इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुराने कानून से भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को अवैध घोषित किया
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1 जनवरी 2014 के बाद पुराने कानून के तहत शुरू की गई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को अवैध घोषित किया है। कोर्ट ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) को नए कानून के तहत वर्तमान बाजार दर पर मुआवजा देने और अधिग्रहित भूमि पर कब्जा नहीं लेने का निर्देश दिया है।

सौजन्य से:- Jagran
2014 के बाद पुराने कानून से भूमि अधिग्रहण अवैध, मौजूदा दर पर मुआवजा दे एलडीए : इलाहाबाद हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि 1 जनवरी 2014 के बाद पुराने कानून के तहत शुरू की गई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया अवैध है। कोर्ट ने लखनऊ विकास प्राध ...और पढ़ें
HighLights
- 2014 के बाद पुराने कानून से भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया अवैध घोषित।
- एलडीए को नए कानून के तहत वर्तमान बाजार दर पर मुआवजा दें।
- मुआवजा भुगतान के बिना अधिग्रहित भूमि पर कब्जा नहीं होगा।
विधि संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि एक जनवरी 2014 को पुराने भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1894 के निरस्त होने के बाद उसी कानून के तहत शुरू की गई अधिग्रहण प्रक्रिया प्रारंभ से ही अवैध मानी जाएगी।
प्रक्रिया को शून्य घोषित करते हुए अदालत ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) को निर्देश दिया कि याची को वर्ष 2014 से पहले की दरों पर नहीं, बल्कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन व पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर व पारदर्शिता अधिकार अधिनियम-2013 के तहत वर्तमान बाजार दरों के अनुसार मुआवजा निर्धारित कर तीन माह के भीतर भुगतान किया जाए।
लोहिया डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर दिया आदेश
न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने यह आदेश लोहिया डेवलपर्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर दिया। याचिका में कहा गया था कि सरोजनीनगर तहसील के अहमामऊ गांव की 0.5020 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण के लिए धारा-4 की अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख अंकित थी, लेकिन उसका राजपत्र में प्रकाशन चार जनवरी 2014 को हुआ।
इसके बाद की सभी वैधानिक प्रक्रियाएं भी नए कानून के लागू होने के बाद पूरी की गईं। अदालत ने कहा कि केवल अधिसूचना पर लिखी तारीख के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू हो गई थी। कानून के अनुसार अधिग्रहण की कार्रवाई तभी प्रभावी मानी जाएगी, जब धारा-4 की अधिसूचना का विधिवत राजपत्र, समाचार पत्रों और स्थानीय स्तर पर प्रकाशन हो।
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अदालत ने यह भी माना
चूंकि यह सभी औपचारिकताएं एक जनवरी 2014 के बाद पूरी हुईं, इसलिए निरस्त हो चुके 1894 के कानून के तहत की गई पूरी कार्रवाई कानूनी रूप से टिक नहीं सकती। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि अधिग्रहण 45 मीटर चौड़ी सार्वजनिक सड़क के निर्माण जैसे महत्वपूर्ण जनहित के उद्देश्य से किया गया है।
ऐसे में पूरे अधिग्रहण को रद करने के बजाय अदालत ने एलडीए को नए कानून के तहत वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर मुआवजा तय करने का निर्देश दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि संशोधित मुआवजे का भुगतान किए बिना संबंधित भूमि पर कब्जा नहीं लिया जा सकेगा। अदालत ने एलडीए को छह माह के भीतर पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी करने के भी निर्देश दिए।
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