सुप्रीम कोर्ट ने 19 साल पुराने हादसे में मुआवजा बढ़ाकर पहुंचाया 25 लाख
सुप्रीम कोर्ट ने एक 19 साल पुराने हादसे में एक पैरालाइज्ड व्यक्ति को मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 25 लाख कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित को बिना आर्थिक सहारे के नहीं छोड़ा जा सकता है।

सौजन्य से:- ETV Bharat
सुप्रीम कोर्ट: 19 साल पुराने हादसे में सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर किया 25 लाख, क्या है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने 'पूर्ण न्याय' के लिए अनुच्छेद 142 का किया इस्तेमाल, नगर निगम से कहा- कंक्रीट के जंगलों में पेड़ों की देखभाल आपका फर्ज.
By Sumit Saxena
Published : June 11, 2026 at 7:40 PM IST
नई दिल्लीः बेंगलुरु में करीब 19 साल पहले हुए एक अजीब हादसे में पेड़ की एक गिरती हुई डाल ने एक व्यक्ति को अपाहिज (पैरालाइज्ड) कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उसके मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 25 लाख कर दिया. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि जीवन को पूरी तरह बदल देने वाली चोटों से जूझ रहे किसी व्यक्ति को "बिना किसी आर्थिक सहारे के अधर में" नहीं छोड़ा जा सकता.
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह की अनदेखी न्याय की अंतरात्मा को स्वीकार्य नहीं है. न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन के सिंह की पीठ ने इस महत्वपूर्ण फैसले में यह माना कि ऐसे मामलों में, विशेष रूप से नागरिक निकाय (नगर निगम) के खिलाफ मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत मुआवजे का दावा नहीं किया जा सकता.
यह कानूनी प्रावधान सड़क दुर्घटना के पीड़ितों या उनके कानूनी प्रतिनिधियों को दोषी ड्राइवर या वाहन मालिक की गलती या लापरवाही साबित करके मुआवजा मांगने की अनुमति देता है. पीठ ने स्पष्ट करते हुए कहा, "इस हादसे में मोटर वाहन की खुद कोई सक्रिय भूमिका नहीं है. यह दुर्घटना के सीधे या मुख्य कारणों का हिस्सा नहीं है. इसी वजह से, विशेष रूप से धारा 166 के तहत दावा करना उचित नहीं माना जा सकता."
पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि इसके बावजूद, एक सवाल हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है. न्यायमूर्ति करोल ने रेखांकित किया, "क्या पीड़ित व्यक्ति (प्रतिवादी) को मुआवजे के लिए मुकदमेबाजी के एक और दौर से गुजरने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए? क्या यह निष्कर्ष न्याय के हित में है? यदि हमें केवल कानून के तकनीकी प्रश्न पर ही निर्णय देना है, तो पीड़ित के हाथों तक वास्तविक पैसा पहुंचने में और भी देरी हो जाएगी."
न्याूर्ति करोल ने कहा: "हमें ऐसा लगता है कि यह सही नहीं होगा. एक व्यक्ति जिसने जीवन को पूरी तरह बदल देने वाली ऐसी गंभीर चोटें झेली हैं, उसे बिना किसी आर्थिक सहारे के अधर में छोड़ देना, न्याय की अंतरात्मा को बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं लगता."
पीठ ने कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत होने के नाते यह उसके अधिकार क्षेत्र में आता है कि वह यह सुनिश्चित करे कि लागू होने वाला कानून, विशेष रूप से इस तरह के मामलों में, मानवीय हो और संविधान के कल्याणकारी सिद्धांतों के अनुकूल हो. पीठ ने यह भी देखा कि हाईकोर्ट द्वारा अपनाए गए थोड़े तकनीकी दृष्टिकोण के कारण, उसके द्वारा तय की गई मुआवजे की राशि कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार अपने आप में नाकाफी है.
पीठ ने साल 2007 से पूरी तरह से लकवे से जूझ रहे इस व्यक्ति के लिए मुआवजे की राशि को 17.10 लाख रुपये से बढ़ाकर 25 लाख (ब्याज सहित) करने के लिए अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल किया.
न्यायमूर्ति करोल ने कहा, "इस मामले के परिप्रेक्ष्य में, हम कुल मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 25 लाख रुपये करते हैं, साथ ही इस पर हाईकोर्ट द्वारा तय किया गया ब्याज भी दिया जाएगा, जिसकी गणना दावा याचिका दायर करने की तारीख से की जाएगी. जिम्मेदारी का बंटवारा पहले की तरह ही रहेगा. हम यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दे रहे हैं."
संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी भी लंबित मामले में "पूर्ण न्याय" करने के लिए कोई भी डिक्री या आदेश पारित करने की अनोखी और विशेष शक्ति देता है. पीठ ने आदेश दिया, "यह राशि इस फैसले की घोषणा के चार सप्ताह के भीतर पीड़ित (प्रतिवादी) को सौंप दी जानी चाहिए. जिन अन्य पक्षों को यह राशि देने का निर्देश दिया गया है, यानी बीमा कंपनी और कर्नाटक सरकार के बागवानी विभाग, वे भी चार सप्ताह के भीतर इसका भुगतान सुनिश्चित करेंगे."
जून 2007 में, के.के. उमेश कुमार बेंगलुरु में एक ऑटो-रिक्शा से यात्रा कर रहे थे. भारी बारिश के कारण, वाहन को चिन्नास्वामी स्टेडियम के पास एक पुराने पेड़ के नीचे रोका गया था. इसी दौरान पेड़ की एक बड़ी डाल टूटकर वाहन पर गिर गई, जिससे कुमार की रीढ़ की हड्डी में ऐसी गंभीर चोटें आईं जिन्होंने उनका जीवन पूरी तरह बदल दिया. इस हादसे के कारण वे पूरी तरह लकवे का शिकार हो गए और उनका अपने ब्लैडर (मूत्रशय) पर भी नियंत्रण नहीं रहा.
सर्वोच्च अदालत ने इस बात पर विचार किया कि क्या इस हादसे में कुमार को आई चोटों के लिए ब्रुहत बेंगलुरु महानगर पालिका (BBMP) के कमिश्नर को मोटर वाहन अधिनियम (MVA) के तहत जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. यह हादसा तब हुआ था जब बारिश थमने के इंतजार में पेड़ के नीचे रुके वाहन पर सड़क किनारे का एक पेड़ गिर गया था.
शुरुआत में, मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (Tribunal) ने 50 लाख के मुआवजे के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह घटना एक "प्राकृतिक आपदा" या "दैवीय घटना" थी. इसके बाद कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी देरी के आधार पर इस दावे को खारिज कर दिया था. बाद में, सर्वोच्च अदालत ने इस मामले को वापस हाई कोर्ट भेज दिया. मुकदमेबाजी के इस दूसरे दौर में, हाई कोर्ट ने 17.10 लाख रुपये मुआवजा देने का फैसला सुनाया.
हाई कोर्ट ने जिम्मेदारी का बंटवारा करते हुए बीबीएमपी (BBMP), बागवानी विभाग और ऑटो-रिक्शा की बीमा कंपनी को क्रमशः 25 प्रतिशत, 25 प्रतिशत और 50 प्रतिशत मुआवजा देने को कहा था.
बीबीएमपी ने इस जिम्मेदारी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. नागरिक निकाय (नगर निगम) ने दावा किया कि एक प्राकृतिक घटना के लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इस पर न्यायमूर्ति करोल ने कहा- "एक पेड़ कई सालों से सड़क के किनारे खड़ा है. चूंकि यह शहर का हिस्सा है, इसलिए नगर निगम का यह कर्तव्य बनता है कि वह उन पेड़ों की देखभाल सुनिश्चित करे. यह देखभाल न केवल पेड़ों को हरा-भरा और स्वस्थ रखने के नजरिए से जरूरी है, बल्कि इसलिए भी आवश्यक है ताकि समय-समय पर उनका रखरखाव किया जा सके ताकि ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं न हों."
पीठ ने आगे कहा, "यह उम्मीद करना अवास्तविक होगा कि निगम के अधिकारी हर एक पेड़ या झाड़ी पर लगातार कड़ी नजर रख सकें. इसी तरह, भले ही यह पूरी तरह से माना जा सकता है कि किसी पुराने पेड़ की पुरानी डाल कभी भी गिर सकती है, लेकिन एक समझदारी भरा फैसला यह नहीं हो सकता कि सभी शाखाओं को आरी से काट दिया जाए."
जस्टिस करोल ने कहा कि आज के समय में जिन्हें हम शहर कहते हैं, उन लगातार बढ़ते कंक्रीट के जंगलों में पेड़ों के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता. उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए हमारे दिल्ली शहर में ही, आप जिस इलाके में यात्रा करते हैं उसके आधार पर हरित क्षेत्र (ग्रीन कवर) में भारी अंतर देखने को मिलता है.
उन्होंने कहा, "ऐसी स्थिति में, केंद्र और राज्य स्तर के अधिकारियों का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वे शहरों में जितना संभव हो सके हरित क्षेत्र को बढ़ाएं. इसके लिए विशेषज्ञों से उचित सलाह ली जानी चाहिए ताकि मिट्टी में रोपे गए हर पेड़ या पौधे का लंबे समय तक जीवित रहना सुनिश्चित हो सके." पीठ ने कहा कि किसी शहर में भारी बारिश होना एक ऐसी घटना है जिसका अनुमान पहले से लगाया जा सकता है, और अधिकारियों को सड़क किनारे लगे पेड़ों को स्वस्थ रखने के लिए पहले से ही बचाव के कदम उठाने चाहिए.
इसे भी पढ़ेंः
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
वियतनाम में राष्ट्रीय सभा ने मसौदा कानून पर चर्चा की

