सुप्रीम कोर्ट ने दरभंगा के 1000 साल पुराने तालाबों को बचाने के लिए दखल दिया
सुप्रीम कोर्ट ने दरभंगा के ऐतिहासिक तालाबों पर अवैध कब्जे के मामले में सुनवाई का फैसला किया है। नागरिक समूह ने यह दीवानगी करनी की है कि, 1000 साल पुराने तालाबों के संरक्षण की मांग की है, जिन पर सरकार के सौंदर्यीकरण के नाम पर तालाबों को नुकसान पहुँचाने का आरोप है।

सौजन्य से:- Jagran
दरभंगा के 1000 साल पुराने तालाबों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकारी याचिका, अवैध कब्जे पर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने दरभंगा के ऐतिहासिक तालाबों दिग्घी, गंगा सागर और हराही पर अवैध कब्जे के मामले में सुनवाई का फैसला किया है। ...और पढ़ें
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट दरभंगा के तालाबों पर कब्जे की सुनवाई करेगा।
- नागरिक समूह ने 1000 साल पुराने तालाबों के संरक्षण की मांग की।
- सौंदर्यीकरण के नाम पर तालाबों को नुकसान पहुँचाने का आरोप।
डिजिटल डेस्क, दरभंगा। सुप्रीम कोर्ट ने दरभंगा शहर में स्थित तीन प्रसिद्ध तालाबों पर कब्जे के मामले में दखल देने का फैसला किया है। टीओआई के रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने यह फैसला एक नागरिक समूह द्वारा दायर की गई याचिका पर लिया है।
बता दें कि मिथिलांचल क्षेत्र में स्थित दरभंगा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। यहां की परंपराओं में तालाबों की बड़ी भूमिका रही है।यहां के लोग जन्म से लेकर मृत्यु जैसे हर महत्वपूर्ण अवसर तालाबों के किनारे मनाते आए हैं। लेकिन आजकल दरभंगा के अब तालाब धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।
जिसके बाद इस समस्या को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट खुद इस मामले में सुनवाई करेगा। आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट ऐसे छोटे-मोटे और स्थानीय मुद्दों में दखल नहीं देता, लेकिन इस बार उसने याचिका स्वीकार कर ली है।
सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि कब्जा करने की कोशिश
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि दरभंगा के दिग्घी, गंगा सागर और हराही तालाबों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। ये तीनों तालाब करीब 1000 साल पुराने हैं, जिन्हें यहां के राजाओं ने बनवाया था।
बिहार शहरी विकास निगम इन तालाबों के कुछ हिस्सों को भरकर सुंदर बनाने के नाम पर कियोस्क, रेस्तरां और फुटपाथ बना रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि कब्जा करने की कोशिश है।
तालाबों पर हुए सारे कब्जे हटाए जाएं
एकलव्य प्रसाद जैसे तालाब संरक्षण कार्यकर्ता कहते हैं कि सरकार के इस काम से तालाबों को ऐसा नुकसान हो रहा है जिसकी भरपाई मुश्किल है। तालाब बचाओ अभियान के लोग कई साल से इस लड़ाई में लगे हैं। उन्होंने याचिका में कहा है कि तालाब भरना कई अदालती आदेशों का उल्लंघन है। वे चाहते हैं कि तालाबों पर हुए सारे कब्जे हटाए जाएं और उन्हें पुराने नक्शों (1868 और 1960) के अनुसार पहले जैसा बना दिया जाए।
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1964 में दरभंगा था तालाबों का शहर
नारायण चौधरी, जो इस अभियान के प्रमुख हैं, बताते हैं कि 1964 में दरभंगा को "तालाबों का शहर" कहा जाता था। तब यहां 350 तालाब थे। अब शहर में 100 से भी कम तालाब बचे हैं। यानी 60 साल में 250 से ज्यादा तालाब गायब हो चुके हैं। तीनों विवादित तालाब 253 बीघा क्षेत्र में फैले थे, लेकिन उनमें से 25 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अब कब्जे में है।
रिटायर्ड प्रोफेसर विद्या नाथ झा कहते हैं कि तालाब के हिस्से भर देने से पानी खुद साफ करने की प्राकृतिक क्षमता खत्म हो जाएगी। इससे कीड़े-मकोड़े, जलीय जीव और जैव विविधता भी प्रभावित होगी।
मिथिलांचल में बाढ़ और पानी की व्यवस्था के लिए तालाब बहुत जरूरी थे। ये बारिश का पानी इकट्ठा करते, भूजल बढ़ाते, बाढ़ कम करते और सूखे में पानी देते थे।
60 प्रतिशत से ज्यादा तालाब गायब
प्रोफेसर सैयद शमीम अहमद बताते हैं कि 1980 में उन्होंने 108 तालाबों की स्टडी की थी। वहां 88 तरह के पक्षी आते थे। अब 60 प्रतिशत से ज्यादा तालाब गायब हो चुके हैं। इससे भूजल स्तर गिर रहा है और पानी की समस्या बढ़ रही है।
2025 की रिपोर्ट के अनुसार, पूरे बिहार में तालाबों की संख्या 2019 से 19% कम हो गई है। कुल 36,856 तालाब बचे हैं।
पर्यावरणविद एकलव्य प्रसाद कहते हैं कि तालाब बचाना सिर्फ गड्ढा खोदना नहीं है। हमें पूरे इकोसिस्टम, पानी की गुणवत्ता, पक्षी-पशु और लोगों को तालाबों से जोड़ना होगा। सिर्फ कमर्शियल कामों के लिए तालाब भरने से समस्या बढ़ेगी। बाढ़ रोकने और पानी बचाने के लिए समुदाय को भी आगे आना चाहिए।
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