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संदेह के आधार पर उम्रकैद नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में उम्रकैद की सजा रद्द कर दी है। कोर्ट ने कहा है कि संदेह साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता।

9 जुलाई 2026 को 03:56 am बजे
संदेह के आधार पर उम्रकैद नहीं

सौजन्य से:- Jagran

संदेह चाहे जितना गहरा हो साक्ष्य नहीं बन सकता: हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हत्या के एक मामले में अभियुक्त लड्डन की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि संदेह कितना भी गहरा हो, वह साक्ष्य ...और पढ़ें

HighLights

- हाई कोर्ट ने लड्डन की उम्रकैद की सजा रद्द की।

- संदेह साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता, कोर्ट की टिप्पणी।

- प्रयागराज के 1987 के हत्या मामले में फैसला।

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हत्या मामले में लड्डन नामक अभियुक्त की उम्रकैद यह टिप्पणी करते हुए रद कर दी है कि संदेह चाहे कितना भी गहरा हो, वह साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर तथा न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने यह आदेश दिया है।

वर्ष 1987 में प्रयागराज (तब इलाहाबाद) के राजापुर इलाके में नन्हे उर्फ अब्दुल रहमान की हत्या हुई थी। शिकायतकर्ता शकील अहमद के अनुसार उनके भाई की बहन सफीना से पुराने रिश्ते को लेकर रंजिश थी। राजापुर तिराहे पर 21 सितंबर 1987 की रात शाहिद ने नन्हे पर गोली चलाई, जिससे वह घायल हो गया और बाद में अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

आरोप था कि लड्डन और रहमत ने भी हवाई फायर किए। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने शाहिद, लड्डन और रहमत को 28 मई 1990 को धारा 302/34 आइपीसी के तहत दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसे हाई कोर्ट में अपील में चुनौती दी गई।

अपील लंबित रहने के दौरान शाहिद और रहमत की मृत्यु हो जाने से उनके खिलाफ अपील निष्प्रभावी हो गई। सिर्फ लड्डन की सुनवाई हुई। दोनों पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने कहा कि घटनास्थल से सिर्फ एक गोली बरामद हुई। लड्डन और रहमत द्वारा हवाई फायर करने के दावे के बावजूद कोई छर्रे, खोखे कारतूस नहीं मिले।

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गवाहों ने स्वीकार किया कि लड्डन की मृतक नन्हे से कोई दुश्मनी नहीं थी। उसकी शाहिद से भी कोई रिश्तेदारी या संबंध नहीं था। धारा 34 आइपीसी के तहत दोषी ठहराने के लिए पूर्व-नियोजित योजना और सामान्य आशय साबित होना जरूरी है, जो इस मामले में नहीं मिला।

लड्डन को केवल शक के आधार पर फंसाया गया था, क्योंकि वह अपनी रिश्तेदार स्मत नाजमा के घर राजापुर आया-जाया करता था। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए जमानती बांड भी रद कर दिया है।

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