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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रासुका के तहत आकृति चौधरी की नजरबंदी रद्द की, प्रशासन को दंडित किया

हाईकोर्ट ने नोएडा में रासुका के तहत डिटेन की गई 25‑वर्षीय विधि छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की नजरबंदी को ‘कठोर एहतियातन कानून का दुरुपयोग’ घोषित कर रद्द किया और प्रशासन को कड़ी फटकार दी। अदालत ने उन्हें पाँच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसे संबंधित अधिकारियों की वेतन से वसूला जाएगा। फिर भी वह अभी भी कई मामलों में पुलिस द्वारा नामजद है, जिससे उनका पूर्ण आज़ादी प्राप्त नहीं हो पाई है।

10 सितंबर 2026 को 06:04 am बजे
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रासुका के तहत आकृति चौधरी की नजरबंदी रद्द की, प्रशासन को दंडित किया

सौजन्य से:- The Hindu

उत्तर प्रदेश के नोएडा में जिला प्रशासन ने शहर में मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में, 11 अप्रैल, 2026 को दिल्ली विश्वविद्यालय की 25-वर्षीय विधि छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को नजरबंद (डिटेन) करने के लिए कुछ भी बाकी नहीं रखा। लेकिन 2 सितंबर को, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत उनकी नजरबंदी रद्द कर दी और इसे “कठोर एहतियातन नजरबंदी कानून का दुरुपयोग” बताते हुए प्रशासन को जमकर फटकार लगायी। भारत की लोकतांत्रिक आत्मा का दम घोंट रहे चरम कार्यपालिकीय मनमानेपन के काले बादलों के बीच, हाईकोर्ट का हस्तक्षेप एक चमकीली लकीर है। अदालत ने नोएडा प्रशासन के आचरण को “निरंकुश” और एक्टिविस्ट के खिलाफ उसके आरोपों को “गढ़ी हुई कहानी” बताया और उल्लेख किया कि जिला मजिस्ट्रेट ने रासुका के तहत नजरबंदी का आदेश “दिमाग का इस्तेमाल किये बिना” दिया। बिना किसी लाग-लपेट के, हाईकोर्ट ने चेताया कि बेलगाम नौकरशाही उत्तर प्रदेश राज्य को “ऑरवेलियन डिस्टोपिया” में बदल सकती है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसकी वसूली संबंधित अधिकारियों की तनख्वाह से की जानी है। इस मामले के तथ्य खुले तौर पर पुलिस और जिला प्रशासन के दावों के उलट थे, फिर भी यह राहत प्रदान करने के लिए एक सख्त और जमीर वाली पीठ की जरूरत थी। पीठ ने अपने आदेश में लिखा कि जिस हिंसा को कराने का आरोप आकृति चौधरी पर लगाया गया है, उस हिंसा के समय वह पहले से ही पुलिस हिरासत में थीं।

हाईकोर्ट से इस राहत के बावजूद इस एक्टिविस्ट को आजादी नहीं मिली है, क्योंकि यू.पी. पुलिस ने उन्हें 11 और मामलों में नामजद कर रखा है। एक लोकतांत्रिक देश में जिस आजादी का हकदार हर नागरिक है उसे पाने के लिए उन्हें कानूनी लड़ाई का एक लंबा सफर तय करना होगा। वंचितों के लिए खड़े होने वाले की जिंदगी अजाब बनाने के लिए पुलिस इस हद तक चली जायेगी, यह बात देश के जमीर को झकझोरनी चाहिए। 10 से 18 अप्रैल, 2026 के बीच, नोएडा में औद्योगिक और ठेका कामगारों ने वेतन बढ़ाने और पड़ोसी राज्य हरियाणा के बराबर वेतन की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किये। 13 अप्रैल को, ये प्रदर्शन कथित तौर पर हिंसक हो गये। नोएडा पुलिस ने आकृति के खिलाफ उकसावे के “मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियोग्राफिक सबूत” होने का दावा किया, लेकिन वह महज एक दावा ही निकला, जिसे साबित नहीं किया जा सका। आकृति को कानूनी मदद और मीडिया की तवज्जो मिल पायी जो ऐसी ही स्थितियों में सैकड़ों दूसरे लोगों को आसानी से सुलभ नहीं हो पाती, जबकि मजदूर उत्पीड़नकारी कारोबारी मॉडल और पूंजीपतियों का पक्ष लेने वाली सरकारी नीतियों के कारण दयनीय हाल में फंसे हुए हैं। गौरतलब है कि मजदूरों से किये गये वादे अब भी पूरे नहीं हुए हैं। फिर भी, आकृति के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का हस्तक्षेप उम्मीद की एक किरण है कि लोकतांत्रिक विरोधों को कार्यपालिका द्वारा ताकत के बूते दबाने के बजाय, उन पर ध्यान दिया जायेगा।

Published - September 10, 2026 10:28 am IST

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