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पत्नी को अपनी जिंदगी जीने का अधिकार, हैबियस कॉर्पस से नहीं मिलेगी वापस

उड़ीसा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पत्नी को अपनी जिंदगी जीने का अधिकार है और हैबियस कॉर्पस के माध्यम से उसे वापस पाने की कोशिश नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी पति की संपत्ति नहीं है और उसे अपने जीवन के फैसले लेने का पूरा अधिकार है।

9 जुलाई 2026 को 07:57 am बजे
पत्नी को अपनी जिंदगी जीने का अधिकार, हैबियस कॉर्पस से नहीं मिलेगी वापस

सौजन्य से:- Navbharat Times

Wife Is Not Husband's Property: मामले में एक व्यक्ति की पत्नी अपनी इच्छा से किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने चली गई। पत्नी को वापस पाने के लिए पति ने उड़ीसा हाईकोर्ट में 'Habeas Corpus'याचिका लगायी। लेकिन उसे अदालत ने साफ 'ना 'जवाब दिया है। जानिए क्यों ..

नई दिल्ली: वैसे तो भारत में हिंदू शादियां सात जन्मों का बंधन मानी जाती हैं। लेकिन कई लोग इसी जिंदगी में किसी और का साथ पकड़ लेते हैं। ऐसे में उड़ीसा में एक दिलचस्प वाकया सामने आया है। विवाह के बाद एक व्यक्ति की पत्नी अपनी इच्छा से किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने चली गई। पत्नी को वापस पाने के लिए पति ने अदालत में हैबियस कॉर्पस याचिका लगायी। लेकिन उसे उड़ीसा हाईकोर्ट ने साफ 'ना' जवाब दिया है। अदालत ने कहा कि हैबियस कॉर्पस का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत से मुक्त कराना है, न कि वैवाहिक विवाद सुलझाना। और भी बहुत कुछ कहा है, जानना दिलचस्प रहेगा...

वैवाहिक बंधन में होने के बावजूद पत्नी ने खुद चुना अलग रहना

यह मामला Shri Lambodar Patra v. State of Odisha and Others के नाम से जाना गया है। इसमें विवाह के बाद लंबोदर पात्रा की पत्नी अपनी इच्छा से किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने चली गई। पति ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया है। पुलिस में शिकायत करायी और फिर उसे वापस लाने के लिए उड़ीसा हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका भी दायर की। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका के साथ लगाए गए दस्तावेजों का परीक्षण किया। इन्हीं दस्तावेजों में पति का स्वयं का बयान था कि वह पत्नी से मिलने दूसरे व्यक्ति के घर गया था और पत्नी ने उसके साथ लौटने से साफ इनकार कर दिया था।

बालिग महिला कोई संपत्ति नहीं, उसे जीवन के फैसले लेने का पूरा अधिकार - हाईकोर्ट

लंबोदर पात्रा की हैबियस कॉर्पस याचिका की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश हरिश टंडन और न्यायमूर्ति मुराहारी श्री रमन की खंडपीठ ने की।

मामले के तथ्यों को देखने के बाद अदालत ने कहा कि महिला किसी की अवैध हिरासत में नहीं थी, बल्कि उसने अपनी इच्छा से वहीं रहने का निर्णय लिया था। इसलिए हैबियस कॉर्पस का कोई आधार नहीं बनता।

अदालत ने साफ किया कि एक बालिग महिला अपने जीवन से जुड़े निर्णय स्वयं लेने के लिए पूरी तरह सक्षम है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पत्नी को पति की चल संपत्ति नहीं माना जा सकता।

अदालत ने माना कि तथ्यों से साफ है कि यदि वह अपनी इच्छा से किसी अन्य स्थान या व्यक्ति के साथ रहना चाहती है, तो संविधान उसे यह स्वतंत्रता देता है। अदालत ने कहा कि विवाह का अस्तित्व किसी महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समाप्त नहीं करता।

और फिर अंत में हाईकोर्ट ने फैसले में साफ कहा कि कोई बालिग महिला अपनी स्वतंत्र इच्छा से रह रही है, तो उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है। न्यायालय ने कहा कि कई मामलों में हैबियस कॉर्पस का इस्तेमाल केवल जीवनसाथी पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। अदालत ने कहा कि ऐसा रवैया न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इसी कारण याचिका को खारिज करते हुए पति पर 50,000 रुपये की लागत भी लगाई गई।

यदि वैवाहिक संबंधों में विवाद है, तो उसके लिए कानून में अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं, लेकिन हैबियस कॉर्पस का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हैबियस कॉर्पस का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत से मुक्त कराना है, न कि वैवाहिक विवाद सुलझाना।

उड़ीसा हाईकोर्ट की मामले में टिप्पणी

संविधान के अनुच्छेद 21 की महत्ता की स्थापना

यह निर्णय केवल एक वैवाहिक विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की के नजरिए से भी काफी अहम है। यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 21 के व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और के तहत जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार को और मजबूत करता है। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि अदालतें संवैधानिक उपचारों के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं करेंगी।

दरअसल समय समय पर अदालतों ने बालिग महिला हो पुरुष उसके संविधान के तहत दिए गए अधिकारों की रक्षा की है। इस मामले में महिला के अधिकारों की रक्षा हुई है। लेकिन हाईकोर्ट ने फैसले से एक बात यह भी साफ कर दी है कि ऐसे मामलों में पति यदि चाहे तो विवाह संबंधी अन्य कानूनी उपाय, जैसे तलाक या वैवाहिक अधिकारों से जुड़े वैधानिक प्रावधानों का सहारा ले सकता है।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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