सिर्फ अभद्र भाषा नहीं अश्लीलता है: सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपसी विवाद में गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना आईपीसी के तहत अश्लीलता के दायरे में नहीं आता।

सौजन्य से:- Amar Ujala
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Supreme Court: अदालत का महत्वपूर्ण फैसला, कहा- सिर्फ अभद्र भाषा का इस्तेमाल अश्लीलता नहीं; समझाया कानूनी अंतर
Fri, 17 Jul 2026 09:51 PM IST
अमन तिवारी
आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली
Published by: अमन तिवारी
Updated Fri, 17 Jul 2026 09:51 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपसी विवाद में गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना आईपीसी के तहत अश्लीलता के दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने एक बुजुर्ग की सजा कम करते हुए अश्लीलता और आपराधिक धमकी के आरोपों को हटा दिया।
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी विवाद के दौरान गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 294(बी) के तहत अश्लीलता का अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि कोई शब्द तभी अश्लील माना जाएगा जब वह कामुक हो, वासना को बढ़ावा देता हो और लोगों के दिमाग को भ्रष्ट करने की क्षमता रखता हो।
कोर्ट ने 'अश्लीलता' और 'अभद्रता' के बीच का अंतर स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि कानूनी रूप से अश्लीलता और अभद्रता या गाली-गलौज एक समान नहीं हैं। गाली-गलौज या अभद्र शब्द भले ही सुनने में खराब लगें, लेकिन उन्हें सीधे तौर पर अश्लीलता नहीं कहा जा सकता। ऐसे शब्द घृणा या झटका तो पैदा कर सकते हैं, लेकिन कानून की नजर में वे अश्लील नहीं हो जाते।
तमिलनाडु के भूमि विवाद का मामला
यह फैसला तमिलनाडु के एक भूमि विवाद से जुड़े 2017 के मामले में आया है। इस मामले में एक 70 वर्षीय बुजुर्ग को मारपीट और गाली-गलौज के आरोप में दोषी ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने कहा कि बुजुर्ग ने विवाद के दौरान अभद्र शब्दों का इस्तेमाल किया था, लेकिन वे शब्द धारा 294(बी) के दायरे में नहीं आते। इसके अलावा, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इन शब्दों से सार्वजनिक स्थान पर मौजूद अन्य लोगों को कोई परेशानी हुई हो, जो कि इस धारा के तहत एक जरूरी शर्त है। इसलिए कोर्ट ने अश्लीलता की सजा को रद्द कर दिया।
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अपराधिक धमकी का आरोप भी हटा
सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग को आईपीसी की धारा 506(ii) (अपराधिक धमकी) के तहत मिली सजा को भी रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी विवाद के दौरान केवल धमकी भरे शब्द कहना ही अपराध नहीं बन जाता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि उन शब्दों का उद्देश्य शिकायतकर्ता के मन में डर पैदा करना था या उसे कोई काम करने या न करने के लिए मजबूर करना था।
ये भी पढ़ें: Supreme Court: टिकट न मिलने पर भी देना होगा रेल हादसे का मुआवजा, अदालत ने बदला HC का फैसला; दिए ये आदेश
गंभीर चोट पहुंचाने की सजा बरकरार
हालांकि, कोर्ट ने बुजुर्ग को आईपीसी की धारा 326 (खतरनाक हथियार से गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत दोषी माना। इस मामले में शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूट गई थी, जो कि एक हंसिया (बिलहुक) से किए गए हमले के कारण हुआ था। मेडिकल रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि की थी।
बुजुर्ग की उम्र, स्वास्थ्य और भूमि विवाद की पृष्ठभूमि को देखते हुए कोर्ट ने उनकी एक साल की जेल की सजा को बदल दिया। अब उन्हें केवल कोर्ट की कार्यवाही समाप्त होने (राइजिंग ऑफ द कोर्ट) तक ही हिरासत में रहना होगा। इसके साथ ही उन्हें दो महीने के भीतर 50,000 रुपये का जुर्माना भी देना होगा।
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कोर्ट ने 'अश्लीलता' और 'अभद्रता' के बीच का अंतर स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि कानूनी रूप से अश्लीलता और अभद्रता या गाली-गलौज एक समान नहीं हैं। गाली-गलौज या अभद्र शब्द भले ही सुनने में खराब लगें, लेकिन उन्हें सीधे तौर पर अश्लीलता नहीं कहा जा सकता। ऐसे शब्द घृणा या झटका तो पैदा कर सकते हैं, लेकिन कानून की नजर में वे अश्लील नहीं हो जाते।
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तमिलनाडु के भूमि विवाद का मामला
यह फैसला तमिलनाडु के एक भूमि विवाद से जुड़े 2017 के मामले में आया है। इस मामले में एक 70 वर्षीय बुजुर्ग को मारपीट और गाली-गलौज के आरोप में दोषी ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने कहा कि बुजुर्ग ने विवाद के दौरान अभद्र शब्दों का इस्तेमाल किया था, लेकिन वे शब्द धारा 294(बी) के दायरे में नहीं आते। इसके अलावा, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इन शब्दों से सार्वजनिक स्थान पर मौजूद अन्य लोगों को कोई परेशानी हुई हो, जो कि इस धारा के तहत एक जरूरी शर्त है। इसलिए कोर्ट ने अश्लीलता की सजा को रद्द कर दिया।
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अपराधिक धमकी का आरोप भी हटा
सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग को आईपीसी की धारा 506(ii) (अपराधिक धमकी) के तहत मिली सजा को भी रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी विवाद के दौरान केवल धमकी भरे शब्द कहना ही अपराध नहीं बन जाता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि उन शब्दों का उद्देश्य शिकायतकर्ता के मन में डर पैदा करना था या उसे कोई काम करने या न करने के लिए मजबूर करना था।
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गंभीर चोट पहुंचाने की सजा बरकरार
हालांकि, कोर्ट ने बुजुर्ग को आईपीसी की धारा 326 (खतरनाक हथियार से गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत दोषी माना। इस मामले में शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूट गई थी, जो कि एक हंसिया (बिलहुक) से किए गए हमले के कारण हुआ था। मेडिकल रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि की थी।
बुजुर्ग की उम्र, स्वास्थ्य और भूमि विवाद की पृष्ठभूमि को देखते हुए कोर्ट ने उनकी एक साल की जेल की सजा को बदल दिया। अब उन्हें केवल कोर्ट की कार्यवाही समाप्त होने (राइजिंग ऑफ द कोर्ट) तक ही हिरासत में रहना होगा। इसके साथ ही उन्हें दो महीने के भीतर 50,000 रुपये का जुर्माना भी देना होगा।
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