सुप्रीम कोर्ट सीबीएसई को निर्देश, अपार आईडी के लिए अभिभावकों को दिया जाए विकल्प
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीएसई को ओडिशा हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार अपार आईडी बनवाने के लिए अभिभावकों को सहमति देने या अस्वीकार करने का विकल्प देना होगा। इसके अलावा, अदालत ने डेटा सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़े मुद्दों पर सीबीएसई को निर्देश जारी करने का संकेत दिया है।

सौजन्य से:- Jansatta
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को निर्देश देगा कि वह ओडिशा हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरे देश में लागू करे, जिसमें अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए अपार आईडी बनवाने हेतु आधार साझा करने की सहमति देने या उसे अस्वीकार करने का विकल्प उपलब्ध कराने को कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह छात्रों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा, स्टोरेज और प्रोसेसिंग से जुड़े मुद्दों की जांच करने के लिए भी सीबीएसई को निर्देश जारी करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना भी शामिल थे, अपार आईडी योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा,”हम CBSE को निर्देश देंगे कि वह ओडिशा हाईकोर्ट के फैसले को पूरे देश में लागू करे, क्योंकि उस आदेश को स्वीकार किया जा चुका है। साथ ही हम CBSE को डेटा सुरक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों की भी जांच करने का निर्देश देंगे।”
ओडिशा हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
12 दिसंबर 2025 को रोहित आनंद दास और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य मामले में ओडिशा हाईकोर्ट ने केंद्र और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया था कि APAAR ID के लिए उपयोग किए जाने वाले Model Consent Form में ऐसा प्रावधान जोड़ा जाए, जिससे अभिभावक सहमति दे सकें या सहमति देने से इनकार कर सकें अथवा बाद में योजना से बाहर होने का विकल्प चुन सकें।
APAAR ID क्या है?
APAAR यानी ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत शिक्षा मंत्रालय की एक डिजिटल पहल है। इसके तहत प्रत्येक छात्र को 12 अंकों की एक स्थायी यूनिक आईडी दी जाती है, जिसमें उसकी पूरी शैक्षणिक यात्रा का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाता है।
इसमें बोर्ड परीक्षा की मार्कशीट, डिग्री और प्रमाणपत्र, सह-पाठ्यक्रम उपलब्धियां और अन्य शैक्षणिक रिकॉर्ड शामिल हो सकते हैं। सरकार का उद्देश्य छात्रों का एक डिजिटल अकेडमिक पासपोर्ट तैयार करना है।
याचिकाकर्ताओं की क्या दलील रही?
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत से कहा कि, अपार एक गैर-वैधानिक योजना है और इतनी बड़ी मात्रा में व्यक्तिगत डेटा एकत्र करने के लिए संसद द्वारा बनाया गया कानून होना चाहिए।
वर्तमान में यह योजना केवल शिक्षा मंत्रालय के सर्कुलर के आधार पर लागू की जा रही है। इससे छात्रों के निजता के अधिकार पर असर पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि व्यवहार में अपार आईडी बनवाने के लिए आधार आवश्यक है, इसलिए इसे स्वैच्छिक बताने के बावजूद यह लगभग अनिवार्य बन जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि हर सरकारी पहल को संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि APAAR ID से छात्रों के स्कूल बदलने, ट्रांसफर सर्टिफिकेट और शैक्षणिक रिकॉर्ड के प्रबंधन जैसी प्रक्रियाएं आसान हो सकती हैं। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि डेटा सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़े मुद्दों पर विचार किया जाएगा।
डेटा प्रोटेक्शन और ‘Right to be Forgotten’ का मुद्दा
इंदिरा जयसिंह ने अदालत में यह भी दलील दी कि, सहमति वास्तव में “Informed Consent” होनी चाहिए और सहमति वापस लेने का अधिकार भी होना चाहिए। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के अनुरूप सुरक्षा उपाय लागू किए जाने चाहिए।
साथ ही किसी व्यक्ति को भविष्य में अपने पुराने शैक्षणिक रिकॉर्ड को सार्वजनिक न रखने का अधिकार भी मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई पेशेवर व्यक्ति यह नहीं चाहता कि उसके स्कूल के पुराने परीक्षा परिणाम या असफलताएं हमेशा सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनी रहें।
सरकार का पक्ष
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि अपार जैसी प्रणाली से, छात्रों का रिकॉर्ड आसानी से उपलब्ध रहेगा और स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात की बेहतर निगरानी हो सकेगी। साथ ही शिक्षा व्यवस्था के संचालन और पाठ्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन में मदद मिलेगी।
APAAR ID विवाद का मुख्य मुद्दा
पूरा विवाद मुख्य रूप से इन सवालों पर केंद्रित है, जो इस प्रकार हैं।
क्या APAAR ID वास्तव में स्वैच्छिक है?
क्या इसके लिए आधार अनिवार्य बनाया जा सकता है?
क्या अभिभावकों को स्पष्ट रूप से मना करने (Opt-Out) का अधिकार मिलना चाहिए?
छात्रों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?
क्या योजना के लिए अलग कानून आवश्यक है?
फिलहाल क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह सीबीएसई को ओडिशा हाईकोर्ट के निर्देश देशभर में लागू करने के लिए कहेगा और ऑप्शनल आउट सहमति संबंधी प्रावधानों पर अमल सुनिश्चित करेगा। साथ ही छात्रों के डेटा की सुरक्षा, संग्रहण और प्रोसेसिंग से जुड़े मुद्दों पर भी सीबीएसई से जवाब मांगेगा। मामले की अगली सुनवाई में अदालत विस्तृत निर्देश जारी कर सकती है।
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