सुप्रीम कोर्ट सैट के फैसले के हिस्से को चुनौती देगा सेबी की, 13 जुलाई को अहम सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट 13 जुलाई को सेबी की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें सैट द्वारा सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन के प्रबंधकों को राहत देने के फैसले को चुनौती दी गई है। सेबी ने सैट के द्वारा दी गई राहत को चुनौती दी है।

सौजन्य से:- Jagran
Sahara-SEBI Case: सुप्रीम कोर्ट में 13 जुलाई को अहम सुनवाई, इन्हें मिली राहत पर सेबी की चुनौती; रिफंड पर क्या है अपडेट?
सुप्रीम कोर्ट 13 जुलाई को सेबी की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड के प्रबंधकों को सैट द्वारा दी गई राहत को च ...और पढ़ें
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट 13 जुलाई को सेबी की याचिका पर सुनवाई करेगा
- सेबी ने सहारा प्रबंधकों को सैट द्वारा मिली राहत को चुनौती दी
- यह मामला ओएफसीडी के अवैध निर्गम और निवेशक धन से जुड़ा है
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट 13 जुलाई को भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) के उस फैसले के एक हिस्से को चुनौती दी गई है, जिसमें सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड (एसआईसीसीएल) के प्रबंधकों और कंपनी सचिव को राहत दी गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। सेबी की याचिका के अलावा, शीर्ष अदालत ने सहारा समूह से जुड़े सभी लंबित मामलों, जिनमें निवेशकों के धन की वापसी का मामला भी शामिल है, को भी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
निदेशकों की अपील खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने 18 जून को को इस मामले पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए सहारा समूह के चार अधिकारियों को नोटिस जारी किया था और इस याचिका को कंपनी से जुड़े लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया था। अदालत ने अधिकारियों को 13 जुलाई तक जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश भी दिया था।
इससे पहले, नौ मार्च को सैट ने एसआईसीसीएल के खिलाफ सेबी की नियामकीय कार्रवाई को बरकरार रखते हुए कंपनी और उसके निदेशकों की अपील खारिज कर दी थी।
क्या है पूरा मामला?
मामला 1998 से 2008 के बीच कथित रूप से वैकल्पिक पूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर (ओएफसीडी) के अवैध निर्गम से जुड़ा है। सैट की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा था कि इस अवधि में एसआईसीसीएल द्वारा जारी ओएफसीडी सार्वजनिक निर्गम (पब्लिक ऑफर) की श्रेणी में आते हैं, इसलिए वे सेबी के नियामकीय अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत हैं।
न्यायाधिकरण के अनुसार, कंपनी ने इन डिबेंचर के माध्यम से लगभग 1.98 करोड़ निवेशकों से करीब 14,106 करोड़ रुपये जुटाए थे। इतने बड़े पैमाने पर इतनी बड़ी संख्या में निवेशकों से धन जुटाने को निजी नियोजन नहीं माना जा सकता, जैसा कि कंपनी का दावा था। हालांकि, सैट ने कंपनी और उसके निदेशकों की अपील खारिज करते हुए चार प्रबंधकों और कंपनी सचिव की अलग अपील स्वीकार कर ली थी।
सेबी ने सैट को उच्चतम न्यायालय में दी चुनौती
न्यायाधिकरण ने कहा था कि कर्मचारी होने के नाते उन्हें कंपनी के कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। सैट ने यह भी कहा था कि कंपनी सचिव ने निदेशकों द्वारा दी गई ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ के आधार पर दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे और इस कारण अंतिम जिम्मेदारी निदेशकों की ही बनती है।
सेबी ने अब सैट के इसी हिस्से को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है। यह मामला सेबी के अक्टूबर, 2018 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें एसआईसीसीएल को ओएफसीडी के जरिये जुटाई गई राशि निवेशकों को लौटाने, अपनी परिसंपत्तियों का ब्योरा देने और कुछ अधिकारियों को प्रतिभूति बाजार से प्रतिबंधित करने का निर्देश दिया गया था।
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