी बॉन्ड और ऋण से जुड़ी देनदारियों का समय पर भुगतान किया गया है या वे पूरी तरह सुरक्षित स्थिति में हैं।

अगर याचिका खारिज हुई तो दोनों पक्ष कर सकेंगे अपील

आगे की कानूनी प्रक्रिया पर क्रिस मैन ने कहा कि यदि अदालत आरोपपत्र को खारिज करने की याचिका स्वीकार नहीं करती है तो सरकार और अदाणी समूह, दोनों के पास अपील करने का अधिकार होगा।

ये भी पढ़ें: भीषण गर्मी से यूरोप में 1300 से अधिक मौतें, फ्रांस पर सबसे अधिक मार; अन्य देशों का हाल क्या?

'लीव ऑफ कोर्ट' का उद्देश्य क्या है?

कानूनी विश्लेषकों के अनुसार नियम 48(a) में अदालत की अनुमति का प्रावधान इसलिए रखा गया है ताकि अभियोजन पक्ष किसी आरोपी को बार-बार मुकदमा दर्ज कर और वापस लेकर अनावश्यक रूप से परेशान न कर सके। हाल ही में न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट में फीफा से जुड़े एक मामले में जज चेन ने भी कहा था कि DOJ द्वारा किसी मामले को वापस लेने के प्रस्ताव को अस्वीकार करने का अदालत के पास "बेहद सीमित अधिकार" होता है। इसी कारण विशेषज्ञों का मानना है कि अदाणी मामले में भी अदालत की भूमिका मुख्य रूप से प्रक्रियात्मक निगरानी तक ही सीमित रहेगी।

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