पुराने रिश्ते में अब भी निवेश का कोई मतलब नहीं, ने कहा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी का लंबे समय तक अलग रहना और विवाह को बचाने के लिए कोई वास्तविक प्रयास न करना मानसिक क्रूरता माना जा सकता है, जो तलाक का वैध आधार है। अदालत ने पति-पत्नी के रिश्ते को एकलौता वैवाहिक संबंध बताते हुए इसके तार की कमजोरी और अलगाव पर बल दिया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
Supreme Court On Divorce Case: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी का लंबे समय तक अलग रहना और विवाह को बचाने के लिए कोई वास्तविक प्रयास न करना मानसिक क्रूरता माना जा सकता है, जो तलाक का वैध आधार है।
नई दिल्ली: तलाक से जुड़े एक अहम फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी का लंबे समय तक अलग रहना मानसिक क्रूरता माना जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत यह तलाक का एक वैध आधार है। अदालत ने 15 वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे एक डॉक्टर दंपति के मामले में पति के पक्ष में दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखा।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि जब कोई विवाह व्यवहारिक रूप से समाप्त हो चुका हो, तो उसे केवल कानूनी औपचारिकता के तौर पर बनाए रखना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि पति और पत्नी दोनों ने अपने पेशे और जीवन के लिए अलग-अलग रास्ते चुन लिए थे और वर्षों तक अलग-अलग स्थानों पर रहते हुए स्वतंत्र जीवन व्यतीत किया।
क्या है मामला?
मामले के अनुसार, दंपति की शादी 5 दिसंबर 2007 को गुजरात के नडियाद में हुई थी। शादी के बाद दोनों केवल दो-तीन महीने ही साथ रह सके और उनकी कोई संतान भी नहीं हुई। पति राजस्थान में डॉक्टर के रूप में कार्यरत था, जबकि पत्नी गुजरात के खेड़ा जिले के नडियाद में स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में अपनी सरकारी सेवा जारी रखे हुए थी। इसके बाद दोनों के बीच दूरी बढ़ती गई और वे अलग-अलग रहने लगे।
पति ने वर्ष 2009 में राजस्थान के भरतपुर स्थित फैमिली कोर्ट में क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। हालांकि फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि पति क्रूरता के आरोप साबित नहीं कर पाया। बाद में राजस्थान हाई कोर्ट ने जनवरी 2025 में फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटते हुए तलाक मंजूर कर लिया। हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के लंबे समय से अलग रहने और वैवाहिक संबंधों में आई गंभीर दूरी को महत्वपूर्ण आधार माना।
हाई कोर्ट के फैसले को पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि साथ रहने के शुरुआती दिनों में पत्नी कथित रूप से अलग कमरे में सोती थी और कई मौकों पर पति के साथ शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करती थी। अदालत ने कहा कि पत्नी ने इस तथ्य का स्पष्ट खंडन नहीं किया कि वह कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लेती थी, जिसके कारण पति को दूसरे कमरे में सोना पड़ता था।
'बिना ठोस कारण वैवाहिक संबंधों से इनकार भी मानसिक क्रूरता'
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले 'समर घोष बनाम जया घोष' का हवाला देते हुए कहा कि बिना किसी शारीरिक अक्षमता या ठोस कारण के लंबे समय तक वैवाहिक संबंध बनाने से एकतरफा इनकार मानसिक क्रूरता माना जा सकता है। बेंच ने टिप्पणी की कि विवाह केवल कानूनी अनुबंध नहीं बल्कि भावनात्मक सहयोग, विश्वास, जिम्मेदारी और परस्पर देखभाल का रिश्ता है, जिसमें दोनों पक्षों के अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।
'सिर्फ दावे नहीं, प्रयास भी दिखने चाहिए'
अदालत ने यह भी कहा कि पत्नी लगातार यह दावा करती रही कि वह विवाह को बनाए रखना चाहती है, लेकिन उसके व्यवहार और कार्यों से ऐसा प्रतीत नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट की ओर से मई 2025 में कराई गई मध्यस्थता भी सफल नहीं हो सकी। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि पत्नी ने वास्तव में भरतपुर जाकर पति के साथ रहने का गंभीर प्रयास किया हो। इस दौरान बेंच ने टिप्पणी की कि 'कोरे शब्दों की तुलना में व्यक्ति के कार्य अधिक प्रभावी होते हैं।'
'टूट चुके रिश्ते को जबरन नहीं बचाया जा सकता'
संविधान के अनुच्छेद 142(1) के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विवाह को पूरी तरह समाप्त घोषित कर दिया। अदालत ने कहा कि एक ऐसे रिश्ते को जबरन जीवित रखना, जो व्यवहारिक रूप से खत्म हो चुका है, दोनों पक्षों के लिए मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक पीड़ा को बढ़ाता है। चूंकि दोनों पक्ष आर्थिक रूप से स्वतंत्र डॉक्टर हैं और उनकी कोई संतान भी नहीं है, इसलिए तलाक से किसी तीसरे पक्ष के हित प्रभावित नहीं होंगे। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए तलाक के फैसले को बरकरार रखा।
लेखक के बारे मेंअशोक उपाध्यायअशोक उपाध्याय, नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। पत्रकारिता में 10 साल का अनुभव। साल 2014 में नवभारत टाइम्स हिंदी अखबार से पत्रकारिता के सफर की शुरुआत की थी। पॉलिटिक्स, खेल, क्राइम बीट पर रिपोर्टिंग में महारत। अमर उजाला देहरादून में भी सेंट्रल डेस्क पर काम किया है। साथ ही कई चुनावों में ग्राउंड रिपोर्टिंग की है। पिछले पांच साल से NBT डिजिटल में न्यूज डेस्क पर काम कर रहे हैं। गूगल ट्रेंड्स को पकड़ने और एआई टूल्स के इस्तेमाल की अच्छी समझ है। JIMMC नोएडा से पत्रकारिता की पढ़ाई की है।... और पढ़ें
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