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अपहरण के 25 साल पुराने मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जताई गहरी चिंता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपहरण के 25 साल पुराने मामले में सुनवाई में हुई देरी को लेकर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया है।

17 जुलाई 2026 को 03:14 pm बजे
अपहरण के 25 साल पुराने मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जताई गहरी चिंता

सौजन्य से:- Jansatta

‘तारीख पर तारीख’ वाला डायलॉग एक बार फिर अदालत में गूंजा, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपहरण के 25 साल पुराने मामले में सुनवाई में हुई देरी को लेकर गहरी चिंता जताई। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राजीव भारती ने साल 2001 में अपहरण के मामले में सुनवाई करते हुए आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया।

अदालत ने आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका को स्वीकार करते हुए 14 जुलाई को सुनाए आदेश में कहा कि अक्सर यह कहा जाता है कि लोगों को ‘तारीख पर तारीख’ के सिवा कुछ नहीं मिलता। कोर्ट ने कहा कि यह संस्कृति हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बननी चाहिए।

क्या है यह पूरा मामला?

30 दिसंबर, 2001 को एक शख्स ने एफआईआर दर्ज कराई थी। एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि 15 साल की उसकी बेटी 12 दिसंबर, 2001 को उनके घर के बाहर से लापता हो गई थी। जब उन्होंने अपनी बेटी की तलाश की तो गांव के ही दो लोगों ने बताया कि वे बहला-फुसला कर उसे अपने साथ ले गए थे।

एफआईआर में यह आरोप भी लगाया गया था कि आरोपी ने उसकी बेटी का अपहरण शादी करने के लिए किया था और उनकी बेटी घर से जाते वक्त सोने और चांदी के आभूषण और हजार रुपए नकद भी ले गई थी।

जांच के बाद पुलिस ने इस मामले में अप्रैल 2002 में चार्जशीट दायर की थी और इसमें अपहरण और शादी के लिए अपहरण की धाराएं लगाई गई थी। इस मामले में मजिस्ट्रेट न्यायालय की ओर से जारी किए गए समन के खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम सुरक्षा दी लेकिन बाद में हुई सुनवाईयों के दौरान आरोपियों की ओर से कोई भी अदालत में नहीं आया और हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। बाद में निचली अदालत ने इस मामले में फिर से सुनवाई शुरू की और आरोपियों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए।

आरोपियों ने क्या दलील दी?

आरोपियों ने अदालत को बताया कि यह मामला दोनों के बीच आपसी सहमति का था और लड़की अपनी मर्जी से ही एक आरोपी के साथ गई थी। आरोपियों ने अदालत को यह भी बताया कि बाद में उन्होंने शादी कर ली थी और उनके घर वाले भी मान गए थे।

अदालत ने चिंता जताई कि 2001 में आपराधिक मामला दर्ज हुआ और दो दशक से भी ज्यादा वक्त से लंबित है। अदालत ने कहा कि इस मामले में आरोपियों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और इसलिए उन्हें सुरक्षा दी जाए और वे दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण कर दें। अदालत ने कहा कि आत्मसमर्पण करने के बाद उन्हें अग्रिम जमानत पर रिहा कर दिया जाए।

यह भी पढ़ें- कोर्ट ने मस्जिद गिराने का दिया आदेश

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की एक अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय परिसर के अंदर स्थित कथित रूप से अवैध मस्जिद को ध्वस्त करने का आदेश दिया है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।

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