कैन थो शहर ने पेट्रोलियम संबंधी कानून (संशोधित) के मसौदे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी दी

दीवाली अवकाश कानून रद: कोर्ट ने बताया असंवैधानिक धर्म और राज्य को अलग रखें

अब और नहीं 'पहले निर्माण, फिर माफ़ी' का खेल: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सैन्य और राष्ट्रीय रक्षा संबंधी कानूनों के लिए संशोधन का महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर की शर्त खारिज की, केंद्र ने हलफनामा दाखिला

जन्म से नागरिकता को सीमित करने की ट्रंप की नई कोशिश, U.S. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सवाल

सीमा शुल्क कानून में संशोधन के लिए प्रतिनिधि गुयेन थी येन न्ही ने सुझाव दिए
ताज़ा ख़बरें
- सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का भारी विरोध: एससी/एसटी कोटा के लिए "क्रीमी लेयर" की मांग को क्यों रोका जा रहा है?
- राष्ट्रीय विधानसभा ने सैन्य और तेल-गैस कानूनों पर चर्चा की
- सुप्रीम कोर्ट ने व्यापारी निर्यातकों के लिए 0.1% जीएसटी रियायती दर के अनुपालन को सख्त रखा
- विशेष शहरी क्षेत्रों का निर्माण टिकाऊ और सभ्य समाज की नींव पर होना आवश्यक है: नेशनल असेंबली
- सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश: नदी पुनर्स्थापन के लिए 2 निकायों का गठन
- केशवानंद भारती मामले का महत्व
- भर्ती प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता
- केंद्र का आरक्षण पर बड़ा बयान, एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आर्थिक नहीं सामाजिक पिछड़ेपन मायने रखता है

