सुप्रीम कोर्ट ने जेन‑जेड विरोधियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द किया, सीजेपी की मांगें मान्य
केंद्र सरकार की याचिका पर अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट ने उन युवाओं के खिलाफ केस खारिज कर दिए जिन्होंने परीक्षा सुधार और सरकार की जवाबदेही की मांग में राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन किया। इस फैसले से शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पूरी हुई और यह दिखाता है कि सरकार ने सीजेपी के आंदोलन को वैध माना, जबकि पहले के विरोधों को गंभीर आरोपों से दण्डित किया गया था।

सौजन्य से:- The Hindu
मरहम लगाने की एक कोशिश के रूप में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के अनुरोध पर संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उन युवाओं के खिलाफ आपराधिक मामले रद्द कर दिये जिन्होंने परीक्षा सुधारों और सरकार की जवाबदेही की मांग पर देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश की “बेरोजगार” और “कॉकरोच” वाली टिप्पणियों के जवाब में गठित समूह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेतृत्व में ये प्रदर्शन बड़े होते गये और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा देने पर मजबूर हुए। आंदोलन रोकने के लिए की गई मांगों में सीजेपी की यह मांग भी शामिल थी कि दिल्ली और अन्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकियां वापस ली जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे मंजूरी प्रदान करने के साथ केंद्र को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि जुलाई में हुए प्रदर्शनों को लेकर कोई नयी प्राथमिकी दर्ज न की जाए। अदालत से इस कदम के लिए खुद केंद्र ने अनुरोध किया जो दिखाता है कि सीजेपी के विरोध-प्रदर्शनों ने देश के युवाओं की भावनाओं को व्यक्त किया और वे आंदोलन की मुख्य मांगों से सहमत थे। यह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-नीत सरकार द्वारा इस बात की स्वीकृति भी है कि यह एक ज्वलंत मुद्दा है जिसने उसकी नाकामियों को उजागर किया है। इनमें सबसे ऊपर है, पिछले कुछ सालों में पूरे भारत में पेपर लीक का सिलसिला, जिसे युवाओं के लिए रोजगार के अभाव ने और गंभीर बना दिया है।
सीजेपी के मामले में केंद्र का एक बिल्कुल अलग रुख देखने को मिला है। यह दूसरे मुद्दों पर असहमति से निपटने के उसके उन तरीकों के ठीक उलट है, जिनके चलते हाल के वर्षों में हजारों लोगों ने विरोध-प्रदर्शन किया है। इनमें सबसे प्रमुख थे दिल्ली और उसके इर्द-गिर्द किसानों के नेतृत्व में हुए विरोध-प्रदर्शन, और सांप्रदायिक मंशा वाले नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ आंदोलन। दोनों ही काफी हद तक शांतिपूर्ण थे, लेकिन सरकार को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर आतंकवाद और राजद्रोह जैसे गंभीर आरोप थोपने में कोई गुरेज नहीं हुआ। उन प्रदर्शनकारियों में से कई अब भी बिना सुनवाई या जमानत के जेल में हैं। वैध विरोध-प्रदर्शन भारत में सरकारी नीतियों को लेकर मन में दबे असंतोष को कम करने का एक पुराना जरिया रहे हैं। लेकिन केंद्र ने इसे आपराधिक बनाने का प्रयास किया है और असहमति
व असंतोष को राजद्रोह करार देकर भय पैदा किया है। सीजेपी इस चाल को नाकाम करने में कामयाब रही, न सिर्फ अपनी मांगों के न्यायसंगत होने के चलते, बल्कि इसलिए भी कि युवा और छात्र के तौर पर प्रदर्शनकारियों की पहचान धर्म, जाति और यहां तक कि वर्ग (“अमीर किसान”) की उन सीमित श्रेणियों से परे चली गयी, जिनका इस्तेमाल करके भाजपा उनके बीच मतभेद पैदा करना और उनकी वैधता छीनना चाहती थी। केंद्र से यह उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही है कि वह पहले के मामलों में पकड़े गये लोगों के लिए भी वैसी ही राहत की मांग करे, लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट उन लोगों पर भी वही मानक लागू करता है जो उसने अब सीजेपी के लिए तय किया है तो यह अच्छा काम होगा। जब तक यह नहीं किया जाता, सीजेपी और उसके हमदर्दों को दी गयी राहत एक सिद्धांत के बजाय अपवाद ही बनी रहेगी।
Published - September 04, 2026 10:52 am IST
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