सुप्रीम कोर्ट ने निजी विश्वविद्यालयों को मुनाफ़ा‑उपार्जन संस्था नहीं चलाने की चेतावनी
अदालत ने सभी निजी विश्वविद्यालयों से पिछले पाँच साल की वित्तीय रिपोर्ट, फीस विवरण, फंड उपयोग और गैर‑शैक्षणिक खर्चों का ऑडिट माँगा है, यह बताते हुए कि शिक्षा के लिये जुटाए संसाधनों को अन्य उद्देश्यों के लिये नहीं प्रयोग किया जा सकता। आदेश में छात्रों की दाखिला प्रक्रिया, शिक्षकों की नियुक्ति, वेतन तथा शिकायत निपटारे की व्यवस्था की भी जानकारी देने का निर्देश है।

सौजन्य से:- The Wire - Hindi
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निजी विश्वविद्यालयों को मुनाफ़ा कमाने वाली संस्थाओं के रूप में चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.
लाइव लॉ की ख़बर के मुताबिक, अदालत ने देशभर के निजी विश्वविद्यालयों से पिछले पांच वर्षों की ऑडिट की गई वित्तीय रिपोर्ट, फीस का ब्योरा, फंड के इस्तेमाल, अतिरिक्त राशि के निवेश और शिक्षा से सीधे जुड़े नहीं लोगों को किए गए भुगतान की जानकारी मांगी है.
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने 17 सितंबर के अपने आदेश में कहा कि निजी विश्वविद्यालयों के पास संस्थान के सुचारू संचालन और कर्मचारियों को उचित वेतन देने के लिए एक उचित वित्तीय भंडार हो सकता है, लेकिन शिक्षा के उद्देश्य से जुटाए गए संसाधनों का इस्तेमाल किसी दूसरे मकसद के लिए नहीं किया जा सकता है.
अदालत ने कहा कि किसी निजी विश्वविद्यालय को ‘प्रॉफिट-मेकिंग इंस्टिट्यूशन’ के तौर पर नहीं चलाया जा सकता है. विश्वविद्यालयों की वित्तीय व्यवस्था का उद्देश्य शिक्षा के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करना होना चाहिए.
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट का यह मामला नोएडा स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी से जुड़े एक छात्र की शिकायत से शुरू हुआ था. बाद में अदालत ने इसे व्यापक जनहित का मामला मानते हुए देशभर के निजी विश्वविद्यालयों के कामकाज, नियमन और उन्हें मिलने वाली सरकारी सुविधाओं की पड़ताल का दायरा बढ़ा दिया.
पांच साल का ऑडिटेड वित्तीय ब्योरा मांगा
अदालत ने केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे संबंधित विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से जानकारी लेकर छह सप्ताह के भीतर हलफ़नामा दाखिल करें. यह हलफ़नामा संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों के माध्यम से दाखिल किया जाना है.
विश्वविद्यालयों से मांगी गई जानकारी में पिछले पांच वर्षों के दौरान जुटाई गई राशि, उसके इस्तेमाल और ऐसे लोगों को किए गए भुगतान का विवरण शामिल है, जो विश्वविद्यालय के शैक्षणिक कामकाज से सीधे जुड़े नहीं हैं.
अदालत ने यह भी पूछा है कि विश्वविद्यालयों ने केंद्र या राज्य सरकारों से ज़मीन आवंटन, कानूनों में छूट या किसी अन्य विशेष सुविधा के रूप में क्या-क्या लाभ हासिल किए हैं.
फीस और दाखिले की प्रक्रिया का भी देना होगा ब्योरा
सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालयों से प्रत्येक पाठ्यक्रम में छात्रों के दाखिले की प्रक्रिया की पूरी जानकारी मांगी है. इसमें दाखिले, प्रश्नपत्र तैयार करने, परीक्षाएं कराने, उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन और फंड के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालने वाले लोगों का विवरण भी शामिल है.
विश्वविद्यालयों को दाखिले के समय और कोर्स के दौरान छात्रों से वसूली जाने वाली फीस का ब्योरा भी देना होगा. इसमें फीस के अलावा ‘डेवलपमेंट फंड’ या किसी विशेष कार्यक्रम के नाम पर ली जाने वाली राशि की जानकारी भी शामिल होगी.
अदालत ने यह भी पूछा है कि फीस से बची अतिरिक्त राशि का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है और उसे कहां निवेश किया जाता है.
शिक्षकों की नियुक्ति और वेतन की जानकारी भी मांगी
अदालत ने निजी विश्वविद्यालयों से शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया, उनके वेतन और अन्य सुविधाओं का विवरण मांगा है.
विश्वविद्यालयों को यह भी बताना होगा कि शिक्षकों को कक्षाएं आवंटित करने का अधिकार किसके पास है, किस शिक्षक को कितनी कक्षाएं दी गईं और उन्होंने वास्तव में कितनी कक्षाएं लीं. यह जानकारी जनवरी 2025 से देनी होगी.
अगर किसी शिक्षक ने आवंटित कक्षाएं नहीं लीं तो उसकी जगह क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई, ताकि छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसका भी ब्योरा देना होगा.
शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था की भी जांच
सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालयों में छात्रों और अन्य लोगों की शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था के बारे में भी जानकारी मांगी है.
विश्वविद्यालयों को शिकायत निवारण समितियों की संरचना, उनके अधिकार क्षेत्र, पिछले तीन वर्षों में मिली शिकायतों की संख्या, उन पर हुई कार्रवाई और शिकायतों के निपटारे में लगे समय का ब्योरा देना होगा.
इसके अलावा, जिन कॉलेजों के साथ अस्पताल जुड़े हैं, उन्हें अस्पताल के साथ अपने संबंध और उसकी भूमिका की जानकारी भी देनी होगी.
मेडिकल और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रम भी दायरे में
अदालत ने संबंधित मान्यता और नियामक संस्थाओं से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में किए गए निरीक्षण का ब्योरा भी मांगा है.
इसमें नेशनल मेडिकल कमीशन, डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया, नेशनल कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशंस, इंडियन नर्सिंग काउंसिल, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और अन्य संबंधित नियामक संस्थाएं शामिल हैं.
इन संस्थाओं को पिछले पांच वर्षों के दौरान मान्यता या संबद्धता देने के आधार, निरीक्षण और संबंधित शिक्षकों व सहायक कर्मचारियों की जानकारी देनी होगी.
अदालत ने कहा है कि केंद्र, राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों को विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से जानकारी हासिल करने के बाद छह सप्ताह के भीतर हलफ़नामा दाखिल करना होगा. इस मामले की अगली सुनवाई अब 19 नवंबर को होगी.
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश फिलहाल एक व्यापक जानकारी-संग्रह और नियामकीय जांच की प्रक्रिया का हिस्सा है. अदालत ने विश्वविद्यालयों से मांगे गए रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कार्यवाही तय करनी है.
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