अदालतों में AI द्वारा बनाई गई नकली जानकारी खतरनाक: सुप्रीम कोर्ट ने दिलाए चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि AI द्वारा बनाई गई नकली जानकारी अदालतों में पेश करने से न्याय व्यवस्था को नुकसान पहुंचता है। कोर्ट ने कहा कि इससे न्यायिक प्रक्रिया खराब होती है और अदालत के फैसलों पर लोगों का भरोसा कम हो सकता है।

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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सुप्रीम कोर्ट बोला- फैसलों में AI के फर्जी उदाहरण खतरनाक:ये मिथाइल आइसोसाइनेट जैसे, इससे न्याय व्यवस्था को नुकसान; NCLT का फैसला रद्द
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बनाए गए नकली कानूनी उदाहरणों का इस्तेमाल खतरनाक है। कोर्ट ने इसकी गंभीरता समझाने के लिए कहा कि यह खतरा उतना ही बड़ा है, जितना भोपाल गैस त्रासदी में जहरीली (AI) गैस का रिसाव था।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने गुरुवार को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का फैसला रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। उन्होंने कहा-
AI से बनाए गए झूठे और गैर-मौजूद फैसलों को कोर्ट में असली बताकर पेश करना न्याय व्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए ऐसे मामलों में अदालतों को बिल्कुल भी नरमी नहीं दिखानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि नकली कानूनी जानकारी दिखने में छोटी बात लग सकती है, लेकिन यह बहुत खतरनाक होती है। इससे न्यायिक प्रक्रिया खराब होती है और अदालत के फैसलों पर लोगों का भरोसा भी कम हो सकता है।
पूरा मामले समझें...
यह मामला एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट लिमिटेड, जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड और पूजा रमेश सिंह से जुड़े दिवालियापन विवाद का है। इस मामले में NCLT मुंबई ने IBC की धारा-7 के तहत एक याचिका स्वीकार की थी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
NCLT ने अपने फैसले को सही साबित करने के लिए जिन कानूनी मामलों का हवाला दिया था, उनमें से कई मामले असल में थे ही नहीं। फैसले में कुछ ऐसे मामलों का नाम लिखा गया था, जो पूरी तरह से मनगढ़ंत यानी नकली थे। उनकी कानूनी साइटेशन भी बनाई गई थीं और उनका कोई वास्तविक रिकॉर्ड मौजूद नहीं था।
जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर कहा कि उनके वकील ने इन नकली मामलों का हवाला नहीं दिया था। बैंक के अनुसार, NCLT ने इन्हें अपनी तरफ से की गई रिसर्च के दौरान शामिल किया था।
सुप्रीम कोर्ट के 5 कमेंट
- अदालत AI तकनीक के खिलाफ नहीं है। समस्या AI में नहीं, बल्कि उससे बनाई गई झूठी जानकारी को सच बताकर पेश करने में है। इसलिए AI का इस्तेमाल सावधानी, जांच और इंसानी निगरानी के साथ ही किया जाना चाहिए।
- अगर कोई वकील बिना जांच किए AI से मिली जानकारी को कोर्ट में पेश करता है, तो यह उसकी बड़ी पेशेवर गलती है। इसी तरह अगर कोई जज भी ऐसी गलत जानकारी पर भरोसा करता है, तो यह भी गंभीर चूक मानी जाएगी।
- न्याय व्यवस्था में ईमानदारी और भरोसा बनाए रखना बहुत जरूरी है। AI का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन अंतिम फैसला और जांच हमेशा इंसानों को ही करनी चाहिए।
- सिर्फ चेतावनी देना काफी नहीं है। अगर कोई गलती करता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया एक समिति बनाए। यह समिति ऐसे नियम तैयार करेगी, जिससे अदालतों में AI से बनी नकली और भ्रामक जानकारी पेश करने से रोका जा सके और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।
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