उत्तर प्रदेश में वक्फ बोर्ड का पूरा ढांचा बदलेगा, दो गैर-मुस्लिम सदस्य भी होंगे शामिल
संशोधित वक्फ कानून लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश में वक्फ बोर्ड का ढांचा बदल जाएगा। नए नियमों के तहत दो गैर-मुस्लिम सदस्य और मुस्लिम महिलाओं को अनिवार्य रूप से सदस्य बनाया जाएगा। पसमांदा मुसलमानों को भी बोर्ड में प्रतिनिधित्व मिलेगा।

सौजन्य से:- Navbharat Times
मध्य प्रदेश की तरह ही बनाई जाएगी व्यवस्था
पुराने वक्फ कानून में संशोधन कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में यह कानून लागू होने के बाद राज्य के वक्फ बोर्ड का पूरा ढांचा बदल जाएगा। नए नियमों के तहत यूपी के सुन्नी और शिया वक्फ बोर्ड में पहली बार दो गैर-मुस्लिम सदस्यों और मुस्लिम महिलाओं को अनिवार्य रूप से सदस्य बनाया जाएगा। इसके साथ-साथ पसमांदा मुसलमानों को भी बोर्ड में प्रतिनिधित्व मिलेगा। उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने कहा है कि आने वाले समय में यूपी ही नहीं, पूरे देश में कानून और बायलॉज के मुताबिक संशोधित वक्फ कानून लागू होगा। बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष अंसारी ने यह भी संकेत दिए हैं कि यूपी में मध्य प्रदेश की तरह ही व्यवस्था लागू की जाएगी।वक्फ बोर्ड में कुल 11 सदस्य
मध्य प्रदेश में वक्फ कनून के प्रावधानों के मुताबिक दो हिंदू सदस्यों को भी बोर्ड में शामिल किया गया है। बोर्ड में कुल 11 सदस्य बनाने का प्रावधान है, जिसमें से कुछ पदेन होते हैं। इसमें स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष और आयुक्त पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण भी शामिल हैं। राज्य में इन दिनों बार काउंसिल के चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। फिलहाल इसका कोई अध्यक्ष नहीं है। इसलिए बार काउंसिल के अध्यक्ष के अलावा शेष सदस्यों की नियुक्तियां कर दी गई हैं। इसकी अधिसूचना पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने जारी भी कर दी है।कई वर्गों को बोर्ड में मिलेगा प्रतिनिधित्व
उत्तर प्रदेश में भी नए वक्फ कानून के मुताबिक ही बोर्ड का गठन किया जाएगा। उत्तर प्रदेश में दो वक्फ बोर्डों के पुनर्गठन से भारी बदलाव आने वाला है। इससे बोर्ड का स्वरूप बदल जाएगा। नए वक्फ संशोधित अधिनियम ( Waqf Amendment Act) के प्रावधानों के अनुसार गठित होने वाले बोर्ड में सभी वर्गों- मुस्लिम धर्मगुरुओं, कानून विशेषज्ञों, महिलाओं और पिछड़े पसमांदा समाज के लोगों को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। इसके साथ यूपी वक्फ बोर्ड के ढांचे और कामकाज में व्यापक बदलाव आएंगे। नए बोर्ड में पसमांदा मुसलमानों और मुस्लिम महिलाओं के साथ-साथ दो गैर-मुस्लिम (हिंदू) सदस्यों को भी शामिल किया जाएगा।उत्तर प्रदेश के सिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों में क्या आएंगे बदलाव?
गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति
नए वक्फ (संशोधन) अधिनियम के तहत उत्तर प्रदेश के 11 सदस्यीय वक्फ बोर्ड में अनिवार्य रूप से दो गैर मुस्लिम (हिंदू) सदस्य शामिल किए जाएंगे। वक्फ बोर्डों में पारदर्शिता और इसके बेहतर प्रबंधन के लिए यूपी सरकार पैनल में दो गैर मुस्लिम सदस्यों को नामित करेगी। उत्तर प्रदेश सुन्नी और शिया वक्फ बोर्डों में पहली बार दो गैर मुस्लिम सदस्यों को शामिल किया जाएगा।महिलाओं और पसमांदा मुसलमानों की भागीदारी
वक्फ बोर्ड में मुस्लिम महिलाओं और पिछड़े पसमांदा समाज के लोगों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। बोर्ड में कुल 11 सदस्य होंगे, जिनमें मुस्लिम महिलाओं और पिछड़े पसमांदा मुसलमानों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा।वक्फ बोर्ड में पारदर्शिता और डिजिटलीकरण
वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता लाने के लिए उनका दस्तावेजीकरण अनिवार्य किया जा रहा है। यूपी की सभी संपत्तियों को 'उम्मीद' पोर्टल पर दर्ज किया जा रहा है ताकि अवैध कब्जों को रोका जा सके और संपत्ति का सही उपयोग हो सके। बोर्ड की संपत्तियों का सटीक ब्योरा तैयार होगा। वक्फ की संपत्तियों का पोर्टल पर ऑनलाइन पंजीकरण और दस्तावेजीकरण अनिवार्य किया गया है।संपत्ति के सत्यापन में सख्ती
पुराने वक्फ कानून में 'वक्फ बाय यूजर' (उपयोग के आधार पर वक्फ) का नियम था, जिसको खत्म कर दिया गया है। अब किसी भी संपत्ति को वक्फ मानने के लिए उसका औपचारिक कानूनी दस्तावेज (वक्फनामा) होना अनिवार्य होगा। पुराने कानून में वक्फ बाय यूजर का प्रावधान था। यानी किसी संपत्ति पर यदि वक्फ का कब्जा लंबे समय से है तो वह वक्फ का माना जाएगा, चाहे बोर्ड के पास उस संपत्ति के कागजात हों या न हों। अब ऐसा नहीं हो सकेगा।हाईकोर्ट में अपील का अधिकार
वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसलों को अंतिम मानने की बाध्यता खत्म कर दी गई है। ट्रिब्यूनल के फैसलों के खिलाफ अब सीधे हाईकोर्ट में अपील की जा सकेगी। संपत्ति को वक्फ की घोषित करने से पहले सख्त राजस्व जांच की व्यवस्था की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग रोकना और बोर्ड की कार्यप्रणाली में जवाबदेही बढ़ाना है।अप्रैल 2025 में पारित हुआ था बिल
सन 2025 में संसद के बजट सत्र में वक्फ बोर्ड (संशोधन) अधिनियम- 2025 पेश किया गया था। उसका देश के कई हिस्सों में विरोध हुआ था। यह बिल अप्रैल 2025 में दोनों सदनों में पास किया गया था। लोकसभा में 288 और राज्यसभा में 232 सांसदों ने इस बिल पर मुहर लगाई थी। इसके बाद 5 अप्रैल 2025 को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने भी इस कानून को मंजूरी दे दी थी। वक्फ कानून का विरोध करने वाला पक्ष सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया था। पांच याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2025 में कुछ प्रावधानों पर रोक लगा दी।सुप्रीम कोर्ट के फैसले से किए गए बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने ने फैसले में कहा था कि वक्फ बोर्ड में 3 से ज्यादा गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं हो सकते हैं। उसने वक्फ बाय यूजर को लेकर कोई फैसला नहीं दिया था। वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 में पहले प्रावधान था कि पांच साल से ज्यादा समय तक इस्लाम धर्म का पालन करने वाले ही वक्फ बोर्ड के सदस्य बन सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि, जब तक राज्य सरकारें इस संदर्भ में कोई उचित नियम नहीं बना लेतीं, तब तक वक्फ बोर्ड का सदस्य बनने के लिए यह शर्त लागू नहीं होगी।गैर मुस्लिम सदस्यों का संख्या तय की
वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 में पहले प्रावधान किया गया था कि वक्फ बोर्ड के 11 सदस्यों में गैर मुस्लिम सदस्य भी शामिल होंगे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वक्फ बोर्ड में 3 से ज्यादा गैर मुस्लिम सदस्य नहीं हो सकते हैं। कोर्ट ने यह फैसला भी दिया था कि केंद्रीय वक्फ परिषद में भी 4 से अधिक गैर मुस्लिम सदस्य शामिल नहीं होंगे। कोर्ट ने कहा था कि यदि मुमकिन हो तो किसी मुस्लिम सदस्य को ही बोर्ड का सीईओ बनाया जाना चाहिए।कलेक्टर के हस्तक्षेप पर रोक
वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 में पहले रखे गए प्रावधान में व्यवस्था थी कि वक्फ बोर्ड जिस भी संपत्ति पर अतिक्रमण करेगा, वह संपत्ति सरकारी है या नहीं? यह तय करने का अधिकार जिला कलेक्टर के पास होगा। इस पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिला कलेक्टर को नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों पर फैसला लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती है।उत्तर प्रदेश के सुन्नी वक्फ बोर्ड का कार्यकाल पूरा हो चुका है और नए संशोधित अधिनियम के तहत ही नए वक्फ बोर्ड का गठन किया जाना तय है। विपक्षी दल इसे मुस्लिम अधिकारों में हस्तक्षेप बताकर इसका विरोध कर रहे हैं। इस बदलाव का ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने भी विरोध किया है।
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